पश्चिम बंगाल पहुंचे ही थे अमित शाह, इससे पहले ही ममता बनर्जी ने चल दिया बड़ा दांव

तारकेश्वर मिश्र

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को रोकने के प्रयास में हर प्रकार के दांव आजमा रही तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अब जातिगत समीकरण को भी चुनावी मोहरा बनाने की कवायद शुरू कर दी है। देशद्रोह के मामलों से जुड़े दो नेताओं पर दांव लगा चुकी ममता ने राज्य के आदिवासी और पिछड़ी जाति के लोगों पर खास मेहरबानी की है। कुछ दिनों पहले दलित साहित्य को विकसित करने के लिये अकादमी के गठन की घोषणा की गयी थी और अब राज्य के मथुआ सम्प्रदाय के लोगों के लिए एक विकास परिषद की स्थापना और उसे 10 करोड़ रूपये आवंटित करने की घोषणा की गयी है। मुख्यमंत्री ने राज्य सचिवालय में बुधवार को इसकी घोषणा के साथ ही राज्य के 25 हजार आदिवासी परिवारों को सरकारी जमीन का पट्टा भी जारी किया।

ममता बनर्जी

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर बुधवार रात को पहुंचे हैं। अमित शाह का मतुआ समाज के लोगों से मिलने का कार्यक्रम है और साथ ही वह राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों की चुनावी रणनीति पर पार्टी के नेताओं के साथ बाँकुड़ा में एक बैठक करने वाले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में शाह के दौरे से पहले ममता बनर्जी सरकार की नयी घोषणाएं चुनावी शतरंज की नयी चाल हैं और अब भारतीय जनता पार्टी की अगली चाल की प्रतीक्षा रहेगी।

वैसे देशद्रोह के मामलों में सजा पा चुके पूर्व माओवादी नेता छत्रधर महतो को पार्टी में बड़ा पद देकर और पर्वतीय इलाके के नेता बिमल गुरुंग को एनडीए से अलग करके भी ममता बनर्जी को कोई विशेष सफलता मिलती नहीं नजर आ रही है। उन्होंने जंगलमहल के आदिवासी और पूर्व माओवादी नेता छत्रधर महतो को जेल से निकाल कर तृणमूल राज्य कमेटी में शामिल किया, तो दूसरी ओर उत्तर बंगाल में अलग गोरखालैंड राज्य मांगने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा प्रमुख बिमल गुरुंग को घुटने पर लाकर भाजपा का 11 साल का साथ छोड़ने को मजबूर कर दिया। गुरुंग के खिलाफ हत्या, आर्म्स एक्ट, यूएपीए, देशद्रोह समेत 150 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं और इस कारण पर्वतीय इलाके के साथ ही राज्य के अन्य इलाकों की जनता ममता के इस कदम का विरोध करते दिख रहे हैं।

माओवाद प्रभावित रहे जंगलमहल के पांच जिलों के आदिवासियों के बीच प्रभावी रहे छत्रधर महतो को लेकर भी तृणमूल ने जो दांव खेला है, वो अब उल्टा पड़ता दिख रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी महतो को फिर से हिरासत में लेना चाहती है और वह बीमारी का बहाना बनाकर भागते फिर रहे हैं। ऐसे में आदिवासी समुदाय को साधने का ममता बनर्जी का नया दांव कितना सफल होगा ये आने वाला समय तय करेगा।

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