मरते मनुष्य के बारे में क्या करूं

अकु श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार : अकु श्रीवास्तव

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मरते मनुष्य के बारे में क्या करूं

क्या करूं मरते मनुष्य का

कवि रघुवीर सहाय की एक कविता है, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’। ये पंक्तियां उसी कविता की हैं। इंसान जब हताश होता है। मन से टूट जाता है। उसे लगने लगता है कि समाज उसका नहीं है, परिवार उसका नहीं है, तो कभी चिट्ठी लिखकर और कभी बिना चिट्ठी लिखे दुनिया को अलविदा कह देता है।

नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीबी) ने देश में आत्महत्या के जो ताजा आंकड़े जारी किए हैं, वे डराते हैं। डराने के साथ-साथ वे इस जरूरत पर भी जोर देते हैं कि अगर समाज ने और सरकारी नीतियों ने कुछ सकारात्मक नहीं किया तो बहुत मुश्किलें होंगी। इस कोरोनाकाल ने इन मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। इस मुश्किल वक्त में हम अपने आपको कैसे संभालते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है। एनसीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2019 में 139123 लोगों ने आत्महत्या की और इनमें से 93061 युवा थे। वर्ष 2018 की तुलना में देश में युवाओं से जुड़े आत्महत्या के मामले 4 फीसदी बढ़े। 2018 में 89407 युवाओं ने आत्महत्या की थी। कुल आत्महत्याओं के मामले भी 2019 में पिछले साल की तुलना में 3.4 प्रतिशत बढ़े।

अगर देश के दिहाड़ी मजदूरों की बात करें तो उनमें आत्महत्या के मामले बढऩे की दर बहुत डरावनी है। पिछले छह साल में दिहाड़ीदार मजदूरों में जान देने के मामले दोगुने हो गए हैं। कुल 139123 आत्महत्या के मामलों में से 32563 मामले दिहाड़ीदार मजदूरों के थे। यानी 23 प्रतिशत से भी ज्यादा अपनी जान देने वाले दिहाड़ीदार थे।

दिहाड़ीदार वे लोग हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए दिनभर जूझना होता है। उनके कोई बहुत बड़े सपने भी नहीं होते। वह न मकान बनाने के और न घोड़ा-गाड़ी के सपने देखता है। उसे और उसके बच्चों को रोज भरपेट खाना मिल जाए, यही उसका सपना होता है। जब कभी काम नहीं मिलता तो खाना भी नहीं मिल पाता। ऐसे में वह आत्महत्या के कगार पर पहुंच जाता है। संकटकाल में इस वर्ग को न समाज का संबल मिलते दिख रहा है और न ही सरकार से। एनसीबी के आंकड़े एक और दुखद पहलु से पर्दा हटाते हैं कि आत्महत्या करने वाले मजदूरों की संख्या गरीब राज्यों की तुलना में विकसित कहे जाने वाले राज्यों में ज्यादा है। तेलंगाना नंबर एक पर है।  महाराष्ट्र, केरल, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु जैसे प्रदेश भी इस सूची में हैं।

अकु श्रीवास्तव

दिहाड़ीदार मजदूरों के बाद सबसे ज्यादा संख्या में घरेलू कामकाजी महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं। 2019 में 21359 महिलाओं ने अपनी जान दी। डब्ल्यूएचओ का डाटा भी बताता है कि महिलाओं के आत्महत्याओं के मामले में भारत दुनिया में छठे स्थान पर है। महिलाएं बेहद संवेदनशील होती हैं और उनके ऐसा कदम उठाने के आंकड़े भी अलग होते हैं। बीस साल पहले भी पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान रोज कम से कम चार महिलाओं की आत्महत्या की खबरें आती थीं। इन सबके पीछे एक ही वजह होती थी। 9 दिन की दुर्गापूजा के दौरान चार नई साडिय़़ां उन्हें चाहिए होती थीं। जिनके पति या पिता ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं होते थे तो उनमें से कुछ इस वजह से ही जान दे देती थीं।

आंकड़े बता रहे हैं कि हर घंटे एक छात्र सुसाइड कर रहा है। उस पर दबाव बहुत है। माता-पिता उसे डॉक्टर या इंजीनियर बनते हुए देखना चाहते हैं। बच्चों पर दबाव के लिए मां-बाप जिम्मेदार होते हैं। उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए। बच्चों का तनाव कम करने के लिए जरूरी प्रयास करने चाहिए। छिछोरे जैसी फिल्मों और साहित्य से आप सीख ले सकते हैं।

यह थोड़ा सुकून की खबर है कि किसानों की आत्महत्याओं के मामलों में कमी आई है। कोरोनाकाल में भी अकेला कृषिक्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें सुधार दिख रहा है। दूसरी ओर बेरोजगारों की आत्महत्याएं बढ़ी हैं। बेरोजगारों में यह दर पहली बार 10 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है। 2019 में 14019 बेरोजगारों ने आत्महत्या की। यह स्थिति और विकट हो सकती है। कोरोनाकाल में करीब दो करोड़ लोगों का रोजगार गया है।

इसके आंकड़े अभी नहीं आए हैं। मध्यम वर्ग के जिन वेतनभोगियों ने अपने घर और गाड़ी के लिए कर्ज ले रखे हैं, वे रोजगार छिन जाने के बाद ये कर्ज की किश्त कैसे देंगे। आईटी और लॉजिस्टक क्षेत्र में ही नौकरियां बचेंगी। बाकी क्षेत्र बड़े दबाव में हैं। जिनकी अपनी संपत्ति 30 फीसदी कोरोना की भेंट चढ़ गई है, वे कैसे नौकरियां देंगे। सरकार को विचार करना चाहिए। सरकार देश को आर्थिक बर्बादी से बचाए।

बढ़ती आत्महत्या का आंकड़ा जो तस्वीर दिखा रहा है, वह संकट की तस्वीर है। इस पर चर्चा करना जरूरी है, ताकि इस तस्वीर को बदलने के लिए समाज और सरकार समय रहते अपना योगदान कर सकें। सभी को सोचना चाहिए कि कुछ जानें बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं। बीती ताहे बिसार दे, आगे की सुध लेय। भविष्य के बारे में सोचना जरूरी है। जान है, तो जहान है।

यह भी पढ़ें : संयुक्त राष्ट्र और भारत

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