संपादकीय: हमारी हिन्दी पर कोरोना संक्रमण!

Suresh Awasthi

लेखक- डॉ. सुरेश अवस्थी

कोरोना काल में ‘कोरोना का हल्ला बोल संक्रमण’ मनुष्यों, उद्योग व्यापार, लुका छुपी के प्यार, उत्सव उल्लास, देशाटन सहित जिंदगी के तमाम क्षेत्रों में तो हुआ ही अपनी हिन्दी भाषा भी संक्रमण से अछूती नहीं रही। हिन्दी महसूस कर रही है कि उसका कोरोना संक्रमण स्थायी रूप से जुकाम से पीिड़त पुरुषों के गंजत्व की तरह निरन्तर बढ़ रहा है। शब्द ही नहीं कई प्रायोजित मुहावरे भी नियोजित रूप से आ गए हैं। उस दिन समाचार पत्र उठाते ही हिन्दी भाषा मजबूर मजदूरों की तरह विवश बोली, ‘ मेरा ‘प्रवासी’ शब्द  इतना व्यापक था कि उससे विदेशों में बसने वाले भारतीय का बोध होता था पर बुरा हो कोरोना कि अपने गांव से बाहर किसी शहर जाने वाला मजदूर भी ‘प्रवासी’ हो गया।’

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वैसे हिन्दी में भारतीय राजनीति की तरह व्यापक लचीलापन और लाभकारी समन्वयवाद है फिर भी अतिवाद हो तो उसे पीड़ा होती ही है। ‘कोरोना’ को लेकर ‘लोकल’ से भी आदमी व्यापक ‘वोकल’ होकर ‘ग्लोबल’ ज्ञान बघारने में जुटा है। ‘सामाजिक दूरी’ को ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ और ‘शारीरिक दूरी’ को ‘फिजिकल डिस्टेंसिंग’ घोषित करके मेरी सामर्थ्य को उसी तरह चोट पहुंचाई जा रही जैसी मजदूरों को लगी है। मेरे मानद पुत्र शब्द समूह ‘एकांत वास’ को सिद्ध ऋषि मुनियों ने भी प्यार दुलार दिया पर कोरोना की दुष्टता ने इसे तिरष्कृत कर ‘कोरन्टीन’ बना दिया।’ स्वच्छता पदार्थ’ ,’ सैनेटाइजर’ बन गया तो कोरोना वाहक को ‘कोरोना करियर्स’। कोरोना योद्धाओं को ‘कोरोना वॉरियर्स’ नाम दे कर मेरी अभिव्यक्ति की शक्तिमत्ता को नकार कर मुझे गरीब बनाने की कोशिश की गई जबकि मैने कुछ राज्य सरकारों की तरह जबरिया आंसू बहा कर ‘राहत पैकेज’ तो मांगा नहीं था। मेरी शब्द संपदा तो पहले से ही अकूत है।

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हमारी हिन्दी थोड़ी देर खामोश होकर लम्बी लम्बी सांसें भरने लगी। मैंने अनुभव से उसकी ‘ थर्मल जांच’ की तो वह गहरी सांस खींच कर फिर बोली, प्रियवर आप ‘ मुख रक्षक ‘ अर्थात ‘मास्क’ लगा लो नहीं तो जैसे मुझे आंग्ल विषाणु जकड़ पकड़ रहा है आप भी ‘ संक्रमित’ हो सकते हैं। वह आगे बोली, ‘अब देखिए पहले मेरे ‘ विचार मन्थन  ‘ को  ‘ कार्यशाला’ कहा गया फिर वो सेमिनार ‘ हो गया और अब कोरोना काल ने इसे  ‘वेबिनार’ बना दिया। आन लाइन, होम डिलीवरी, फ़ूड पैकेट, हॉटस्पॉट, कॉंटेन्मेंट, ग्राउंड रिपोर्ट जैसे कई शब्द ‘ ब्रेकिंग न्यूज ‘ की तरह आकर ‘ एक्सक्लूसिव ‘ बन कर मुझे मुंह चिढ़ाते हैं। मेरा मन ‘ कोरोना वार्ड’ की तरह खामोश हो जाता है। ये सब हाथ धो धो कर मेरे पीछे पड़े हैं।

मुझे मेरी मातृभाषा-राजभाषा का दुख परेशान कर था। मैने कहा,’ ये तो आप की ही शक्तिमत्ता है किसी भी भाषा का कोई भी शब्द आप पूरी अर्थवत्ता के साथ अपने आप में समाहित कर लेती हैं और फिर उनके माध्यम से अभिव्यक्ति देती हैं। जैसे ‘ कैपिटल एक्सप्रेस ट्रेन लेट है’ में केवल ‘है’ आप का है फिर भी आमजन  को पूरी बात समझ आती है। वह आक्रोश में बोली, ‘मैं भाषा हूं, कोई नदी नहीं जो चाहे कूड़ा करकट फेंक जाए और उसे गोद में उठा लूं।’ अब देखिए कोरोना काल में लोगो ने कैसे मुहावरे गढ़ लिए हैं, जैसे ‘ अबे वुहान की औलाद’, ‘ एक पंच मारेंगे तो जस्ट आइसोलेट हो जाओगे’, ‘ अक्ल से अमेरिका, शक्ल से पाकिस्तान’।

मुझे अहसास हुआ कि सच तो यह है कि हम ‘ब्रांडेड’ के व्यामोह में जकड़े,’ पराये पात के भात’ की गुणवत्ता पर अकड़े,’ दूर के ढोल सुहाने’ को पकड़े ,’ आत्मनिर्भरता ‘ और ‘ स्वदेशी’ की ओर पीठ करके सुस्ता रहे हैं। आप को नहीं लगता है कि हमारी तरह हमारी भाषा भी संक्रमण संकट से परेशान है?

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