टीवी मीडिया की बहुमुखी प्रतिभा को प्रणाम

Gyanendrs Shrama

वरिष्ठ पत्रकार  – ज्ञानेन्द्र शर्मा

‘देश की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान हो गया, रिया गिरफ्तार हो गई, कंगना को वाई प्लस सुरक्षा मिल गई, गटर पर बहस छिड़ चुकी, बस अब अनुष्का और करीना की डिलीवरी ठीक-ठाक हो जाय। फिर उसके बाद बाकी छोटी समस्याओं जैसे बेरोजगारी, अर्थ-व्यवस्था, कोरोना, सीमा तनाव के बारे में सोच लेंगे और चर्चा  भी कर लेंगे।  किसी ने आज के इलेक्ट्रानिक मीडिया की प्राथमिकताओं के बारे में यह बेहतरीन और स्व-स्पष्टीकृत संदेश मुझे भेजा है। अब ऐसा लगने लगा है कि टेलीविजन चैनल खु़द अपने बोझ तले दबे जा रहे हैं। एक के बाद एक ऐसे कई प्रकरण समाचार मंच पर आते हैं, जिनमें तात्कालिकता होती है, दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करने की क्षमता होती है, उनका मनोरंजन करने और उन्हें विचार- उत्प्रेरक धार देने की ताकत होती है। लेकिन इन सबसे परे यदि केवल एक बात पर ध्यान दिया जाय कि सनसनी कैसे फैले, उत्तेजना कैसे पांव पसारे और इन सब बातों के उपर टीआरपी  रेटिंग का रास्ता कैसे सुगम हो फिर क्या हो? फिर इस सबके बीच यदि यह डिबेट खड़ी हो जाय कि इस मीडिया को प्रैस की आजादी यानी फ्रीडम आफ प्रेस का कवच किस हद तक उपलब्ध हो और किस हद तक उसे यह स्वतंत्रता ओढ़ने-बिछाने का मौका निर्धारित मानदण्डों के अंतर्गत स्वतः उपलब्ध हो और बोलों और चित्रों से सबको प्रभावित करने का दमखम किस तराजू पर तोला जाएगा?

इस हफ्ते के शुरू में सुदर्शन टीवी का मामला सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ तो केन्द्रीय सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर से एक हफलनामा दायर किया गया जिसमें अदालत से अनुरोध किया गया कि मामला केवल सुदर्शन टीवी तक ही सीमित रखा जाय और मुख्य समाचार जगत के लिए नए सिरे से गाइडलाइन्स जारी न किए जाएं। मंत्रालय ने कहा कि यदि अदालत गाइडलाइन्स जारी ही करना चाहता है तो डिजिटल मीडिया के बारे में ऐसा किया जाय क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिन्ट मीडिया के लिए तो पहले से ही न्यायिक फैसले लागू हैं। हलफनामे में कहा गया कि जहां तक पत्रकारों की स्वतंत्रता और जिम्मेदार मीडिया के बीच संतुलन बिठाने की बात है तो यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि संसद के कानूनी प्रावधानों और अदालती आदेशों ने पहले ही यह किया हुआ है।

मामले की सुनवाई के दौरान देश की सबसे बड़ी अदालत ने कई ऐसी प्रासांगिक टिप्पणियां कीं, जो प्रेस की आजादी की सीमाओं से सटकर उन्हें हिलाती डुलाती हैं। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति जोजेफ ने मत प्रकट किए, वे पूरे प्रेस जगत के लिए विचारणीय विषय होने चाहिए। जस्टिस जोजेफ ने कहा कि कोई भी स्वतंत्रता, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है, अपने आप में सम्पूर्ण यानी ‘एबसोलूट’ नहीं है। कोर्ट ने न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन की भी खबर ली और पूछा कि आपका अपने लैटरहैड के अलावा भी अस्तित्व है कि नहीं? आप उस समय क्या करते हैं जब मीडिया में एक समानान्तर मीडिया ट्राइल चलता है और लोगों की प्रतिष्ठा धूमिल कर दी जाती है? जस्टिस चन्द्रचूड़ ने कहा कि यह मौका है कि इस पर विचार हो कि स्वतः नियंत्रण लागू किया जाय। पत्रकारों को कुछ सिद्धान्तों से बंधा होना चाहिए।

TV Media

विचारणीय विषय यह है कि न्यूज चैनल्स पर जब मनमानी होती है तो कोई क्या कर लेता है? यह तो ठीक है कि जो कायदे की बातें व सांदर्भिक प्रसंगों की उपेक्षा कर दी जाती है, उन पर कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन जो आपत्तिजनक, अपमानजनक, एकतरफा, सनसनीखेज और सारे नियम कानूनों से विपरीत आचरण वाले कार्यक्रम दिखाए जाते हैं, उन पर कोई क्या कर पाता है और जब ये काम खुद पत्रकारों के संगठन स्वप्रेरित होकर नहीं करते हैं तो बाहरी हस्तक्षेप होना और आक्षेप लगना कोई नहीं रोक सकता।

जहां तक ब्राडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन/बीईए/ का सवाल है, इनका खुद का कमाल देखिए। 9 नवम्बर 2011 को बीईए ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के परिवार में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन के पहले बच्चे के जन्म से पूर्व ‘जिम्मेदारीपूर्वक कवरेज’ करने के लिए 10 सूत्री दिशा निर्देश जारी किए थे। निर्देश के अनुसार इस बारे में कोई पूर्व कवरेज नहीं होगा, अधिकारिक घोषणा के बाद ही बच्चे के जन्म की खबर प्रसारित होगी और इसे बतौर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ पेश नहीं किया जाएगा। अस्पताल या बच्चे के जन्मस्थान के बाहर कोई भी आउटडोर ब्राडकास्ट वेन नहीं खड़ी की जाएगी और टीवी चैनल सिर्फ तस्वीरें कैद करने जा सकेंगे बशर्ते कि इसके लिए उन्हें आमंत्रित किया जाय। चैनलों को यह निर्दश भी दिए गए कि वे परिवार द्वारा जारी तस्वीरों के इतर किसी अन्य चित्र का प्रसारण नहीं करेंगे।

अब सवाल यह है कि क्या ऐसे ही दिशा निर्देश हों, तभी चैनल चेतेंगे? वरना  अभी क्या हो रहा है? रिया चक्रवर्ती अपने आप में इतनी बड़ी खबर थी कि उसके घर के बाहर सुबह 6 बजे टीवी वैन मोर्चा लगा लेते थे और जब तक वह बाहर नहीं निकलती, रनिंग कमेन्ट्री देते थे- आने जाने वालों पर नजर दौड़ाई जाती थी। वह बेचारी जब तक सलाखों के पीछे नहीं पहुंच गई, चैनलों ने दम नहीं ली।

खुद दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले सीरियलों के सच भी उद्घाटित होने चाहिए। आजकल एक सीरियल आ रहा है- श्रीकृष्ण। इनमें लगातार युद्ध चलते हैं और मृतकों और घायलों के मुंह से, शरीर से लाल खून खुलेआम बहता दिखाया जाता है। मरने वालों के सिर धड़ से अलग कर दिए जाते हैं और सिर और धड़ अलग अलग पड़े हुए परदे पर दिखाए जाते हैं। ऐसे दृश्य फिल्मों तक में काट दिए जाते हैं लेकिन दूरदर्शन पर इन पर कोई रोक नहीं है। सीरियल आखिर रामानंद सागर ने बनाया है जो रामायण सीरियल दूरदर्शन पर लाकर अपना सिक्का जमा चुके हैं। तमाम नए और कुशल निर्माता लाइन लगाए दूरदर्शन के मुख्यालय मंडी हाउस के बाहर अर्जी लिए खड़े रहते हैं, उनकी कोई नहीं सुनता। लेकिन रामांनद सागर और उनके परिवार की बात अलग है, उलके सीरियल उनके नाम से बिकते हैं, प्रसारित होते हैं और इस प्रक्रिया में वे सारे नियम कानून धड़ल्ले से तोड़ते चले जाते हैं।

Related Articles

Back to top button
E-Paper