
फाजिलनगर (कुशीनगर) | किसी को घूमने का शौक है तो किसी को महफिल सजाने का, लेकिन समाजसेवी नंदलाल विद्रोही का जुनून कुछ अलग है। उन्हें क्षेत्र की बदहाल सड़कों को मुद्दा बनाकर आवाज बुलंद करने, अधिकारियों तक ग्रामीणों की पीड़ा पहुंचाने और जनसमस्याओं को लेकर सड़क पर उतरने का जुनून है। इसी जुनून के चलते एक बार फिर सूफीगंज की सड़क को लेकर उन्होंने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। इस बार मुद्दा सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि किसानों की लागत, गन्ने की ढुलाई और गांव के विकास का है। ग्रामीणों का आक्रोश इतना है कि उन्होंने साफ कह दिया है कि सड़क नहीं तो मतदान नहीं।
फाजिलनगर विकास खंड के ग्राम अवरवां सूफीगंज में सड़क की बदहाली किसानों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है। गन्ना बाहुल्य गांव होने के बावजूद पक्की सड़क के अभाव में किसानों को गन्ना चीनी मिल तक पहुंचाने के लिए करीब सात किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। इससे ढुलाई का खर्च बढ़ता है और किसानों की कमाई पर सीधा असर पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 20 वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।ग्रामीणों के मुताबिक सूफीगंज के उत्तरी हिस्से से निकलने वाला करीब तीन किलोमीटर लंबा खड़ंजा मार्ग चंदौटा, सोमहा मंदिर-अमृत सरोवर और कुचिया मठिया के टोला कुचिया पिपरा होते हुए पटहेरिया रोड से जुड़ता है। यदि इस मार्ग को पिच कर दिया जाए तो गन्ना किसानों को चीनी मिल तक पहुंचने में करीब सात किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी से राहत मिल सकती है। किसानों का तर्क है कि सड़क निर्माण से समय और ढुलाई खर्च दोनों की बचत होगी। इसका सीधा लाभ उनकी आमदनी पर पड़ेगा।विडंबना यह है कि जिस गांव में गन्ने की खेती किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है, वहीं सड़क की समस्या खेती के प्रति उनका उत्साह कम कर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जब गन्ना खेत से मिल तक पहुंचाना ही महंगा पड़ेगा तो किसान भविष्य में इसकी खेती से दूरी बनाने पर मजबूर होंगे। ऐसे में सड़क की मांग महज आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि खेती को बचाने और किसानों की आय बढ़ाने से जुड़ा सवाल बन गई है।किसानों का कहना है कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने की बात करती है, लेकिन उनके गांव में सड़क के अभाव के कारण अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक करीब दो दशक से सड़क निर्माण की मांग के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो सका है। उनका सवाल है कि जब तीन किलोमीटर सड़क बनने से किसानों को सात किलोमीटर के अतिरिक्त चक्कर से मुक्ति मिल सकती है तो इस मांग पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?समाजसेवी नंदलाल विद्रोही के नेतृत्व में जुटे ग्रामीणों ने सड़क निर्माण की मांग को लेकर अपना आक्रोश जाहिर किया। किसानों और युवाओं का कहना है कि यदि सड़क नहीं बनी तो वे मतदान के समय अपना फैसला इसी मुद्दे के आधार पर करेंगे। प्रदर्शनकारियों के बीच यह नारा भी चर्चा में रहा कि सूफीगंज में सड़क नहीं तो कमल नहीं खिलेगा। ग्रामीणों का कहना है कि राजनीतिक समर्थन अपनी जगह है, लेकिन गांव की बुनियादी समस्या की अनदेखी अब स्वीकार नहीं होगी।सड़क के सवाल पर अलग-अलग विचार रखने वाले ग्रामीणों का एकजुट होना इस मांग की अहमियत को दर्शाता है। अब सबकी निगाहें लोक निर्माण विभाग और प्रशासन पर टिकी हैं कि किसानों की इस मांग पर कब तक ठोस पहल होती है।क्षेत्र में नंदलाल विद्रोही की पहचान जनसमस्याओं को लेकर आवाज उठाने वाले समाजसेवी के रूप में बनी है। खासकर खराब और जर्जर सड़कों को लेकर उनका प्रदर्शन तथा अधिकारियों का ध्यान खींचने की कोशिशें अक्सर चर्चा में रहती हैं। समर्थकों के बीच उनकी इस कार्यशैली को लेकर चर्चा है तो उनकी सक्रियता पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आती हैं। फिलहाल सूफियागंज की सड़क का मुद्दा एक बार फिर उनके आंदोलन का केंद्र बन गया है।
इस मौके पर सौरव, उपेंद्र यादव, श्रीकांत यादव, संतोष गोस्वामी, हरिओम मिश्रा, त्रिभुवन नारायण मिश्रा, राकेश मिश्रा, कमलेश मिश्रा, देवेंद्र तिवारी, आदित्य तिवारी, हर्षप्रकाश तिवारी, जयप्रकाश तिवारी और शिवम मिश्रा समेत बड़ी संख्या में किसान, युवा, महिलाएं और ग्रामीण मौजूद रहे।अब सवाल यह है किक्या तीन किलोमीटर सड़क की मांग पूरी होने से किसानों को राहत मिलेगी या ग्रामीणों को अपनी आवाज बुलंद करने के लिए आगे भी आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा? फिलहाल सूफियांगंज के किसानों की मांग साफ है कि सड़क बने, ढुलाई का खर्च घटे और गांव के विकास का रास्ता खुले।



