विधानसभा चुनावों से पहले यूपी में राम-परशुराम की होड़

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में मिशन 2022 को लेकर रणभेरी बज चुकी है और सियासी दल राम और परशुराम में उलझ चुके हैं. राम और रहीम की सियासत वाले उत्तर प्रदेश में परशुराम अचानक अहम हो गए हैं और भगवान परशुराम को लेकर  सियासी दलों में होड़ सी मच गयी है. इन सियासी दलों द्वारा जिस ढंग से राम और परशुराम को लेकर पेशबंदी की जा रही है उससे लगता है कि आने वाले समय में राम यानी धर्म और परशुराम यानी जाति फिर से महत्वपूर्ण होने जा रही है. 

जिस राम नगरी अयोध्या को केंद्र बना व रामरथ पर सवार हो सत्ता का सुख भोग रही भाजपा को उसी रामनगरी अयोध्या में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले  बसपा महासचिव द्वारा रामनगरी अयोध्या से राम और परशुराम को लेकर माहौल बनाया गया. अयोध्या में राममंदिर के भूमि पूजन के बीच में ही समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण कार्ड खेला है. पार्टी द्वारा प्रदेश के सभी 75 जिलों में भगवान परशुराम की प्रतिमा लगाए जाने की बात कही गयी है. उधर कांग्रेस में रहे और “ब्राह्मण चेतना मंच” बैनर तले ब्राह्मण एकता का नारा देने वाले जितिन प्रसाद को भाजपा ने पार्टी में शामिल करा लिया है और अब उनको एमएलसी बनाये जाने की भी चर्चा है.      

दरअसल कानपुर में विकास दुबे और उनके साथियों की एनकाउंटर में मौत और उसके बाद ग़ाज़ीपुर के राकेश पांडेय की पुलिस मुठभेड़ में मौत के अलावा ब्राह्मण समुदाय के लोगों की हो रही हत्याओं ने आम लोगों में योगी सरकार के प्रति रोष उत्पन्न कर दिया था. साथ ही उनके इस गुस्से की अभिव्यक्ति सोशल मीडिया पर देखी जा रही थी. सूबे की सियासत में फिलहाल ब्राह्मण और भगवान परशुराम राजनीति का केंद्र बन गये हैं. विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भाजपा को ब्राह्मण विरोधी बताया जा रहा है. इसी विरोध को कैश कराने को लेकर सपा के दो प्रमुख नेता इस मिशन में काफी आगे जा चुके हैं तो बसपा प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को ‘प्रबुद्ध वर्ग विचार संगोष्ठी’ करके ब्राह्मण राजनीति को और हवा दे दी है.  

फिलहाल इस सियासत की दिशा-दशा चुनाव आने तक क्या होगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन ब्राह्मणों को अपना बनाने की कवायद में लगे विपक्ष ने भाजपा की चिंता जरूर बढ़ा दिया है.  भाजपा को परंपरागत मतदाता रहे ब्राह्मण की कथित नाराजगी को दूर करने की चिंता है, तो समाजवादी पार्टी को उनकी इस नाराजगी को कैश कराने की है. ऐसे में बहुजन समाज पार्टी का ब्राह्मण राजनीति को लेकर यह मुहिम आने वाले समय में ब्राह्मण सियासत को और हवा दे रहा है. 

कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा की योगी सरकार के अगले कुछ दिनों में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में ब्राह्मण चेहरों को शामिल कर उन को रिझाने का प्रयास जरूर करेगी. इन तीनों प्रमुख दलों ने अपने अपने प्रमुख ब्राम्हण चेहरों को इस कवायद में आगे कर दिया है. भाजपा संगठन की तरफ से संगठन के ब्राह्मण प्रवक्ताओं के अलावा सरकार की तरफ से दिनेश शर्मा, बृजेश पाठक, श्रीकांत शर्मा जैसे नेता आगे किए जा चुके हैं. तो समाजवादी पार्टी की तरफ से कैबिनेट मंत्री रहे मनोज पांडे, अभिषेक मिश्रा और विधायक रहे संतोष पांडे इस मुहिम में लग चुके हैं. वहीं बसपा ने ब्राह्मणों को रिझाने की यह जिम्मेदारी पार्टी के महासचिव सतीश मिश्रा को सौंपी है और उनके साथ बसपा सरकार में मंत्री रहे दो प्रमुख ब्राम्हण चेहरे अनंत मिश्रा उर्फ अंतू मिश्रा व नकुल दुबे मोर्चा संभाल चुके हैं.  

बसपा महासचिव सतीश मिश्रा का कहना है कि यदि 13 फीसदी ब्राम्हण और करीब 23% दलित मत एक हो जाएगा तो उनकी सरकार को सत्ता में आने से कोई रोक नहीं पायेगा. भाजपा की भी चिंता इन्हीं मतों को सहेजे रखने की है साथ ही सपा करीब इतने ही प्रतिशत मतवाले गैर यादव पिछड़े मतों को जोड़ने के लिए जोड़-तोड़ जैसे प्रयासों को मूर्त रूप देने में लगी है. 

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