‘कोरोना काल’ हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल

ओम प्रकाश तिवारी

हिंदी साहित्य के इतिहास में एक नया कालखंड ‘कोरोना काल’ जुड़ गया है। भविष्य में इस कालखंड की विशेष महत्ता होगी। यह कालखंड अपने में अप्रतिम होगा। वर्तमान और भविष्य का कोई भी आलोचक या समीक्षक इस कालखंड की उपेक्षा नहीं कर पायेगा। सच कहा जाय तो कोरोना काल हिंदी साहित्य के ‘स्वर्णकाल’ के रूप में निरूपित किया जाएगा।

कोरोना काल में हिंदी साहित्य की सभी विधाओं का विकास हुआ। कुछ नई विधाएं भी जन्मी और तेजी से पल्ल्वित हो रहीं हैं। सृजनात्मकता का जितना विकास इस काल में हुआ उतना तो भक्तिकाल और रीतिकाल में भी नहीं हुआ था। भक्तिकाल और रीतिकाल में गिनती के ही कवि थे। कोरोना काल में देश के नव्बे फीसदी लोगों के पवित्र उरों से अनजाने में ही काव्यधारा प्रवाहित हुई। बाथरूम, बैडरूम, ड्राइंगरूम हर कहीं कवितायें जन्मी। पढ़ी-लिखी-सुनी और सराही गयी। आलोचना की कसौटी पर कसी गई।

इस नए कालखंड में सभी रसों और छंदों में उन्मुक्त रचनाएं हुईं। श्रंगार, हास्य और वीभत्स रस का प्रयोग अधिक हुआ। रीतिबद्ध और रीतिमुक्त दोनों तरह की कविताएं रची गयी। शब्दों की मर्यादा भंग हुई। काव्यशास्त्र की तमाम सीमाएं भी टूटी। नई विधाएं और परंपराएं स्थापित हुई। देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप सभी रचनाधर्मियों की प्रतिष्ठा स्थापित हुई। कवियत्रियों के लिए तो कोरोना काल क्रांतिकारी युग साबित होगा। कवियत्रियों और लेखिकाओं की युगों से दबी पीड़ाएं और संवेदनाएं मुखरित हुई।

 

हिंदी साहित्य के इतिहास के इस अप्रतिम कल में रचनाकारों द्वारा एकदम नए प्रतीकों, रूपकों एवं उपमाओं का उपयोग किया गया। तपस्वी एवं गृहत्यागी शासक की शान में कसीदे पढ़े गए। वीर रस की रचनाओं में पकिस्तान और चीन को ललकार मिली। अब अगर दोनों दुष्ट पडोसी इन रचनाओं से न डरें तो भला इसमें रचनाकारों का क्या दोष है ? कालखंड की रचनाओं को पढ़ने से हम भारत के लोगों को पता चला कि देश में रामराज स्थापित हो चूका है। जल्द ही महान भारत विश्व गुरु बनने वाला है।

कोरोना काल में सोशल मीडिया ने हिंदी साहित्य के प्रसार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। नवोदित रचनाकारों को संपादकों और प्रकाशकों का मुंह नहीं देखना पड़ा। तुरंत लिखा और सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। पलभर में ही आलोचकों की टिप्पणियां आने लगी। लगे हाथ सवाल और जवाब भी हो गए। सोशल मीडिया पर अगर समर्थकों के तादाद ज्यादा है तो दूसरे की रचना भी अपनी हो गई। तमाम नवरचनाकार प्रसाद,पंत, निराला, महादेवी और दिनकर की कुछ रचनाओं को भी नए रंग में रंग कर प्रस्तुत कर मिया मिटठू हो गए।

हिंदी साहित्य के इस अप्रतिम कालखंड में रचनाकारों ने अपनी महती भूमिका का निर्वहन किया और आगे भी करते रहेंगे। अब सरकार की बारी है। हिंदी साहित्य के विकास में केंद्र व प्रदेश सरकारों को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए। सरकार चाहे तो कुछ नए पुरस्कारों की शरुआत कर सकती है। जैसे कोरोनाश्री, कॉरोनविभूषण आदि। इसी तरह कोरोना साहित्य अकादमी का गठन भी समीचीन होगा।

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