चौरीचौरा कांड के बाद दिग्विजयनाथ ने छोड़ दी थी गांधीवादी राह, फिर हिन्‍दू महासभा के साथ थे जुड़े

गोरखपुर स्वतंत्रता संग्राम में गोरक्षपीठ ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 04 फरवरी 1922 को घटित चौरीचौरा कांड में तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ की भूमिका ने इस पीठ को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ दिया था। चौरीचौरा कांड में शामिल दिग्विजयनाथ की पहचान नहीं हो पाई थी और वे फांसी के फंदे पर झूलने से बच गए थे। इतना ही नहीं, स्कूल छोड़कर सत्याग्रह से जुड़े महंत दिग्विजयनाथ ने चौरीचौरा कांड के बाद गांधीवादी रास्ता त्याग कर दिया था और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा से जुड़ गए थे।

चौरीचौरा कांड

चौरीचौरा कांड के करीब साल भर पहले 8 फरवरी 1921 को जब गांधीजी पहली बार गोरखपुर आए थे। उस समय दिग्विजय नाथ रेलवे स्टेशन पर उनके स्वागत और सभा स्थल पर व्यवस्था के लिए अपनी टोली स्वयंसेवक दल के साथ मौजूद रहे। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. रजवंत राव भी इसकी पुष्टि करते हैं।

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फिर 4 फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड हुआ तो उनका भी नाम आया पर वह बच गए। प्रो.राव कहते हैं कि समकालीन लोगों से पता चलता है कि चौरीचौरा कांड में उनकी सक्रिय भागीदारी थी लेकिन साक्ष्य के अभाव में गिरफ्तारी नहीं हुई थी।

ऐसे बदल गया चौरीचौरा कांड का रास्ता

मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर नगर निगम की स्मारिका ‘आंकलन’ में ‘युग पुरुष महंत दिग्विजयनाथ’ शीर्षक से एक आलेख लिखा है। इसमें चौरीचौरा कांड के सर्जकों में एक प्रमुख नाम दिग्विजयनाथ जी का भी शामिल किया है। यह बताया है कि किस तरह से महंथ दिग्विजयनाथ जी चौरीचौरा कांड के पुरोधाओं में शामिल रहे, लेकिन पहचान के अभाव में वे फांसी के फंदे से बच गए थे।

असहयोग आंदोलन की वापसी ने कर दिया विचलित

योगी आदित्यनाथ के आलेख के मुताबिक देश के अन्य नेताओं की तरह चौरीचौरा घटना के बाद महात्मा गांधी भी विचलित हो गए थे। इस वजह से गांधीजी ने असयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला ले लिया, लेकिन बापू के इस फैसले से महंत दिग्विजयनाथ विचलित हो गए। यहीं से कांग्रेस और गांधी की नीतियों से उनका मोहभंग होता गया। फिर वे वीर सावरकर और भाई परमानंद के नेतृत्व में गठित अखिल भारतीय हिंदू महासभा की सदस्य बन गए।

धर्म प्रचार कर रहे ईसाइयों को तंबू उखाड़ने को किया था मजबूर

राजस्थान के मेवाड़ (चित्तौड़) के मूल निवासी दिग्विजयनाथ उर्फ नान्हू महाराणा प्रताप से प्रभावित थे। यही वजह थी कि अपने विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने मंदिर प्रागंण में धर्म प्रचार कर रहे इसाई समुदाय को तंबू-कनात उखाड़ कर जाने को मजबूर कर दिया था।

युवाओं में महाराणा प्रताप जैसे गुण आरोपित करने का था जुनून

आलेख के मुताबिक दिग्विजयनाथ जी पर महाराण प्रताप का ही प्रभाव था कि वर्ष 1932 में उन्होंने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। इनका मानना है कि नामकरण के पीछे यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों में देश के प्रति महाराणा प्रताप जैसा जज्बा, जुनून और संस्कार को आरोपित करना था। आज इस परिषद से तीन दर्जन से ज्यादा प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान और चिकित्सालय जुड़े हैं।

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