ग्राउंड रिपोर्ट: आजमगढ़– निजामाबाद में सपा एक बार फिर वयोवृद्ध आलमबदी को आजमाने को तैयार, मुकाबले में कांग्रेस से अनिल यादव

विशेष संवाददाता

लखनऊ

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ में एक बार फिर से निजामाबाद सीट पर पार्टी अपने बुजुर्ग नेता आलमबदी पर ही दांव लगाने जा रही है। हालांकि सपा के इस परंपरागत गढ़ में कांग्रेस ने लगातार सक्रियता दिखा कर और पिछड़ों व दलितों की लड़ाई कर काफी कुछ हालात बदले हैं।

गौरलतब है कि कि उत्तर प्रदेश में हर रोज बनते नए गठबंधनों, नए पैंतरों, जुबानी तीरों के चलते हर सीट का समीकरण दिन-रात में बदल रहा है। समाजवादी पार्टी के गढ़ आज़मगढ़ में अचानक कांग्रेस की सरगर्मी तेज हो गयी है। जिला मुख्यालय से लगी सीट निज़ामाबाद पर गांधी परिवार के करीबी और प्रदेश के संगठन सचिव अनिल यादव ने दावा किया है। विधानसभा में सीधे दुआरे नाम से अभियान चलाकर लोगों के यहाँ जा रहे हैं। विधानसभा के 68 ग्रामसभाओं को अबतक इस अभियान के तहत डोर टू डोर अनिल यादव ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। जोकि क्षेत्र में सबसे चर्चा का विषय है। 

निज़ामाबाद सीट समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है लेकिन वर्तमान विधायक के खिलाफ नाराजगी चरम पर है। खासकरके यादव जाति के मतदाताओं में यह नाराजगी ज्यादा है इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावना है। दूसरे तरफ आज़मगढ़ के रौनापार के पलिया गांव में दलितों की लड़ाई लड़ने वाले अनिल यादव के प्रति दलित युवाओं का तेजी से रुझान बढ़ा है। पलिया में दलितों के ऊपर पुलिसिया दमन के खिलाफ अनिल यादव और जिला कांग्रेस के नेताओं ने 6 दिन की भूख हड़ताल की थी। राजनीतिक पकड़ रखने वालों का कहना है कि निज़ामाबाद में 2007 के विधानसभा चुनाव जैसा  समीकरण बन रहा है। जिसमें पूर्व मंत्री अंगद यादव के पक्ष में यादव और दलित मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर वोट किया था। 

निज़ामाबाद विधानसभा यादव बाहुल्य सीट है। जिसमें करीब 1 लाख 13 हज़ार यादव मतदाता हैं। दलित और मुस्लिम मतदाताओं की तादात करीब 70-80 हज़ार के बीच है। राजभर, कुम्हार, नोनिया वोटरों की तादात कमोबेश 20-22 हज़ार है। तहबरपुर ब्लॉक में भूमिहार जाति की कुछ गांवों में बाहुल्यता है, पूरे विधानसभा में 12 से 15 हज़ार भूमिहार भी हैं। माना जा रहा है कि विधानसभा निज़ामाबाद में सपा से आलमबदी आज़मी ही प्रत्याशी होंगे और कांग्रेस से अनिल यादव की उम्मीदवारी मजबूत मानी जा रही है। अब राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र अब भाजपा और बसपा के उम्मीदवारों पर टिकी है कि इन पार्टियों से आखिर उम्मीदवार कौन होगा?

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