…ये पब्लिक है …और पब्लिक सब जानती है

जगदीश जोशीजगदीश जोशी

मोबाइल पर एक मैसेज आया, उसने बताया कि पब्लिक क्या सोच रही है। पब्लिक ने पिछले पांच-छह महीने क्या अनुभव किया है। यह भी संदेश दिया कि पब्लिक कितनी जागरूक हो चुकी है। अब उसे बहलाना-फुसलाना पहले जैसा नहीं रहा। वह दूध का दूध, पानी का पानी करना जानने लगी है। वह यह भी जानने लगी है कि सच कौन बोल रहा है, झूठ कौन। कौन दिखावा कर रहा है और हमदर्द कौन है। कौन अपने वचन निभाता है और कौन घोषणा कर भूल जाता है। मोबाइल मैसेज अक्षरश: इस प्रकार है- जो भी नेता कोरोना पॉजिटिव आता है, उसका इलाज उसके गृह क्षेत्र के सरकारी हॉस्पिटल में होना चाहिए। ताकि उसको अपने क्षेत्र की मेडिकल सुविधा का पता लग सके। इसके साथ-साथ उस नेता को यह भी पता लगे कि उसका उसके क्षेत्र में क्या योगदान है? इससे स्पष्ट है कि बात चिकित्सा सुविधाओं की हो रही है।

कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आया था कि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी अपने बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूलों में ही कराएं। ताकि पता चल सके कि सरकारी वेतन प्राप्त शिक्षक-स्टाफ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं कि नहीं। अगर कर रहे हैं तो अधिकारियों की देखरेख में और बेहतर कार्य सकें। पब्लिक ने चाय की दुकानों, अड्डों और चौपालों में देश की सबसे बड़ी अदालत की मंशा का कई दिन तक जिक्र भी किया। यदा कदा आज भी बात उठती रहती है। मगर दो-एक अपवादों को छोड़कर हकीकत में कभी ऐसा संभव नहीं हो पाया। ऐसे ही निजी स्कूलों में एक चौथाई अत्यंत गरीब बच्चों को प्रवेश देने आदेश भी आया। उसका हश्र सभी के सामने है।

इधर कोरोना काल की शुरुआत यानी मार्च-अप्रैल में मेडिकल व्यवस्था सब चाक-चौबंद दिखी। उपलब्ध सुविधाओं पर कड़ी नजर रखी गई, नई जोड़ी गईं। चिकित्सा विभाग, पुलिस विभाग से लेकर प्रशासनिक अमला तक अपनी ओर से सर्वोत्तम देने का प्रयास करता नजर आया। पब्लिक ने इसे खूब सराहा। मगर दो- तीन महीने बाद ही सरकारी सुविधाओं के क्षरण का सिलसिला शुरू हो गया। इससे आहत पब्लिक के जख्म हरे होने लगे। अनलॉक के दूसरे फेज ने रही सही कसर पूरी कर दी। हालांकि, ऊंची पहुंच और किस्मत वालों को सारी मेडिकल सुविधाएं आज भी आसानी से सुलभ हैं। मगर, सब की किस्मत अच्छी होना संभव नहीं, यानि कि बाकी सब अपने हाल पर।

इन्हीं हालातों के बीच पब्लिक को अपने जरूरी कामकाज निपटाने हैं। बच्चों का भविष्य संवारना है। ऑनलाइन कक्षाएं फलीभूत हों ऐसा वातावरण भी देना है। कोविड-19 वायरस से सपत्नीक खुद तो बचना ही है, बच्चे-बुजुर्गों का भी विशेष ख्याल रखना है। रोजी-रोटी की निरंतरता को बनाए रखना है। इस बीच कोविड जांच की दिनवार संख्या और सुविधाएं बढ़ीं है मगर जांच कराना अब भी आसान नहीं। अधिसंख्य मरीजों और उनके तीमारदारों को कड़वा अनुभव चखना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों का माहौल और प्राइवेट अस्पातालों का बिल कोरोना की दहशत पर भारी पड़ रहा है। कोरोना का प्रकोप कब तक थमेगा, कब वैक्सीन आ पाएगी, महामारी से कब निजात मिलेगी, यह अब तक तय नहीं हो पाया है। मेडिकल सुविधाओं को लेकर पब्लिक का भयभीत होना स्वाभाविक है। सरकारी तंत्र से भरोसा डगमगाना भी लाजिमी है। ऐसे में पब्लिक के नुमाइंदों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, क्योंकि पब्लिक का सरकारी सुविधाओं और मौजूदा जनहितकारी शासनतंत्र पर विश्वास बनाए रखना जरूरी है। इसलिए सिर्फ सत्ता पक्ष ही नहीं प्रतिपक्ष के जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि सिस्टम पर पब्लिक को भरोसा दिलाएं। ध्यान में रखना होगा कि पब्लिक का भरोसा ही सबसे बड़ी ताकत है।

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