कब बंद होगी खाद्य उत्पादों की बर्बादी

अरविंद जयतिलक

एसोचैम और एमआरएसएस इंडिया (बाजार रीसर्च कंपनी) की रिपोर्ट पर गौर करें तो भारत में हर वर्ष 440 अरब डॉलर (गुरुवार को एक डॉलर 73.44 भारतीय रुपये के बराबर था ) के मूल्य के बराबर दूध, फल और सब्जियां बर्बाद होते हैं। वहीं दूसरी ओर देश में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं होती।

उचित रखरखाव के अभाव में उत्पादन का 40 से 50 प्रतिशत भाग हर वर्ष बर्बाद होता है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में तकरीबन 6400 कोल्ड स्टोरेज इकाइयां हैं जिसकी कुल भंडारण क्षमता तकरीबन 3.01 करोड़ टन की है। आनुपातिक तौर पर यह भंडारण क्षमता उत्पादित होने वाले कुल खाद्य पदार्थों का सिर्फ 11 प्रतिशत ही है।

इस भंडारण क्षमता का अधिकतर भाग उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और पंजाब में फैला है। विडंबना है कि खाद्य उत्पादों की बर्बादी में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी इन्हीं राज्यों की है।

दक्षिण भारत की बात करें तो यहां का मौसम का मिजाज उत्तर भारत की तुलना में गरम और उमस भरा होता है। लिहाजा यहां दूध, फल और सब्जियां अपेक्षाकृत तेजी से खराब होती हैं। अगर इन्हें कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रखा जाए तो इनकी बर्बादी को रोका जा सकता है।

कोल्डस्टोरेज की कमी के साथ ही उनके संचालन के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, अप्रचलित तकनीकें और अनियमित बिजली सप्लाई भी खाद्य उत्पादों की बर्बादी के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर साल उतना भोजन बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है।

आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 2019-20 में कुल अनाज उत्पादन तकरीबन 29 करोड़ टन था। भारत दुनिया के उन शीर्षतम देशों में शुमार है जो सर्वाधिक अन्न का उत्पादन करता है। लेकिन ‘विश्व में खाद्य सुरक्षा एवं पोषण स्थिति रिपोर्ट 2019’ पर गौर करें तो भारत में अल्पपोषित लोगों की संख्या 18.92 करोड़ है। यह आंकड़ा दुनिया में सर्वाधिक है।

एक अन्य आंकड़े के मुताबिक कुपोषण के कारण देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष के कम उम्र के 38.4 प्रतिशत बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई के हैं। 21 प्रतिशत का वजन कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना ढ़ाई हजार से अधिक बच्चों की जान जाती है। 2019 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 117 देशों में से भारत को 102 वां स्थान मिला।

यहां ध्यान देना होगा कि बर्बाद भोजन को पैदा करने में 25 प्रतिशत स्वच्छ जल का इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषि के लिए जंगलों को भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है। बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है।

उसी का नतीजा है कि आज खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है। खाद्य वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन की अधिकता से भोजन से पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान में प्रोटीन की कमी होने लगी है। आंकड़ों के मुताबिक चावल में 7.6 प्रतिशत, जौ में 14.1 प्रतिशत, गेहूं में 7.8 प्रतिशत और आलू में 6.4 प्रतिशत प्रोटीन की कमी दर्ज की गयी है।

अगर कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया भर में 15 करोड़ लोग इस नई वजह के चलते प्रोटीन की कमी का शिकार हो जाएंगे। यह दावा हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा अपनी रिपोर्ट में किया गया है। गौरतलब है कि प्रोटीन की कमी होने पर शरीर की कोशिकाएं उतकों से उर्जा प्रदान करने लगती हैं।चूंकि कोशिकाओं में प्रोटीन भी नहीं बनता है, लिहाजा इससे उतक नष्ट होने लगते हैं। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आयी तो भारत के अलावा उप सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी यह स्थिति भयावह होगी।

बढ़ते कार्बन डाइ आक्साइड के प्रभाव से सिर्फ प्रोटीन ही नहीं आयरन कमी की समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया एवं उत्तर अफ्रीका समेत दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की संभावनाएं हैं।प्रोटीन की कमी से कई तरह की बीमारियों का खतरा उत्पन हो गया है। याद होगा गत वर्ष पहले इफ्को की रिपोर्ट में कहा गया था कि कुपोषण की वजह से देश के लोगों का शरीर कई तरह की बीमारियों का घर बनता जा रहा है।

कुछ इसी तरह की चिंता ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भी जताया जा चुका है। यूनाइटेड नेशन के फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट में भी कहा जा चुका है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भी भारत में पिछले एक दशक में भूखमरी की समस्या में खास कमी नहीं आयी है।

भारत समेत दुनिया भर में सालाना 1.6 अरब टन अन्न की वैश्विक बर्बादी हो रही है। इसकी कीमत तकरीबन 1000 अरब डॉलर है। आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों में अन्न की बर्बादी के कारण 680 अरब डॉलर और विकासशील देशों में 310 अबर डॉलर का नुकसान हो रहा है।

ध्यान देने वाली बात यह कि अमीर देश भोजन के सदुपयोग के मामले में सबसे ज्यादा संवेदनहीन और लापरवाह हैं। इन देशों में सालाना 22 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। जबकि उप सहारा अफ्रीका में सालाना कुल 23 करोड़ टन अनाज पैदा किया जाता है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की ही बात करें तो यहां जितना अन्न खाया जाता है उससे कहीं अधिक बर्बाद होता है।

आंकड़ों के मुताबिक केवल खुदरा कारोबारियों और उपभोक्ताओं के स्तर पर अमेरिका में हर साल 6 करोड़ टन अन्न बर्बाद होता है। अगर भारत की बात करें तो देश में 2014 में किराना व्यापार 500 अरब डॉलर का था जो 2021 तक 850 अरब डॉलर होने की संभावना है। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि इस उद्योग में खाद्य पदार्थों को एकत्र करने, स्टोर करने और एक से दूसरी जगह भेजने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल हो ताकि अन्न की बर्बादी रुके और लोगों का पेट भरा जा सके।

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