पूरी दुनिया के लिए चुनौती बना ड्रैगन

अरुण कुमार त्रिपाठी

मोल्डो सीमा पर भारत और चीन के सैन्य कमांडरों की बैठक के बाद एलएसी पर और सैनिक न भेजने एवं तनाव कम करने पर जो सहमति हुई है, वह राजनयिक स्तर पर हुए लंबे प्रयास का परिणाम है। सच ही कहा गया है कि जब राजनयिक प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं तब सैनिक टकराव की स्थितियां पैदा होती हैं। इसीलिए मोल्डो सीमा पर दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच हुई वार्ता में विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी शामिल थे। ऐसा पहली बार हुआ है।

यह वार्ता भी मास्को में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुए दस समझौतों का अगला चरण थी। हालांकि स्थितियां न तो भारत को निश्चिंत करने के लिए काफी हैं और न ही दुनिया को। अभी दोनों देशों के बीच एलएसी पर तनाव कम करने के लिए कई कदम उठाने होंगे और जून जैसे टकराव को रोकने के लिए तो और भी बहुत कुछ करना होगा।

इस सहमति से न तो ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत है और न ही इसे बहुत अस्थायी मानकर निराश होने की। दरअसल इस मामले को पूरे परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। भारत के मीडियाकर्मियों और बौद्धिकों की दिक्कत यह है कि वे इस्लाम और पाकिस्तान को लेकर बहुत ज्यादा हौवा बनाते रहे हैं और इस बीच उन्होंने चीन की वैश्विक चुनौती का ठीक से मूल्यांकन किया ही नहीं। अगर किया भी है तो उससे देश की आम जनता को परिचित ही नहीं कराया।

इस देश में पिछले कुछ वर्षों से हम लोग मुगलकाल से लड़ रहे हैं और उन नामों और प्रतीकों को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं जो किसी भी तरह से भारत में इस्लाम को मानने वाले शासकों से जुड़े रहे हैं। इतिहास के आधे-अधूरे सच पर आधारित वह विमर्श देश के विवेक को कुंद करता जा रहा है और उसे न तो अपने विकास के बारे में सोचने देता है और न ही इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों को समझने देता है। हम अपने देश में यह सुनते-सुनते थक गए हैं कि जहां-जहां मुस्लिम समुदाय हैं, वहीं किसी न किसी तरह का उपद्रव और आतंकवाद है।

लेकिन यह कहने वाले बहुत कम लोग मिलेंगे कि इक्कीसवीं सदी के विश्व के लिए चीन एक बड़ी चुनौती है। या तो इस बारे में कही गई बातों पर गौर नहीं किया जाता है, या फिर हम अपने धार्मिक आख्यान में इतने मगन रहते हैं कि भूराजनीतिक सच्चाई से अवगत ही नहीं हो पाते। लगभग ढाई दशक पहले यह बात अमेरिकी राजनय विशेषज्ञ सैमुअल पी हंटिंगटन ने कही थी कि आने वाले समय में चीन दुनिया का बहुत बड़ा किरदार बनकर उभर रहा है। वह इतना बड़ा है कि पूरी दुनिया के भूराजनीतिक संतुलन को बदल कर रख देगा। चीन का यह उभार अकेले नहीं हो रहा है।

वह दक्षिण पूर्व एशिया के चीनी मूल की जातियों के देशों के साथ हो रहा है। वे सारे देश आर्थिक रूप से ताकतवर हो रहे हैं और किसी न किसी रूप में चीन की सरपरस्ती में आ रहे हैं। जो देश नहीं आएंगे उन्हें चीन दबाएगा, जो आ जाएंगे उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था और भूराजनीति का हिस्सा बना लेगा। इस बारे में वह अपनी शर्तें कई देशों पर थोप रहा है। चूंकि भारत उन शर्तों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, इसलिए उससे टकराव हो रहा है। हालांकि चीन का यह टकराव वियतनाम से भी है, जापान से भी है, ताइवान से भी है और दक्षिणी चीन सागर के बहाने आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों से भी है। अब तो इस सामुद्रिक टकराव में भारत भी शामिल हो रहा है।

क्लैश आफ सिविलाइजेशन्स:

एंड द रिमेकिंग आफ वल्र्ड आर्डर’ सभ्यताओं के संघर्ष की थ्योरी देने वाले  सैमुअल पी. हंटिंगटन ने साफ लिखा है कि चीन और चीनी मूल के लोगों से जुड़े देशों का उभार विश्व में बड़ा विस्थापन पैदा करेगा। यह विस्थापन भूराजनीतिक स्थितियों की तस्वीर बदल देगा। एक तो यह अमेरिका केन्द्रित विश्व को बदलेगा और दूसरे आने वाले तीन दशकों तक अन्य देशों को परेशान करेगा। उनका यह भी कहना है कि चीन कम से कम दो हजार साल तक एक श्रेष्ठ सभ्यता रहा है। उसे यूरोपीय देशों से लेकर जापान तक ने बहुत सताया और कुचला है। वह उभर रहा है तो सबसे बदला लेगा और अपनी श्रेष्ठता फिर से कायम करेगा।  

इसलिए चीन के ताजा विवाद को जो लोग सिर्फ कश्मीर से जोडक़र देख रहे हैं या फिर अंग्रेजों द्वारा बनाई गई मैकमोहन लाइन के स्वीकार और अस्वीकार से संबंधित मान रहे हैं, वे तस्वीर का आधा हिस्सा ही देख रहे हैं। चीन को एक प्राचीन सभ्यता होने का घमंड भी है और आहत किए जाने की पीड़ा भी है, लेकिन उसी के साथ उसके पास आधुनिक होने का आत्मविश्वास भी है और बड़े पैमाने पर मैन्यूफैक्चरिंग, निर्यात, ढांचागत विकास और डिजिटल प्रौद्योगिकी में भी बड़ी ताकत होने की आक्रामकता भी है। तेजी से उभरती आर्थिक ताकत होने के साथ चीन एक बड़ी सैन्य शक्ति भी है। इसलिए वह एशिया से लेकर पूरी दुनिया के मंच पर अपनी दबंगई जाहिर कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के 75 वें स्थापना वर्ष में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का संबोधन गौर करने लायक है।

शी जिनपिंग ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका दुनिया को एक ध्रुवीय बनाए रखना चाहता है लेकिन अब वह चलने वाला नहीं है। दुनिया बहुध्रुवीय हो गई है और अमेरिका को उसे स्वीकार करना होगा। इसी नीति को आगे बढ़ाते हुए चीन संयुक्त राष्ट्र की ज्यादा बड़ी और जिम्मेदार भूमिका की पैरवी कर रहा है। इस बीच कोरोना काल में उसने महामारी और अर्थव्यवस्था को लेकर अपने देश को जिस प्रकार संभाला है, उससे विश्व नेतृत्व पर उसकी दावेदारी बढ़ती गई है। दूसरी ओर अमेरिका ने यूनेस्को, यूएनएचआरसी और डब्ल्यूएचओ जैसी संस्थाओं से तेजी से किनारा किया है और मदद देनी बंद की है। उल्टे इन संस्थाओं को आर्थिक मदद देने के कारण वहां चीन की पैठ बढ़ी है। डब्ल्यूएचओ के मामले में तो अमेरिका ने यही आरोप लगाया है।

हमें चीन के इस विशिष्ट चरित्र को समझना होगा और उसके लिए एक वैकल्पिक भूराजनीतिक माडल तैयार करना होगा। चीन दुनिया के सामने एक जटिल माडल के साथ उपस्थित हुआ है और उसे अप्रासंगिक बनाए बिना उसकी चुनौती से पार पाना कठिन है। चीन एक ओर अपने भीतर राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के तानाशाही माडल पर काम कर रहा है तो आर्थिक रूप से उदारीकरण और वैश्वीकरण के माडल को अपनाए हुए है। वह अपने उत्पाद तो दुनिया भर में बेचना चाहता है, लेकिन दुनिया के लोकतंत्र की हवा को अपने भीतर घुसने नहीं देना चाहता। उसके पास डाटा की बेशकीमती संपत्ति है और उसी के साथ जुड़ी है जासूसी और दूसरे देशों के ढांचे में घुसपैठ की क्षमता।

इसलिए चीन से जितना डर सीमा पर और समुद्र में पीएलए की तैनाती से है, उससे कम डर उसके डिजिटल एप की देशों के भीतर घुसपैठ से नहीं है। यह अकारण नहीं है कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने उसके तकरीबन ढाई सौ एप प्रतिबंधित किए हैं और अमेरिका में टिकटाक और वीचैट पर प्रतिबंध की तलवार लटक रही है। अमेरिका में टिकटाक ओरेकल से समझौता करके अपने को बचाने की कोशिश रहा है तो वीचैट के ग्राहकों ने अदालत की शरण ली है। चीन ने इन प्रतिबंधों के विरुद्ध पूरी दुनिया में इंटरनेट की आजादी के लिए अभियान छेड़ दिया है। इस तरह एक नई बहस चल रही है, जो चीन केंद्रित है। यानी अब दुनिया की बहसों के केंद्र में अमेरिका से ज्यादा चीन आ रहा है।

कठिन बात यह है कि दूसरे देशों में चीनी मूल के नागरिकों के अधिकारों और चीनी सामान के उपयोग के लिए अभियान चलाने वाले चीन ने अपने भीतर मानवाधिकार को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। उसने तिब्बत के हजारों लोगों को जबरदस्ती श्रम प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम शुरू किया है। चीन का कहना है कि वह उन्हें खेती से निकाल कर उद्योगों के लिए तैयार कर रहा है, जबकि चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता और संगठन कह रहे हैं कि यह एक तरह से उनको अपनी जातीय स्मृतियों से काटकर चीनी राजनीतिक व्यवस्था में तैयार करने के लिए दिया जाने वाला कठोर प्रशिक्षण है। चीन कहता है कि वे अपनी मर्जी से इस प्रशिक्षण के लिए आए हैं, जबकि मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उन्हें जबरदस्ती लाया गया है। उधर चीन ने अपने देश की अहम रीयल एस्टेट कंपनी के प्रमुख रहे 69 वर्षीय रेन झिक्वियांग को 18 साल की कैद दी है। रेन ने कोरोना से निपटने में शी जिनपिंग की नाकामी को देखते हुए उन्हें जोकर कहा था। उसके बाद सक्रिय हुई सरकार ने उन पर भ्रष्टाचार के जबरदस्त आरोप लगाए। सरकार का कहना है कि रेन ने सारे आरोप स्वीकार कर लिए हैं और कहा है कि इस सजा के विरुद्ध वे कहीं अपील नहीं करेंगे।

अब भारत समेत दुनिया के सामने यह विकल्प है कि चीन का मुकाबला लोकतंत्र से करें या तानाशाही से। अगर अमेरिका और चीन समेत दुनिया के अन्य देश चीन का मुकाबला लोकतंत्र के माडल से करना चाहते हैं तो उन्हें स्थायी सफलता मिल सकती है, लेकिन अगर वे चीन जैसा ही तानाशाही का माडल बनाकर उसका मुकाबला करना चाहते हैं तो चीन को जल्दी कमजोर कर पाना आसान नहीं है। चीन का मुकाबला बार-बार अपने को विश्वगुरु कहने से नहीं होगा। यह तो एक हवा-हवाई तरीका है, जिसका ज्यादा असर नहीं होने वाला है। इस बारे में भारत समेत अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों को सोचना होगा और जल्दी ही किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का लोकतांत्रिक खाका तैयार करना होगा। यह सुझाव डा. आंबेडकर और डा. लोहिया दोनों राजनीतिक विचारकों ने दिया था। डा. आंबेडकर ने कहा था कि चीन के कम्युनिस्ट माडल से भारत ही नहीं दुनिया को चुनौती है। उसी तरह चीन की चुनौती से निपटने के लिए लोहिया ने तिब्बत का मुद्दा उठाने के साथ-साथ हिमालय नीति बनाने की बात की थी। आज हमें नए संदर्भ में उस बारे में गंभीरता से काम करना होगा।

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