घूंघट की आड़ में दिलबर का दिल धड़का

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पत्रकार : आकांक्षा श्रीवास्तव

एक समय की बात है जब घूंघट लेने का चलन बड़ी तेजी से दौड़ लगा रहा था, या यूं कहें कि रिवाजों में गोते लगाने का दौर था। पहले के समय में घूंघट का रिवाज हमारी संस्कृति थी। लोग उसे निभाने में जुटे रहते थे। आज उसी घूंघट का अंत इन मॉडर्न वेस्टर्न महिलाओं ने तोड़ दिया। एक समय था जब अपने से बड़ों के आगे आपको गर्दन तक घूंघट की आड़ लेनी होती थी। कुछ समय बीता, रिवाजों में परिवर्तन हो गया, लोगों ने घूंघट को चेहरे तक लाने की कोशिश की, जिसमें वो सफल हुए। कुछ समय और बीता, जब रिवाजों के इस भारी पलड़े को नयन तक टिका दिया गया। कुछ समय और बीता, घूंघट की इस जर्नी को सिर का ताज बना दिया गया।

लेकिन कहते हैं न ताज बहुत दिनों तक साथ नहीं रहता, कभी न कभी ताज सिर से हट ही जाता है। आखिर वो पड़ाव आ ही गया। मॉडर्न जमाने ने इस आड़ का अंत ही कर दिया। जो अभी तक सिर का ताज बना फिर रहा था, आज वो फैशन का घूंघट हो गया। सेल्फी लुक, इंडियन ड्रेस साड़ी में हैस टैग से उस सिर के ताज को जोड़ दिया गया। इस तरह से आज घूंघट प्रथा का अंत तो नहीं, लेकिन अंत करने की शुरुआत हो चुकी है।

अब महिलाएं घूंघट वाले सफर से आजाद हैं, लेकिन पूरी तरह से नहीं, क्योंकि इस देश में अब भी कुछ ऐसे लोग हैं जो इस प्रथा को पूर्ण रूप से निभाते हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो दिखावे के लिए इस प्रथा को निभाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो फैशन के लिए इसका सहारा लेते हैं।

कैसे शुरू हुई घूंघट की शुरुआत?

हमारे भारतीय समाज में महिलाओं को हमेशा सामाजिक परंपराओं को निभाते और मानते हुए देखा गया है, जैसे कि वे हमेशा ही पारंपरिक कपड़े और गहने पहनती हैं, माथे पर बिंदी लगाती हैं और सिर पर घूंघट लेती हैं। आपको बता दे कि घूंघट का अस्तित्व मध्यकालीन समय के बाद से आया।  उस वक्त इसकी आवश्यकता थी, लेकिन समय के साथ इसे महिलाओं के ऊपर थोपा जाने लगा। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में महिलाओं के पर्दे में रहने का कोई उल्लेख नहीं है। यहां तक कि पूजा के समय भी सिर पर घूंघट रखना जरूरी नहीं है।

वहीं यह भी देखने-सुनने व पढऩे को मिलता है कि पर्दा प्रथा मुस्लिम शासन काल में मुस्लिम सैनिकों से महिलाओं की रक्षा के लिए आरंभ हुई। लेकिन यह सच नहीं है। भारत में पर्दा प्राचीन काल से है। दुर्भाग्य तो यह है कि अनेक इतिहासविदों ने संस्कृत, पालि या प्राकृत ग्रंथों में झांके बिना ही अपना मत बना लिया। वाल्मीकि रामायण को सनातन धर्म के अनुयायी अपना एक धर्मशास्त्र मानते हैं।

इस ग्रंथ में कहा गया है कि जब लंका विजय के बाद सीताजी अशोक वाटिका से विभीषण द्वारा राम के पास लाई गईं, तब सीता के दर्शनार्थ सैनिकों की भीड़ को दूर हटाने के प्रयत्नों पर नाराज होकर राम ने कहा था -व्यसनेषु न कृच्छ्रेषु न युद्धेषु स्वयंवरे। न क्रतौ नो विवाहे वा दर्शनं दूष्यते स्त्रियां।। (वाल्मीकि रामायण, भाग- 2, सर्ग 114)। अर्थात् विपत्ति काल में, शारीरिक या मानसिक पीड़ा के अवसरों पर, युद्ध में, स्वयंवर में, विवाह में और यज्ञ में स्त्री का दिखाई देना या दूसरों की दृष्टि में आना दोष की बात नहीं है।

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यहां प्रसंग घूंघट का है, क्योंकि घूंघट का प्रश्न उस समय भी उपस्थित हुआ था जब रावण की मृत्यु के बाद महारानी मंदोदरी तथा दूसरी रानियां पैदल चलकर विलाप करती हुईं युद्धभूमि में पहुंची थीं। महारानी मंदोदरी कहती हैं-दृष्टा न खल्वभिक्रुद्धो मामिहानवगुण्ठिताम निर्गतां नगरद्वारात् पद्भयामेवागतां प्रभो।। (वाल्मीकि रामायण, भाग-2 , सर्ग 111) अर्थात् हे प्रभो, आज मेरे मुंह पर घूंघट नहीं है, मैं नगर द्वार से पैदल ही चलकर यहां आई हूं। इस दशा में मुझे देखकर आप क्रोध क्यों नहीं करते? इतिहास के दर्ज पन्नों से हम यह कह सकते है कि सीता और मंदोदरी के उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस समय ऋषि वाल्मीकि ने अपनी रामायण की रचना की थी, उस समय भारत में, विशेषकर उच्चवर्गीय महिलाओं में पर्दा प्रथा प्रचलित थी।

यह काल ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शताब्दी का रहा होगा। अब सवाल तो ये उठता है कि क्या सुरक्षा के लिए लिया जाता है घूंघट? बड़ा सवाल तो यह है कि भारतीय परंपरा में घूंघट कब और कैसे आया? क्या सनातन समय से यह परंपरा चली आ रही है या फिर कालांतर में यह प्रचलन बढ़ा है? या वास्तव में घूंघट हिंदुस्तान पर आक्रमण करने वाले आक्रमणकारियों की ही देन है?

क्या सुरक्षा के मद्देनजर रखा जाता रहा?

कुछ धर्मों में पर्दा रखना इसलिए जरूरी था, क्योंकि यह माना जाता था कि अगर महिलाएं खुद को पर्दे में रखेंगी तो वे अन्य पुरुषों से सुरक्षित रहेंगी। महिलाएं केवल अपने पति या पिता के सामने ही बेपर्दा हो सकती हैं। असल में तो महिलाओं को पर्दे में रखने का रिवाज मुस्लिम शासन के बाद से हुआ। भारत में राजपूत शासन के दौरान महिलाओं को आक्रमणकारियों के बुरे इरादों से बचाने के लिए उन्हें पर्दे में रखा जाता था।

इसका सबसे बड़ा उदहारण हैं चित्तौड़ की रानी पद्मिनी, जिनकी खूबसूरती को देख कर अलाउद्दीन खिलजी ने उन्हें पाने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया था। रानी पद्मिनी ने जौहर का प्रदर्शन किया और दुश्मन के चंगुल से बचने के लिए खुद को आग के हवाले कर दिया। तब से भारत में महिलाओं को पर्दे में रखने का रिवाज शुरू हुआ। लेकिन आज के युग ने इस कुप्रथा जैसी सोच का अंत कर दिया है, जो वक्त के हिसाब से जरूरी भी था। समय के साथ बदलाव जीवन को हमेशा नई ऊर्जा से जोड़ता है।

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