भारत के गुमनाम तिब्बती सैनिक

प्रमोद जोशी- वरिष्ट पत्रकार

भारतीय सेना ने 29-30 अगस्त की रात जो सैनिक कार्रवाई की, उसकी वजह से स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) का नाम भी सामने आया, जो अपने खुफिया अभियानों के कारण अभी तक गुमनाम थी। सुपर सीक्रेट विकास रेजिमेंट स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का हिस्सा है। इसे विकास बटालियन भी कहते हैं। इस फोर्स में बड़ी संख्या में निर्वासित तिब्बती नौजवान काम करते हैं। इसके सैनिक दलाई लामा, तिब्बत और भारत के ध्वज के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं। इनमें गोरखा और दूसरे सैनिक भी हैं। खासतौर से चीनी सीमा पर इस फोर्स की बड़ी भूमिका है। आगामी 14 नवंबर को इस सेना की स्थापना के 58 साल पूरे हो जाएंगे। सन 1962 के चीनी हमले के बाद गठित इस फौजी टुकड़ी ने हालांकि सन 1965, 1971 से लेकर 1999 के करगिल युद्ध तक अनेक ऑपरेशनों में सफलता के साथ भाग लिया, पर उनका जिक्र नहीं हुआ क्योंकि यह भारत के अंतरराष्ट्रीय खुफिया संगठन रिसर्च एनालिसिस विंग की शाखा है, जो खामोश रहकर ही काम करता है।

इस बार के ऑपरेशन में इस सेना के न्यीमा तेनजिन शहीद हुए, जिनके अंतिम संस्कार का विवरण भारतीय मीडिया में न केवल प्रसारित हुआ, बल्कि बीजेपी के नेता राम माधव भी उसमें शामिल हुए। न्यीमा तेनजिन को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई गई। उनके पार्थिव शरीर पर भारत और स्वतंत्र तिब्बत का ध्वज लपेटा गया था। भारत में रह रहे तिब्बतियों के लिए यह सेना प्रतिष्ठा का विषय है। चीन के विरुद्ध अभियान में अपने एक साथी को इन तिब्बतियों ने जो भावभीनी विदाई दी, वह तो उल्लेखनीय है ही, साथ ही राम माधव की उपस्थिति एक प्रकार से चीन के नाम भारत का संदेश भी है कि अब भारत की तिब्बत-नीति बदल रही है। इस दौरान एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें शिमला से रवाना हो रहे अपने सैनिकों के वाहन पर तिब्बती नागरिक सफेद खता (स्कार्फ) बांधकर विदाई दे रहे हैं।

एसएफएफ की स्थापना हालांकि औपचारिक रूप से 1962 में हुई, पर उसकी भूमिका पचास के दशक में ही पड़ गई थी। सन 1956 में तिब्बत में हुई बगावत के बाद वहां से भागकर लोग भारत आने लगे थे। उसके तीन साल बाद फिर से बगावत भडक़ी और दलाई लामा के साथ बड़ी संख्या में तिब्बती नागरिक भारत आए। इनमें काफी तिब्बती योद्धा थे, जो चीन के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने के बाद भागकर भारत आए थे। इनमें से करीब 6000 लोग इस नई फौज के प्राथमिक सदस्य बने। बताया जाता है कि ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने इस छापामार यूनिट की स्थापना की सलाह दी थी। उनसे विमर्श के बाद ही सन 1962 में इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीएन मलिक ने तिब्बती लड़ाकों की ट्रेनिंग के लिए केंद्र बनाने का विचार आगे बढ़ाया। ओडिशा में गजपति जिले के चंद्रगिरि और कटक के पास चारबतिया एयरपोर्ट पर भी एसएफएफ की ट्रेनिंग होती रही है। लामा, केनेथ कॉनबॉय और जेम्स मॉरिसन ने अपनी पुस्तक ‘द सीआईए सीक्रेट वॉर इन तिब्बत’ में इसका जिक्र किया है।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मेजर जनरल सुजान सिंह उबान से इस मामले में मशविरा किया, जो द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीय सेना की ओर से शामिल हो चुके थे और 22 माउंटेन रेजिमेंट को कमांड कर चुके थे। जनरल उबान के पुत्र गुरदीप सिंह उबान ने हाल में चेन्नई के अखबार हिंदू को बताया, ‘मैं उस वक्त सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट था। हम दिल्ली से टैक्सी लेकर उत्तराखंड के चकराता गए। मेरे पिता को पता था कि वहां एक पुराना गोरखा ट्रेनिंग सेंटर था, जो खाली पड़ा था।’ इस यूनिट का गठन नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर, 1962 को हुआ। इसके एक हफ्ते बाद ही चीन ने युद्धविराम की घोषणा कर दी, इसलिए इस फौज का औपचारिक गठन या लड़ाई में उसकी कोई भूमिका नहीं हो पाई। गुरदीप सिंह उबान भी अपने पिता की तरह इंस्पेक्टर जनरल के पद तक इसके साथ जुड़े रहे।

इस फौज का नाम शुरू में रेजिमेंट 22 के आधार पर एस्टेब्लिशमेंट 22 (टू-टू) रखा गया। सन 1967 में इसका विस्तार करके इसका नाम स्पेशल फ्रंटियर फोर्स कर दिया गया। सन 1971 की लड़ाई में बांग्लादेश के चटगांव इलाके में यह फौज लड़ी थी और इसके 50 से ज्यादा सैनिक शहीद हुए थे। उन्हें खामोशी से अंतिम विदाई दी गई, क्योंकि यह सीक्रेट पलटन थी। इस सेना में सभी पैराट्रुपर्स होते हैं, जिन्हें जबर्दस्त कमांडो और पर्वतारोहण की ट्रेनिंग दी जाती है। यह सेना दुश्मन की सेना के पीछे जाकर कार्रवाई कर सकती है। हालांकि ऑपरेशंस में यह सेना के अधीन काम करती है, पर प्रशासनिक रूप से कैबिनेट सचिवालय का हिस्सा है और इस तरह रिसर्च एनालिसिस विंग यानी रॉ के अधीन है।

बताते हैं कि पहले 30-40 साल तक चीन को इस सेना के अस्तित्व की जानकारी भी नहीं थी। इन जवानों के मन में चीन के प्रति सहज नाराजगी और जुनून है और चीनी सेना इनसे घबराती है। इस सेना की एक महिला शाखा भी है। अपने किस्म की अलग ही निर्भीक और जुझारू सेना पर्वतीय युद्ध की विशेषज्ञ है। अभी तक इसका इस्तेमाल खुफिया तौर पर किया जाता था, पर चीन के खिलाफ पहली बार इसके बारे में खुले तौर पर जानकारी दी गई है। और यह एक खुला संकेत भी है।

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