प्रियंका की राजनीतिक-संजीदगी और लल्लू के कुर्ताफाड़-संघर्ष से चार्ज हो रही कांग्रेस की बैटरी

लखनऊ। संवेदनशील मुद्दों को लेकर प्रियंका गांधी की राजनीतिक संजीदगी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू की ऐसे मुद्दों पर सरेबाजार कुर्ताफाड़ संघर्ष करने की शैली से फिलवक्त यूपी कांग्रेस की बैटरी पहले से कही ज्यादा चार्ज हुई है। इसका नजारा 2022 के विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल समझे जाने वाले यूपी की सात विधानसभा सीटों पर हुए उप-चुनावों में दिखा है।

प्रियंका और राहुल गाँधी जनता के बुनियादी मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रहे हैं। इससे बेजान होते जा रहे कार्यकर्त्ता जोशीले हो उठे हैं। समाजवादी पार्टी की ही तरह कांग्रेस कार्यकर्ता भी उपचुनावों के लिए मेहनत करते नजर आए। इसका सर दिखने भी लगा है।

यूपी में मंगलवार को सात विधानसभाओं पर हुए उप चुनावों के लिए वोट पड़े। राजनीतिक गलियारों में जीत-हार के समीकरणों पर बहस जारी है। उपचुनावों की अहम बात यह है कि कांग्रेस के संगठन का जोशीलापन दिखा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस उपचुनाव का परिणाम कई राजनीतिक संदेशों को लेकर आएगा। यह संदेश विशेषकर इस बात का होगा कि सत्तासीन पार्टी को आने वाले वक्त में मुख्य विपक्षी दलों में कौन ज्यादा टक्कर दे सकता है।

इधर उप-चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुईं अन्नू टंडन ने भी कांग्रेस को झटका तो दिया पर उनके इस कदम से किसका नफा-नुकसान हुआ यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा।

कांग्रेस प्रवक्ता के मुताबिक, पूरा संगठन रणनीति बनाकर इस उपचुनाव में हर सीट पर लगा हुआ था। प्रियंका गांधी ने हर सीट पर अपना प्रभारी लगा रखा था। हर सीट पर करीब 250 लोगों की केंद्रीय टीम मजबूती से प्रचार अभियान में लगी थी। हर सीट पर विभाग और फ्रंटल के प्रतिनिधियों को जाति के हिसाब से जिम्मेदारी दी गयी थी। हर सीट पर नेताओं ने आपसी खुन्नस भुलाकर एकसाथ मिलकर काम किया। इसका बेहतरीन उदाहरण घाटमपुर में दिखा, जहां एक दूसरे के विरोधी बताए जाने वाले राकेश सचान और राजाराम पाल साथ-साथ दिखे।

यूपी में नौगांवा (अमरोहा), बुलंदशहर, टुंडला( फिरोजाबाद), घाटमपुर (कानपुर), बांगरमऊ (उन्नाव), मल्हनी (जौनपुर), देवरिया सीटों पर 3 नवंबर को उपचुनाव हुआ। टुंडला में कांग्रेस का पर्चा खारिज हो गया। बांगरमऊ, घाटमपुर और बुलंदशहर में कांग्रेस न केवल अपना जोर लगाकर लड़ी बल्कि बांगरमऊ से आरती बाजपेयी, घाटमपुर से कृपाशंकर शंखवार और बुलंदशहर से सुशील चौधरी जीत हार के समीकरण में मुख्य किरदार कहे जाएंगे।

कांग्रेस का दावा है कि, प्रियंका के महासचिव बनने के बाद पार्टी का ग्राफ लगातार बढ़ा है। पिछले उपचुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत 6.2 से बढ़कर दोगुना हो गया था। जानकारों का कहना है कि इस बार वोटिंग प्रतिशत मे तीन गुना वृद्धि से दिख रहा है कि, कांग्रेस अपने खोये हुए आधार को तेजी के साथ कवर कर रही है।

गौरतलब है कि, पिछले एक साल में एक राजनीतिक पार्टी के बतौर कांग्रेस ने सड़कों पर विपक्ष की भूमिका बखूबी अदा की है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ मुजफ्फरनगर से आज़मगढ़ तक महासचिव प्रियंका गांधी सड़कों पर नज़र आईं। सोनभद्र के उम्भा कांड के समय चुनार किले में नजरबंद महासचिव प्रियंका गांधी शायद ही यूपी के किसी मसले पर चुप बैठीं हों। हाथरस की बेटी के इंसाफ के लिए दो दिन तक सड़कों पर लड़ती दिखीं।

इन आंदोलनों में कांग्रेस की सक्रियता पर राजनीतिक जानकारों का सवाल है कि कांग्रेस लड़ तो रही है, लेकिन क्या यह मुद्दे चुनावी राजनीति में वोटरों को लुभा पाएंगे? एक बउ़ा सवाल यह भी कि, क्या सड़क की ताकत वोट में तब्दील होगी?

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