स्मार्ट फोन पर उंगलियां नचाकर चंद मिनटों में रची जाती है दंगा-उन्माद फैलाने की साजिश

Cyber crime

अजय दयाल

लखनऊ। यूपी को दंगे में झोंकने की साजिश मात्र दो हजार रुपये खर्च कर महज एक घंटे में रची गई हो तो आश्चर्य नहीं होगा। इन दिनों सभी के हाथों का खिलौना बने स्मार्ट फोन का एक ‘हैशटैग’ बटन का विकल्प ही इस तरह की साजिश को अंजाम तक पहुंचाने के लिए काफी था। ऐसे में योगी सरकार की सतर्कता की दाद देनी होगी कि, जितनी तेजी से भड़काऊ वेबसाइट बनी उतनी ही तेजी से इस पर कार्रवाई की गई। यूपी पुलिस ने बकायदा लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में रातों-रात भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए, 153-बी के तहत यानि किसी भी जाति, समुदाय आदि के विरूद्ध किसी भी प्रकार से बोलना, लिखना और नफरत फैलाना समेत कई गंभीर धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया।

गौरतलब है कि, एक वेबसाइट बनाने के लिए सबसे पहले एक नाम का चुनाव करना होता है। इसी नाम पर ऑन-लाइन ‘डोमेन’ बुक किया जाता है। जैसा कि ताजा मामले में “https://justiceforhathrasvictim.carrd.co/”नाम से ‘डोमेन’ बुक कर उन्माद फैलाने की कुत्सित मंशा से वेबसाइट बनायी गई। फिलहाल इस वेबसाइट को सर्च करें तो स्क्रीन पर ‘File Not Found’ का मैसेज दिखता है। हालांकि, GoDaddy , domain.com , Hostinger जैसे वेब-प्रोवाइडर इस तरह के नाम यानि डोमेन को चंद पैसों में बुक करवाने की पहचान को गोपनीय रख कर उपलब्ध करा देते हैं।

इस क्रम में बुक करने वाले से वेबसाइट बनाने का मकसद अथवा कोई ऐसी शर्त भी नहीं रखी जाती कि, वेबसाइट धार्मिक-जातीय उन्माद, हिंसा, अपराध अथवा व्यभिचार फैलाने के मकसद से नहीं बनायी जाएगी। जाहिर है मिनटों में स्मार्टफोन पर उंगलियां नचाकर अपनी पहचान छिपाकर साजिशकर्ता अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दे सकते हैं। डोमेन प्रोवाइडर कम्पनी बकायदा डोमेन लेने की मंशा रखने वाले को आश्वस्त करती है कि मालिक की पहचान पूरी तरह से गोपनीय है, इसका पता कोई नहीं लगा सकता।

अब रही बात कि शतिराना मंशा के साथ बनायी गई वेब-साइट के शातिराना संदेशों को यकायक पब्लक के बीच फैलाया कैसे जाता है? इसके लिए भी स्मार्ट-फोन का हैशटैग बटन की काफी है। खुराफाती साइबर- एक्सपट्रर्स ऐसे संदेशों को हैशटैग (#) के साथ ट्वीटर, फेसबुक, इस्टाग्राम जैसे सोशल-मीडिया प्लेटफार्म की पतवार से वायरल होने लगते हैं।

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इसके सबसे बड़े उदाहरण के रूप में याद कीजिए तो दिल्ली निर्भया कांड (16 दिसम्बर 2012) के विरोध में देश की राजधानी की सड़कों पर लाखों युवा एकत्र होकर विरोध-प्रदर्शन करने लगे थे। इनका नेतृत्वकर्ता कोई राजनीतिक दल, जन-नायक अथवा सोशल-लीडर नहीं बल्कि सोश-मीडिया निकला। लाखों युवा खासकर मेट्रो और अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेकर एकजुट हुए थे। बीते दिनों लॉकडाऊन के दौरान भी महाराष्ट्र में बसें पकड़ने के लिए एकाएक प्रवासी मजदूरों का हुजूम उमड़ पड़ा था जो कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया। इसके पीछे भी सोशल-मीडिया ही वजह रही।

हालांकि सच यह भी है कि, संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी दी गई है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसे प्रोत्साहित करने में खास भूमिका निभा रहा है। साथ हकीकत यह भी है कि, अभिव्यक्ति की यह आजादी उसी सीमा तक है, जहां तक आप किसी कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं और दूसरे को आहत या नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

अगर आपके किसी पोस्ट पर या फिर किसी पोस्ट को शेयर करने से किसी की भावना आहत होती है या दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है, तो आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती है। भारतीय संसद ने साइबर क्राइम को रोकने के लिए साल 2000 में इनफॉर्मेशन एक्ट यानी आईटी एक्ट बनाया था।

इसके तहत अगर आप फेसबुक, ट्विटर, टिक टॉक, शेयर चैट, यूट्यूब समेत अन्य सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का आपत्तिजनक, भड़काऊ या फिर अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत पैदा करने वाला पोस्ट, वीडियो या फिर तस्वीर शेयर करते हैं, तो आपको जेल जाना पड़ सकता है। साथ ही 10 लाख तक का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

आईटी एक्ट की धारा 67 में कहा गया है कि अगर कोई पहली बार सोशल मीडिया पर ऐसा करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है। साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी। इतना ही नहीं, अगर ऐसा अपराध फिर दोहराया जाता है, तो मामले के दोषी को 5 साल की जेल हो सकती है और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। साइबर क्राइम के मामले में मामूली सजा से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

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