‘कलम’ का सिर कलम करना सरकारों का शगल है

Ashok Pandey
लेखक- अशोक पांडेय

सरहदें वही महफूज रहती हैं जहां कलमपरस्तों की हिफाजत हुकूमतें करती हैं। निश्चय ही पत्रकारिता ही वह आईना है जो नेताओं को उनकी कलुषित आत्मा की कालिमा को दिखा सकता है। लेकिन बड़े ही भरे मन से लिखना पड़ रहा है कि आज लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दंभ भरने वाले बड़े मीडिया हाउस और उनके स्वनामधन्य संपादक पत्रकारिता को चाटुकारिता की चासनी में लपेटकर चटखारे ले लेकर मजा लूट रहे हैं।
पत्रकार प्रवर- पं. प्रतापनारायण मिश्र, शहीद शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णुराव पराडकर के देश में अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर एक भी विचार, एक भी विरोध, एक भी संपादकीय टिप्पणी देखने या पढ़ने को नहीं मिली।

दमदार अवाज को किस तरह बेदम करने की कुत्सित कोशिश हो रही है और सारा मीडिया जगत मौन है। हमें एक न एक दिन इस मौन की कीमत चुकानी पड़ेगी। कलम के सिपाहियों और आवाज के जादूगरों को यह याद रखना चाहिए कि ‘कलम’ का सिर कलम करना सरकारों का शगल है।

शेर की दहाड़ जैसी दमदार अवाजों को बेदम करना नेताओं की नेपथ्यकारी नीति है। लोकतंत्र की नींव को असहमति के स्वर ही पहाड़ जैसी मजबूती प्रदान करते हैं। लेकिन राजनीति उस नींव को रोज-ब-रोज खोखला कर रही है और हमारी कलम की स्याही सुर्ख न होकर स्याह हो रही है।
भारत गांवों का देश है। गांव में जब आग लगती है तो पड़ोसी दुश्मन भी बाल्टी में पानी लेकर आग बुझाने दौड़ पड़ते हैं। क्योंकि उन्हें यह इल्म है कि आग की ये लपटे उनका आशियाना भी जला देंगी। अखबारों को हम अर्नब के पड़ोसी गांव का मान सकते हैं।

लेकिन उनके अपने गांव के रुपहले पर्दे वाले पड़ोसी इस आग में अपनी हथेलियां सेंक रहे हैं। कोरोना काल में पलायन करते मजदूरों की कराहों पर चीखने वाले सुंदर चेहरे अर्नब की गिरफ्तारी पर चुप हैं। हाथरस रेप कांड में पेट फाड़कर चिल्लाने वालों की सांसें थमी हुई हैं, गला बैठा हुआ है। हम अर्नब की महिमामंडन न करते कम से कम उसकी गिरफ्तारीकी खबर तो प्रमुखता से छाप सकते थे।
आज जो अर्नब के साथ हो रहा है कल किसी भी पत्रकार के साथ हो सकता है। किसी भी कलम की स्याही राजनीतिज्ञों को बारुद लग सकती है। सत्ता की एक अपनी ताकत होती है। लोकतंत्र में चुना हुआ नेता ही राजा है और राजाज्ञा ही कानून है।

यदि राजा धृतराष्ट्र है तो उसे दोषी नहीं दे सकते क्योंकि उसे न्याय-अन्याय कुछ दिखाई नहीं देता। पर जिन्हें दिखाई दे रहा है और वे आंखें मुंद कर बैठे रहें तो वह दिन दूर नहीं जब पत्रकारिता से अवाम का भरोसा उठ जाएगा। सरकारें ‘जन’ से नहीं ‘गन’ से चलती हैं लेकिन लोकतंत्र ‘जन-गन-मन’ से चलता है। कलम के सिपाहियों उठो, जागो जनशाही को जिताओं और तानाशाही को लात लगाओ।

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