संपादकीय लेख: सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया आईना

Supreme Court

यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि जो काम सरकार प्रशासन और पुलिस प्रशासन को करना चाहिए था, उसे सुप्रीम कोर्ट को करना और कहना पड़ा। शाहीनबाग आंदोलन पर दिल्ली में सार्वजनिक स्थान पर कब्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन धरना या कब्जा कर लेना कतई स्वीकार नहीं है। धरना-प्रदर्शन एक निश्चित स्थान पर ही होना चाहिए।

सड़कों पर कब्जा कर बैठ जाना अधिसंख्य लोगों को परेशानी में डालना उचित नहीं कहा जा सकता है। यह उनके अधिकारों का हनन है। कोर्ट को यह भी कहना पड़ा कि दिल्ली पुलिस जैसे प्राधिकारियों को शाहीनबाग इलाके को प्रदर्शनकारियों से खाली कराना चाहिए था। इसके अदालत में पनाह लेने की जरूरत नहीं है। भविष्य के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों और पुलिस प्रशासन को एक आईना दिखाया है, जिसका उन्हें भविष्य पालन करना चाहिए।

नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ पिछले साल 14 दिसंबर से धरना प्रदर्शन शुरू किया गया था, जो तीन महीने से भी अधिक समय तक चला। 21 मार्च को पुलिस थोड़ी सख्ती दिखाते हुए वहां से तम्बू हटाए और प्रदर्शनकारियों को भगाया। दरअसल, यह पूरा आंदोलन ही राजनीति से प्रेरित था। जहां विभिन्न पार्टियों ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं समझी कि उन्हें समझाबुझा कर वहां से हटाया जाए। बल्कि सभी राजनैतिक दलों ने भी वहां जाकर अपनी रोटियां सेंकी। यह तो लॉकडाउन ने स्थितियां बदल दीं वरना देशभर में इसी तरह के प्रदर्शन की योजना थी।

यह तो अच्छा हुआ कि अधिवक्ता अमित साही ने एक याचिका दायर की जिसमें उनका कहना था कि प्रदर्शनों के कारण आम लोगों को बेहद परेशानी उठानी पड़ रही है। उन्होंने याचिका में कहा था कि अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। लोग आफिस समय से नहीं जा पा रहे हैं। इस पर पीठ ने सही टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शन के अधिकार और दूसरे लोगों के आने-जाने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना ही होगा। कोई भी प्रदर्शन या धरना देने के नाम पर सड़क पर अनिश्चित कालीन कब्जा नहीं कर सकता है।

शाहीनबाग की देखा देखी लखनऊ के चौक में कुछ लोगों ने धरना दिया था। वहां भी टेन्ट लगा दिए गए थे। लेकिन योगी आदित्यनाथ के कड़े निर्दशों के बाद पुलिस ने उन्हें वहां से उखाड़ फेंका। वहीं सीएए के खिलाफ प्रदर्शन और तोड़फोड़ मामले में भी सरकार ने बेहद सख्ती से काम लिया। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले मे वसूली के आदेश भी हुए। उनकी फोटो चौराहों पर चस्पा की गई। दिल्ली सरकार को भी राजनीतिक स्वार्थ को छोड़ थोड़ी सख्ती दिखानी चाहिए थी। उधर केन्द्र सरकार ने भी अपने हाथ समेट लिए और पुलिस मूक दर्शक बनी रही। लेकिन दिल्ली दंगों के बाद पुलिस ने सक्रियता बढाई है। उसकी भी रिपोर्ट अभी आनी है लेकिन इतना तो तय है कि पुलिस अगर शुरू से ही सख्ती दिखाती तो यह नौबत नहीं आती।

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