फिर सच साबित हुए एल्बर्ट आइंस्टीन

वरिष्ठ पत्रकार – निरंकार सिंह

ब्रह्माण्ड मे ब्लैक होल्स (अंधेरी सुरंगों)की परिकल्पना सबसे पहले 1915 में एलबर्ट आइंस्टीन ने की थी। भौतिकी के क्षेत्र में इस साल का नोबेल पुरस्कार ब्लैक होल और सुपर मैसिव ऑब्जेक्ट्स से संबंधित खोजों के लिए रॉजर पेनरोज, रेनहार्ड गेंजेल और एंड्रिया गेज को दिया गया है। इसलिए एक बार फिर सच साबित हुए हैं आइंस्टीन। ब्रिटेन के रॉजर पेनरोज को ब्लैकहोल की खोज के लिए यह अवॉर्ड मिला है।

न्यूट्रॉन तारों और ब्लैक होल जैसी चीजों को ‘कॉम्पैक्ट ऑब्जेक्ट’ कहा जाता है। ब्लैक होल ब्रह्मांड का वह हिस्सा है जहां गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा है कि रोशनी भी इस क्षेत्र से वापस नहीं आ सकती। रॉजर ने दिखाया कि ब्लैक होल ऐल्बर्ट आइंस्टीन के जनरल रिलेटिविटी के सिद्धांत का जरूरी परिणाम था।

नोबेल समिति के सदस्य उल्फ डेनियलसन के मुताबिक रोजर ने यह कहने के लिए सैद्धांतिक नींव रखी कि यह वस्तुएं (ब्लैक होल) मौजूद हैं। अगर आप उनकी तलाश करें तो उन्हें पा सकते हैं।
रेनहार्ड और ऐंड्रिया ने हमारी आकाशगंगा के केंद्र में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल का अभी तक सबसे ठोस सबूत प्रदान किया है।’ इन्होंने इस विशालकाय चीज को पाया जिसे ’सैगिटैरियस ए‘ कहते हैं। अनेक तारे किसी ऐसी चीज की परिक्रमा कर रहे थे जो अब तक उन्होंने नहीं देखी। यह एक ब्लैक होल था।

यह कोई साधारण ब्लैक होल नहीं, बल्कि ‘सुपरमैसिव ब्लैक होल’ था जो हमारे सूर्य से 40 लाख गुना अधिक द्रव्यमान का था। आइंस्टीन के सिद्धांत से ही ब्लैक होल के बारे में दुनिया को जानकारी मिली थी। नासा द्वारा जारी की सैगिटेरियस ए नामक ब्लैक होल की तस्वीरों से एक बार उनके सिद्धांत और उनकी परिकल्पना की पुष्टि हुई है। खगोलविदों ने ब्लैक होल के बारे में बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

पहली बार अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के शोधकर्ताओं ने सूर्य से 60 लाख गुना वजनी ब्लैक होल द्वारा ब्रह्माण्डीय उथल-पुथल के तहत एक तारे को टूटते हुए देखा है। इस प्रक्रिया को ज्वारीय विघटन भी कहते हैं। इस विनाशकारी खगोलीय घटना को नासा के ग्रहीय खोज के लिए भेजे गये उपग्रह ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट और नील गेहरेल्स स्विफ्ट वैधशाला एवं अन्य संयत्रों की मदद से पहली बार बारीकी से देखा गया।

नासा ने बताया कि ब्रह्माण्ड में ज्वारीय विघटन बहुत ही दुर्लभ घटना है और प्रत्येक 10,000 से 1,00,000 वर्षो में हमारी खुद की आकाशगंगा के बराबर के तारक-पुंज या आकाशगंगा (गैलेक्सी) में एक बार यह घटना होती है। अब तक केवल 40 ऐसी घटना देखी गई है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक कैलीफोर्निया स्थित कार्नेजी वेधशाला के थाॅमस होलोइन के अनुसार ‘‘टीईएसएस की मदद से यह देखने में मदद मिली कि ब्रह्माण्ड में घटना वास्तव में कब शुरू हुई जिसे हम पहले कभी नहीं देख सके थे।

ज्वारीय विघटन की जल्द ही पहचान धरती पर स्थित ऑल स्काई ऑटोमेटेड सर्वे फाॅर सुपरनोवा (एएसएस-एसएन) से की गई और इस वजह से वे शुरूआती कुछ दिन में बहु-तरंगदैध्र्य को सक्रिय करके अवलोकन में सफल हुए। इस भौतिक घटना के समझने के लिए शुरूआती आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण होंगे। एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक यह ब्लैक होल आकाशगंगा के बीच में है। यह वोलन्स तारामंडल से करीब 37 करोड़ 50 लाख प्रकाश वर्ष दूर है।

कटे हुए तारे का आकार हमारे सूर्य के बराबर हो सकता है। नासा के मुताबिक इस ब्रह्माण्डीय घटना की खोज 29 जनवरी 2019 को विश्व भर में फैले 20 रोबोटिक दूरबीनों वाले एएसएएस-एसएन नेटवर्क की मदद से की गई। नासा ने बताया कि जब होलोइन को नेटवर्क के दक्षिण अफ्रीका में स्थित उपकरण से घटना की जानकारी मिली तब उन्होंने तुरन्त चिली के लास कैम्पनास स्थित उपकरण से घटना की वास्तविक स्थान का पता लगाने के काम पर लगाया और सटीक नजर रखने के लिए अन्य एजेंसियों की भी मदद ली।

टीईएसएस ने पहली बार इस ज्वारीय विघटन को 21 जनवरी को रिकार्ड किया था। सह लेखक और नेशनल साइंस फाउंडेशन में स्नातक शोधकर्ता पैट्रिक वाॅलेली ने कहा कि इस घटना की चमक बहुत स्पष्ट थी जिसकी वजह से इस घटना की ज्वारीय विघटन कके रूप में पहचान करने में मदद मिली।

होलोइन की टीम ने बताया कि दूरबीन की मदद से जिन पराबैंगनी रोशनी का पता चला उसका तापमान महज कुछ दिनों में 40,000 डिग्री सेल्सियस से गिरकर 20,000 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया। उन्होंने बताया कि पहली बार ज्वारीय विघटन के दौरान इतने कम समय में तापमान गिरावट देखी गयी है।हालांकि सैद्धांतिक रूप से पहले इसकी जानकारी थी।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी के वैज्ञानिक पाॅल मैकनमारा के अनुसार-‘करीब 50 साल पहले वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा के बीच एक चमकीले क्षेत्र का पता लगाया था।’ 1960 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक जाॅन आर्कवाल्ड व्हीलर ने उसे ही ‘ब्लैकहोल’ का नाम दिया। इस क्षेत्र का गुरूत्वाकर्षण बल इतना शक्तिशाली होता है कि प्रकाश सहित कोई भी वस्तु उसके खिंचाव से बच नहीं पाती है। तारे 20 साल में उसकी परिक्रमा पूरी करते हैं।

हमारी सौर प्रणाली में आकाशगंगा की परिक्रमा में 23 करोड़ साल लगते हैं। स्टीफन हाकिंग ने भी ब्लैक होल का व्यापक अध्ययन किया था। उन्होंने ब्लैक होल से निकलने वाले हाकिंग रेडियेशन की परिकल्पना की थी। वैज्ञानिकों के प्रयास से दुनिया ने पहली बार ब्लैक होल की तस्वीर देखी। असल में किसी भी ब्लैक होल की तस्वीर लेना असंभव है।

ब्लैक होल ऐसी संरचना है, जिससे प्रकाश भी वापस नहीं आता। ब्लैक होल की एक सीमा होती है, जिसमें पहुॅचते ही कोई भी पिंड घूमते हुए धीरे-धीरे उसके केन्द्र में समा जाता है। ब्लैक होल में हर पल अनगिनत पिंड समा रहे होते हैं।
पिछले साल भी भौतिकी का नोबल ब्रह्मांड की संरचना और इतिहास पर नये सिद्धांत रखने के लिए जेम्स पीबल्स (अमेरिका) और सौरमंडल से बाहर एक और ग्रह खोजने के लिए मेयर व क्वालेज (स्विटजरलैंड) को संयुक्त रूप से दिया गया था।

जेम्स पीबल्स द्वारा 1960 के दशक में बिग बैग, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी पर जो काम किया गया, उसे आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान का आधार माना जाता है।इस खोज से हमें पता चला कि ब्रह्मांड के महज पांच प्रतिशत पदार्थ के बारे में ही हम जान पाये हैं। ये वे पदार्थ हैं जिनसे तारे, ग्रह, पेड़-पौधे और हमारा निर्माण हुआ है।

बाकी 95 प्रतिशत हिस्सा अज्ञात डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है। आइंस्टीन के सिद्धांतों में भी ‘डार्क एनर्जी’ की भी जगह थी, हालांकि वह खुद इसके बारे में संशकित थे। वह इसे अपनी एक ‘ब्लंडर’ मानते थे। ‘डार्क एनर्जी’ ऐसी अनजानी ऊर्जा है, जिसकी वजह से ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है और आकाशीय पिंड एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं।

वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे ब्रह्मांड का 70 प्रतिशत इससे बना है, हालांकि यह ऊर्जा क्या है किसी को नहीं पता।कई वैज्ञानिक हजारों-लाखों प्रकाशवर्ष दूर की आकाशगंगाओं का अध्ययन करके डार्क एनर्जी और इसके गुणों को जांचने की कोशिश कर रहे हैं। जो तथ्य और आंकडे मिले हैं, उनसे साबित होता है कि जिसे आइंसटाइन ‘ब्लंडर’ मानते थे, वह भी उनकी प्रतिभा का एक कमाल था जो आज सच साबित हो रहा है।

कुछ वर्ष पहले उनके सिद्धांत की पुष्टि के लिए अमेरिका की ‘नेशनल रेडियो स्ट्रोनामिकल आब्जर्वेटरी’ ने वृहस्पति ग्रह से पृथ्वी की ओर आती एक प्रकाश किरण की गति और उसके मार्ग की नाप जोख की। यह देखा गया कि यह प्रकाश (जो लाखों प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक क्वासर तारे से चला था) जब वृहस्पति के पास गुजर रहा था तो उसने अपनी दिशा बदल दी और पृथ्वी की ओर मुड़ गया। आइंसटीन ने कहा था कि पदार्थ और ऊर्जा दोनों एक ही है।

इसलिए जब कोई किरण किसी ग्रह के पास से गुजरती है तो ग्रह के गुरूत्वाकर्षण बल के कारण उसकी दिशा बदल जाती है। इस प्रयोग से उनकी यह बात सिद्ध हो गयी है।

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