विवादित ढांचा विध्वंस : जानिए कैसे बाइज्जत बरी हुए बाबरी मामले के सभी अरोपी!

ढांचा विध्वंस

लखनऊ। ढांचा विध्वंस प्रकरण के अपराधिक मामले में बुधवार को लगभग 28 साल बाद विशेष न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार यादव ने सभी 32 आरोपियों को ठोस साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। इसमें पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं मानव संसाधन मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी, महंत नृत्य गोपाल दास, सतीश प्रधान एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी शामिल हैं।

अदालत ने 2300 पृष्ठों में अपना निर्णय दिया

विशेष न्यायाधीश ने 2300 पृष्ठों के अपने निर्णय का सार भरी अदालत में सुनाया। अदालत ने कहा- आरोपियों की ओर से बाबरी विध्वंस की घटना पूर्व से नियोजित नहीं थी। बाबरी विध्वंस की घटना अचानक शुरू हुई जिसमें राम जन्मभूमि मंदिर के पीछे से पथराव शुरू किया गया। वहां पर मौजूद किसी भी व्यक्ति के हाथ में कोई हथियार अथवा घातक औजार नहीं था। निर्णय के अनुसार अचानक करीब 12:00 बजे शोर शराबा के साथ घटना शुरू हुई। जहां पर मुख्य रूप से अशोक सिंघल व उनके साथ के लोगों ने ढांचा बचाने का अथक प्रयास किया। यह घटना को वहां पर मौजूद सैकड़ों की संख्या में अराजक तत्वों द्वारा अंजाम दिया गया। विवादित ढांचे को ढहा दिया गया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन अथवा किसी गवाह की ओर से समाचार पत्रों की मूल स्क्रिप्ट नहीं पेश की गई और न ही इस संबंध में कोई प्रबल साक्ष्य प्रस्तुत किया गया। अदालत ने कहा है कि अभियोजन द्वारा घटना से संबंधित जो वीडियो कैसेट दाखिल किए गए हैं, उनके दृश्य न तो स्पष्ट है और न ही उनके बीच के वार्तालाप को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है। जिसका मुख्य कारण यह था कि वीडियो कैसेट के दृश्यों के बीच-बीच में ब्रेकिंग न्यूज़ एवं अन्य समाचार दिखाए जा रहे थे। इसके अलावा वीडियो एवं उनके कैसेट को अदालत में सील मोहर अवस्था में पेश नहीं किया गया है और न ही उनके संबंध में जांच अधिकारी द्वारा रिकवरी मेमो बनाया गया है।

अदालत ने कहा है कि घटना के समय साध्वी ऋतंभरा एवं अन्य लोगों की आवाज को उस समय टेप किया गया था, जब वह घटनास्थल के पास भाषण दे रही थी परंतु टेप की आवाज स्पष्ट न होने एवं उसे सील न किए जाने के कारण यह संभव है कि उससे छेड़छाड़ की गई हो। आरोपितों ने खुली चुनौती दी थी जो कैसेट अथवा वीडियो पेश किए हैं, वह सब छेड़छाड़ युक्त टेंपर्ड हैं। स्थानीय लोगों का जो बयान दर्ज किया गया है उनके बयानों में आपस में विरोधाभास है जिसके कारण उनके द्वारा दिए गए बयान को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। इसके अलावा उन लोगों का भी बयान दर्ज किया गया है जो मौके पर मौजूद नहीं थे।

अदालत ने अपने निर्णय का मुख्य अंश सुनाते हुए कहा है कि 6 दिसंबर 1992 को घटना के पहले स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) द्वारा शासन को रिपोर्ट दी गई थी कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (आई एस आई) अयोध्या में बहुत बड़ी घटना करा सकती है परंतु एलआईयू की इस रिपोर्ट को नजरंदाज कर दिया गया। विशेष अदालत ने अपने पूरे निर्णय में पत्रावली पर मौजूद सबूतों को पर्याप्त न मानते हुए सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है ।

 

Related Articles

Back to top button
E-Paper