बहुत जरूरी है सरकारी नौकरियों का निजीकरण

आशीष बाजपेयी
आशीष बाजपेयी

सरकारी स्कूलों के टीचर की सैलरी 89000/रु महीना और और काम सोना या फिर बैठ कर गप्पे हांकना यही काम होता है इनका। इनको पूछने वाला कोई नहीं। पुलिस का सिपाही/दरोगा सिर्फ इतना सा काम करता है-

दिन में ड्यूटी करना। रात में गश्त करना। फिर रोड गश्त करना। वाहन चेक, लॉज, होटल, ढाबे, बैंक, डाकघर, धार्मिक स्थल चेक करना। बदमाशों की निगरानी। मुलजिम पेशी कराना। मुलजिम को जेल छोडऩा। पेंशनरों की चेकिंग करना। थाने की साफ सफाई और रंगाई पुताई।

भाई, रिसर्च अधूरी है। कुछ मैं भी जोड़ता हूं-

धार्मिक एवं राजनैतिक रैलियों को सुरक्षा देना। भुजरिया, जन्माष्टमी, डोल ग्यारस, अनंत चौदस, नवरात्रि, विसर्जन, दशहरा, दीपावली, महाशिवरात्रि, होली, रंगपंचमी, रामनवमी, हनुमान जयंती, मोहर्रम-ताजिये, मीठी ईद, बकरीद, मिलादुन्नबी जलसा, गुरुनानक जयंती, सहित सभी धर्म प्रेमियों के धार्मिक त्योहार, एवं जयंतियों मंख यातायात एवं सुरक्षा व्यवस्था करना। गांव-गांव में रक्षा समिति गठित करना। जुलूस, जलसा, नेताओं की आमसभा में सुरक्षा व्यवस्था। साधू-संतों के प्रवचन की सुरक्षा व्यवस्था। कानून व्यवस्था, रोड व्यवस्था, वीआईपी की सुरक्षा व्यवस्था। आदि, आदि ड्यूटियां करना।

बॉस! असली काम तो भूल ही गए-

रिपोर्ट लिखना। स्थायी रिकार्ड मेंटेन करना। चुनाव में चुनाव ड्यूटी, बोर्ड परीक्षा ड्यूटी करना।

अपने क्षेत्र में बाहर से आये लोगों की फर्द-ब कटवाना। अपने क्षेत्र का बदमाश कहीं बाहर रह रहा है, तो उसकी फर्द-अ कटवाना। किरायेदार का सत्यापन। क्षेत्र में अपराध न होने देना। अपराध हो गया तो तुरंत सुरक्षा व्यवस्था करना। एक्सिडेंट हो गया, कोई घायल हुआ तो तुरंत चिकित्सा व्यवस्था हेतु निकट के शासकीय अस्पताल लेकर जाना और उपचार करवाना।

आशीष बाजपेयी

पाठकों! याद दिला दूं कि पुलिस के भड़ासिए ग्रुप से मैं अब तक बेदखल (रिमूव) नहीं किया गया हूं। इसलिए उनकी भड़ास ज्यों की त्यों परोस रहा हूं। आज तो हद हो गई। सिपाही/दारोगा के घोषित-अघोषित कामों पर भाई लोग जैसे रिसर्च पेपर लिख रहे हों। और ग्रुप पर यूं पोस्ट कर रहे हैं, मानो कि शायरों-कवियों की महफिल जमी है और ‘समस्या पूर्तिÓ वाली विधा में मुशायरा चल रहा हो। देखिए, एक सिपाही याद दिला रहा है।

और कोर्ट-कचेहरी?

चालान पेश करना। साक्षी पेश करना। आरोपी कोर्ट से गैरहाजिर हो गया हो तो उसे खोजकर पेश करना। समन वारंट तामील करवाना। अपराधी फरार हो गया हो तो पटवारी व तहसीलदार से चल-अचल सम्पत्ति का विवरण लेकर उद्घोषणा कराना। बरामद आलाजरब बतौर सबूत न्यायालय में जमा करना। मुलजिम को जेल से पेशी हेतु सुरक्षित न्यायालय पेश करना और पेशी के बाद वापस सुरक्षित जेल छोड़ना। जेल में बीमार हो गया हो तो उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कर उपचार करवाना। दौराने इलाज मृत्यु हो जाने पर परिवारजनों को सूचना देना, पीएम करवाना, लाश परिवारजनों के सुपुर्द करवाना, लाश ले जाने की व्यवस्था परिवारजनों के पास उपलब्ध नहीं है तो लाश को ले जाने की व्यवस्था करना, निवास स्थान पहुंचाना। अज्ञात लाश का फ़ोटो करवाना, फिंगर प्रिंट करवाना, बाद में पीएम करवाना, बिसरा जप्त करवाना, बाद में कपड़े जप्त करवाना, तहसीलदार या न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचना देना, नगर पालिका को सूचना देना, सुरक्षित स्थान पर दफनवाना, अज्ञात लाश का स्थानीय समाचारपत्रों में इश्तिहार निकलवाना, गजट नोटिफिकेशन के लिए निकलवाना, जप्त बिसरा ड्राप्ट तैयार करवाकर विधिक प्रयोगशाला भेजना और जांच करवाना। मृतक के परिजन थाने पर आयें तो बार-बार मृतक के कपड़े खोल कर दिखाना एवं फ़ोटो दिखाना।

और कोई गुम हो गया है तो उसकी तलाश करना। कोई लड़की या महिला भाग गई हो या कोई भगा कर ले गया हो तो उसे तलाश कर पकडऩा। लड़की को परिवारजनों को सुरक्षित सुपुर्द करना। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के व्यक्तियों पर अपराध होने की स्थिति में जाति प्रमाण पत्र बनवाना। इस शायराना भड़ास से ‘मुझे दुनिया में कितना गम है, अपना गम कितना कम हैÓ वाली फीलिंग आना शुरू ही हुई थी कि एक रूखी पोस्ट गिरी-

छुट्टी की आवश्यकता पडऩे पर अधिकारियों के समक्ष गिड़गिड़ाना। अधिकारी की मेहरबानी से छुट्टी पर जा भी सकते हो और नहीं भी। फिर भी कुछ लोग कहते हैं, पुलिस काम ही क्या करती है, पाठकवृंद! ग्रुप पर इस रूखी पोस्ट के बाद से सन्नाटा पसरा है। इसलिए मेरी भी सोच के घोड़े दौड़ रहे हैं। सच में, बाहर से रौबीली दिखने वाली खाकी वर्दी के भीतर कितनी सड़ांध है। इस सड़ांध को दूर करने वाला कोई डियो या परफ्यूम बनेगा कभी। पुलिस, पत्रकार और कुत्तों को सोते देखा है कभी। सन्नाटे के बीच में, मैं खुद से ही सवाल कर रहा हूं। इस बीच किसी ने ऑडियो क्लिप साझा की है। इस नोट के साथ-

एक पुलिसकर्मी की बेबसी। अपनी बच्ची से वार्ता करने की भावुक ऑडियो क्लिप। मैं अब यह क्लिप सुन रहा हूं और ज्यों-ज्यों सुनता जा रहा हूं। कलेजा मुंह को आ रहा।

ट्रांसक्प्टि देखिए।

हेलो !

क्या कर रहे, सो रहे हो?

न, कुछ नहीं !

पति-पत्नी के रात्रि वार्तालाप में मायूसी घुलती कि इससे पहले ही फोन शायद नन्हीं बेटी ने लपक लिया, जिसे लोरी की जगह सोने के लिए उम्मीद का कमजोर कोना पकड़ा दिया गया हो। चिडिय़ा सी चहकती आवाज गूंजी।

डैडी! आज मैं इतना खुश हूं कि मम्मा ने बताया कि आज शाम को डैडी आ रहे हैं।

दूसरी तरफ से मायूस सी स्वीकारोक्ति, अच्छा बेटा!

बेटी अपनी भावनाएं यूं व्यक्त कर रही थी कि मानो, परीकथा सुना रही हो, और मैं आपकी आंखें बंद कर लूंगी तो डैडी कहेंगे, अरे ये कौन है। और मैं आपको गले लगाकर सोऊंगी।

अरे वाह बेटा! मायूसी को ढकती आवाज।

कब आओगे डैडी?

पता नहीं बेटा, मम्मा को फोन देना।

डैडी मम्मा ने बोला है कि आज आओगे। आ जाना डैडी।

बेटी के इस आदेशात्मक लहजे के बाद दूसरी तरफ से चंद लम्हों की खामोशी ने ही परीकथा में जहर घोल दिया हो जैसे। बेटी को समझते देर न लगी कि उसके साथ फिर धोखा हुआ। सिसकियां, शिकायत, रुदन, समझाइश और शब्दों में न बयां हो सकने वाली तितरफा पीड़ा। कभी बेटी डैडी से खफा तो कभी मम्मा की शिकायत। मम्मा कभी बेटी को समझा रही तो कभी खुद को। अंतहीन पीड़ा। भावुकता का चरम और सामने नग्न खड़ा सच। वर्णन नि:शब्द।

पीड़ा नजर के सामने से गुजर कर जिगर के पार हो रही। ग्रुप से रिमूव किए जाने की प्रतीक्षा किए बगैर अब मैं लेफ्ट हो रहा हूं।

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