आखर, शब्द, भाव सब अनुपम, गढ़कर गए पुराने लोग

गीत 

 

 

 

 

 

प्रो. विश्वम्भर शुक्ल

अमृत पीकर मधु रस घोलें हिंदी के दीवाने लोग।
माँ वाणी का पूजन, अर्चन प्रतिदिन कर मुस्काने लोग।।

भारत के माथे की बिंदिया,
सगी हमारी महतारी ,
हिंदी कावेरी, कालिंदी,
सलिला गंगा है प्यारी।

नहीं समझते जान बूझकर थोड़े-बहुत सयाने लोग !

उर्दू का व्याकरण न थोपें
हिंदी पर बैठे- ठाले,
हिंदी सहज, सुग्राह्य हमारी,
अभी समय है अपना ले।

हिंदी की चिंदी को आतुर भाले, बरछे ताने लोग।

मीरा, तुलसी, सूर, कबीरा,
हैं रहीम, रसखान यहाँ,
पंत, निराला, महीयसी का
विस्तृत अमित वितान यहाँ।

जो उधार की गढ़ते भाषा, इनको कब पहचाने लोग।

सहज, माधुरी, मोहक हिंदी,
इसके सभी रंग भाते,
छंद, गीत, दोहे, चौपाई
किसको रास नहीं आते।

आखर, शब्द, भाव सब अनुपम, गढ़कर गए पुराने लोग।

शीतल है हिन्दी का चन्दन ,
धवल कीर्ति का अभिनन्दन,
आखर और शब्द मुस्काते ,
खिल जाता है उर- उपवन !

हिंदी सकल विश्व की भाषा होगी, अब हैं ठाने लोग।

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