दीनदयाल उपाध्याय और अल्पसंख्यकवाद

Ashok Pandey

वरिष्ठ पत्रकार : अशोक पाण्डेय

आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है अल्पसंख्यकवाद। इसके पीछे मूल कारण है अल्पसंख्यकवाद का सत्ता-समीकरण में प्रभावशाली होना। राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का ताजातरीन उदाहरण विगत लोकसभा चुनावों में अल्पसंख्यकवाद रहा है। जिसका बड़ा प्रमाण यह है कि भारत के राजनीतिक दलों के रहनुमा जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर अनेक मुख्यमंत्री तक सम्मिलित थे, मुस्लिम मजहब के सरमायेदारों के सामने इस प्रकार विनत रहे, जिस प्रकार किसी जमाने में बगदाद के खलीफा के सामने तद्युगीन वहां की जनता नाक रगड़ा करती थी। अनजाने में ही कुर्सी के दावेदारों ने दिल्ली के शाही इमाम को मजहबी समर्थन के लिए असीमित राजनीतिक महत्व दे दिया।

वे और हैदराबादी रहनुमा जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधि बन गये। हमारे जननेता पुख्ता सबूतों के साथ जामा मस्जिद की ड्योढ़ी को पार करते हुए इमाम के सामने तलब होते और समर्थन के आश्वासन पर फूल कर कुप्पे होते थे। महाराणा प्रताप और सूरजमल के वंशजों ने संविधान में लिखित धर्म के लिएप्रमाण पत्र लेने के लिए मजहबी रहनुमाओं के दरवाजे पर दस्तक दी। इससे शर्मनाक स्थिति किसी प्रजातंत्र के लिए क्या हो सकती है? क्या यह दस्तक, यह विनय, यह प्रणाम, यह दृश्य, राष्ट्र की अखण्डता के लिए था या दिल्ली के तख्त के लिए ।

मामले को थोड़ा पीछे खींचे, जब मंदिर-मस्जिद विवाद पूरे उफान पर था और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन छत्रप और कृष्ण के तथाकथित वंशज पूरे प्रदेश में छाती फाड़कर दिखा रहे थे कि उनके हृदय में मोहम्मद साहब विराजमान हैं और शाहजहां के किले पर खड़े होकर आलमगीर की ओर इशारा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री, शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह के स्वतंत्रता के प्रयासों जैसे पापों का प्रायश्चित करते हुए राष्ट्र के गौरव, जन्मभूमि के सच्चे सपूत मुहम्मद साहब के जन्म दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करते हुए मुगल हुकूमत को चुनौती दे रहे थे कि इस लालकिले से जो कार्य आप नहीं कर पा रहे उसे आज मुझ जैसे धर्मनिरपेक्ष ने कर दिखवाया और इसके बदले मौलानाओं से उन्होंने विजयी भव का आशीर्वाद प्राप्त किया। स्थिति यह है कि आज धर्म निरपेक्षता का अर्थ बदल गया है।

Deendayal

राजनीतिज्ञों की कुत्सित मनोवृत्ति के कारण घृणा की मोटी चादर जनता को ढके हुए है। यह तुष्टीकरण की ही मनोवृत्ति है, जिसकी वजह से समाज खण्डों में विभाजित होने के लिए व्याकुल है। आर्य समाज, सिख यहां तक की रामकृष्ण मिशन जैसे हिन्दू मूलत: संस्कृति की रक्षा के लिए विकसित संगठन अल्पसंख्यक बनने के प्रयास में हैं। हिन्दू समाज के इस अलगाव और मुस्लिम समाज के दबाव ने सारे समाज को ज्वालामुखी के मुख पर खड़ा कर दिया है। विगत 73 वर्षों में इस विस्फोटकस्थिति के लिए वे नेता जिम्मेदार हैं, जो सत्य से आँख मिचौली खेलने के लिए झूठ का सहारा ले रहे हैं।

कम्यून से बने कम्यूनिस्ट और जाति और मजहब के पुजारी अन्य दल स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहते हुए उन संगठनों को साम्प्रदायिक कहते हैं, जो देश को जन से जोड़ने की बात करते हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय,  जिन्होंने भारतीय जनसंघ के जन्म से दल की नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , पंडित नेहरू की दृिष्ट में कम्यूनल ही रहे। पण्डित दीनदयाल उपध्याय ने इसका स्पष्ट उत्तर दिया था और वे उत्तरित प्रश्न आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

दीनदयाल उपाध्याय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि अल्पसंख्यक समस्या मूलत: राजनैतिक है। अखण्ड भारत की कल्पना अगर किसी मन में है तो उसे हिन्दू बहुसंख्यक के आधार पर ही बांधा जा सकता है। जहां तक हिन्दू इतर बहुसंख्यक हुए वहां उनमें भारत से िवलग होने की प्रवृत्ति बढ़ी और इतिहास साक्षी है की वे क्षेत्र भारत से अलग होते रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? बहुसंख्यक होने पर भारत के साथ उनकी राष्ट्रीयता क्यों नहीं जुड़ी। क्योंकि वे दबाववश भारतीय हैं। उनका अन्तर्मन भारतमाता का नहीं है। कश्मीर का प्रश्न आज हमारे सामने है। सारे हिन्दुस्तान ने कश्मीर को भारतमाता का शीश कहा है जो स्वयं कटने के लिए तैयार हो हम उन्हें जोड़ने के लिए कितने भी उदार अधिकार दे दें वे भारत को राष्ट्र नहीं मान पाते।

वैसे ही जैसे हजारों साल तक विदेशियों ने शासन करके भी भारत को प्रजा ही माना कभी भी अपने को भारतमाता का पुत्र नहीं माना। तुष्टीकरण के तमाम प्रयासों के परिणाम रहें- ढेर सारे अलगाववाद और बहुत सी माताएं, बंग-माता और आन्ध्र-माता के नारे। धर्मनिरपेक्षता ने हमें दिया खालिस्तान और कश्मीर का मजबूत अलगाववाद।

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने पाकिस्तान बनने के बाद की स्तिथियों का आंकलन करते हुए घोषित किया -“क्या विभाजन ने स्पष्टत: दिखा नहीं दिया कि अनुनय एकता का साधन नहीं बन सकता? फिर क्यों नहीं हमने बाद के कालों में इन साधनों के बारे में पुनर्विचार किया? क्यों नहीं हमने असंदिग्ध शब्दाें में घोिषत किया कि भारत में उपासना पद्धतियों की विविधता तो रह सकती है किन्तु राष्ट्रीय संस्कृति-धारा एक ही रहेगी और जो इस धारा के साथ अपने काे समरस नहीं कर सकते, वे यहां के राष्ट्रीय नहीं माने जायेंगे?” उन्होंने मजहब का विरोध कभी नहीं िकया। पाकिस्तान को दीनदयाल जी एक अकृित्रम राजनीतिज्ञ संरचना मानते थे।

नेपाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा था कि “ नेपाल अलग राष्ट्र होते हुए भी संस्कृति दृष्टि से विलग नहीं है। अत: हम नेपाल के हिन्दू राष्ट्र गौरव पर गर्व करते हैं, उसमें स्वयं को देखते हैं परन्तु पाकिस्तान के गौरव से स्वयं को नहीं जोड़ पाते।” उनका स्पष्ट मत रहा है कि ” भारत के मुसलमान उसी भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की संतति हैं जिसके हिन्दू। इनके पूर्वज अरब से नहीं आये थे। केवल मजहब वहां से आया था। जिसे भी बलात या स्वेच्छा से स्वीकार करना पड़ा।

भारत में ऐसे अनेक सम्प्रदाय पहले से ही हैं जिनकी उपासना पद्धतियां सर्वथा भिन्न हैं पर हम बौद्ध न होते हुए भी गौतम बुद्ध पर गर्व कर सकते हैं तो क्या मात्र मजहब बदलने से यहां का मुसलमान अपनी इस राष्ट्रीय संस्कृति पर गर्व नहीं कर सकता जो उसकी भी वैसे ही विरासत है जैसे हिन्दुओं की।

क्या ऐसा होना सहज है! यह प्रश्न पं. दीनदयाल के समक्ष था, आज भी है। साम्प्रदायिक शक्तियों का विरोध करने के नाम पर साम्प्रदायिकता को ही आश्रय मानने वाले आज के नेता एकात्म का क्या आशय लेते हैं? धर्म विशेष को प्रश्रय देने से बढ़कर धर्म निरपेक्षता विरोधी कोई कार्य नहीं होता। राष्ट्रीयता का आशय है एकात्मकता और एकता। भारत का विभाजन होने पर मौलाना आजाद ने द्विराष्ट्रवाद का विरोध किया था। यह द्विराष्ट्रवाद ही अल्पसंख्यकों की निष्ठा पर प्रश्न चिह्न है।

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था….

रिलीजन यानि मत, पंथ मजहब है, ‘धर्म’ नहीं। ‘धर्म’ तो एक व्यापक चीज है। यह जीवन के सभी पहलुओं से संबंध रखने वाली चीज है। उससे समाज की धारणा होती है। उससे सृष्टि की धारणा होती है। यह धारणा करने वाली जो चीज है, वह धर्म है। धर्म के मूलभूत तत्व सनातन और सर्वव्यापी हैं। हां, उनका व्यवहार देश, काल और और परिस्थिति सापेक्ष होता है। इन नियमों की सम्पूर्ण संहिता और उनके तात्विक आधार का नाम ‘धर्म’ है। ये नियम मनमाने नहीं हो सकते। उनसे उस सत्ता की धारणा होनी चाहिए जिसके लिए वे बने हैं तथा वे दूसरी सत्ता के अविरोधी तथा पोषक होने चाहिए।

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