अब्बास सिद्दीकी का दावा : माकपा-कांग्रेस में गठबंधन, आईएसएफ को मिलीं 30 सीटें

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आसन्न विधानसभा चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का विकल्प बनने के प्रयास में जुटे माकपा-कांग्रेस गठबंधन में फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी को एंट्री मिल गई है। यह दावा खुद अब्बास ने किया है। सिद्दीकी ने नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से भी अपनी पार्टी के उम्मीदवार को उतारने की मंशा जताई है। इससे तृणमूल कांग्रेस खेमे में हलचल तेज हो गई है।

शुक्रवार को उन्होंने कहा है कि अपनी नवगठित पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के लिए उन्होंने गठबंधन से 70 से 80 सीटें मांगी थीं। हालांकि वाममोर्चा ने 30 सीटें देने की सहमति दे दी है। इसके अलावा और तीन से चार सीटें देने के बारे में बातचीत चल रही है। सिद्दीकी ने बताया कि अभी तक सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस ने अपना रुख साफ नहीं किया है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी पार्टी नंदीग्राम सीट पर अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है और इसके लिए भी वार्ता चल रही है।

दरअसल, इस बार चुनाव में नंदीग्राम वीआईपी सीट है। इसकी वजह यह है कि ममता बनर्जी के कैबिनेट में परिवहन मंत्री रहे राज्य के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी यहीं से विधायक रहे हैं। अब वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं और ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। ममता ने भी घोषणा कर दी है कि वह नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ेगी और शुभेंदु उनको चुनौती देते हुए दावा कर चुके हैं कि ममता बनर्जी को कम से कम 50 हजार वोट से हराएंगे। अगर नहीं हरा सके तो राजनीति छोड़ देंगे। ऐसे में अब्बास सिद्दीकी का इस सीट से चुनाव लड़ने का दावा ठोंकना एक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस सीट से चुनाव लड़ने के बाद अब्बास और उनकी पार्टी अपने आप मशहूर हो जाएगी। भले ही यहां से हार मिले। यहां मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी सरीखे दिग्गज के बीच होने वाला है। खास बात यह है कि इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय के लोग भी बहुतायत संख्या में रहते हैं, जिनकी इस बार चुनाव परिणाम निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाने वाला है।

अल्पसंख्यकों का मतदान अमूमन सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में होता रहा है लेकिन इस बार शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में चले जाने की वजह से समीकरण बदल गया है और हिंदू मतदाताओं का वोट एकतरफा पड़ सकता है। ऐसे में ममता बनर्जी को अल्पसंख्यक मतदाताओं का ही भरोसा है और उसमें भी अगर अब्बास सिद्दीकी एंट्री लेते हैं तो निश्चिततौर पर इसका नुकसान ममता को उठाना पड़ सकता है। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि माकपा-कांग्रेस गठबंधन में अब्बास सिद्दीकी को यह वीआईपी सीट दी जाती है या नहीं।

Related Articles

Back to top button
E-Paper