मुझे गिरा के, गाली दे के तुम संभल सको तो चलो……

jagjit joshi

लेखक- जगदीश जोशी

अभी तक देखने में आ रहा था कि उत्तर प्रदेश भाषाई तौर पर बेहद शालीन प्रदेश है। यहां के राजनीतिज्ञ भी विरोधियों पर हमला करने में शब्दों का चयन सोच-समझ करते रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर अखिलेश यादव, मायावती और प्रियंका गांधी ने भी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी। यहां तक कि दूसरे-तीसरे दर्जे के नेता औपचारिक बातचीत में गरिमा का ध्यान रखते आए हैं। अभिनेता सुशांत राजपूत की संदिग्ध मृत्यु और उसके बाद शुरू हुए अभिनेत्री रिया के प्रकरण ने आरोपों-प्रत्यारोपों की शब्दावलि बदल सी दी है। ताली, थाली और गाली के प्रहारों ने ट्रेंड पूरी तरह बदल कर रखा दिया है। मुंबई से शुरू हुई इस लड़ाई का क्षेत्रफल पूरा देश हो चुका है, विशेषकर हिंदी भाषी राज्य। संसद में तक थाली में छेद जैसे जुमले सुनने को मिल गए। इसकी आंच अब उत्तर प्रदेश में भी महसूस की जाने लगी है। सीधे साकेतपुरी अयोध्या में नए-नए वाक्यों का परीक्षण शुरू हो गया।

मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली में शब्दों की मर्यादा चीर-चीर होना हैरत में डालता है। एक ने कहा- मां का दूध पिया हो तो ऐसा कर के दिखाएं। तीर्थों के राजा तीर्थराज से जवाब मिला ये कौन है अहंकारी। अगले दिन बात नहीं रुकती। कालनेमि की उपाधि दे दी जाती है। बात निकली है तो बता दें, प्रसंग रामायणकालीन है। प्रकृति और भक्ति रूपी सीता जी की मुक्ति के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम लंकाधिपति रावण से युद्ध लड़ते हैं। इसी दौरान शेषनाग के अवतार लक्ष्मण और रावणपुत्र इंद्रजित मेघनाद के बीच घनघोर युद्ध होता है।

मेघनाद शक्तिबाण चलाकर लक्ष्मण जी को मूर्छित कर देता है। सुसेन वैद्य एक मात्र दवा हिमालय में पाई जाने वाली संजीवनी बूटी बताते हैं, वह भी सूर्योदय के पूर्व यह बूटी पहुंच जानी चाहिए। वायुपुत्र हनुमान को यह प्रोजेक्ट दिया जाता है। रावण हनुमान जी का रास्ता रोकने का आदेश ‘कालनेमि’ नामक मायावी राक्षस को देते हैं। एक बार तो कालनेमि हनुमान जी का रास्ता रोक देता है, मगर हनुमान जी सुलतानपुर के कादीपुर इलाके में कालनेमि का बध कर देते हैं। इसी स्थान पर बिजितवा महाबीरन का मंदिर है। बहरहाल कालनेमि एक मायावी राक्षस का नाम है।

यूं तो उत्तर प्रदेश में एक दौर आया था, जब शब्दों के बजाय भावनाओं को अधिक महत्व दिया गया। समाजवादी पार्टी के तत्कालीन वरिष्ठतम नेताओं में एक और एक पूर्व मुख्यमंत्री के बीच ‘शब्दयुद्ध’ हुआ था। जल्द ही इसका पटाक्षेप हो गया, दूसरे नेताओं ने इसका अनुसरण नहीं किया। कुछ दिन रिश्तों को लेकर भी व्यंग्यवाण चले। मगर वह दौर भी बड़े लोगों की बड़ी बात की तर्ज पर वहीं खत्म हो गया। फिर सब ठीक हो गया, दोनों दलों ने इसे खेल भावना से लिया और बाद में एक चुनाव के दौरान रिश्तेदारी भी जोड़ ली।

यूपी की राजधानी लखनऊ है, यहां की भाषा सदा से ‘पहले आप’ वाली रही है। इसलिए यहां शब्दबाणों का अधिक तीखा होना स्वभावतन संभव नहीं। बाहर से आने वाले राजनीतिक नेता भी लखनऊ में अपने शब्दकोषों में संशोधन कर लेते हैं। उम्मीद यही है कि अयोध्या में चले बाणों की मारक क्षमता अन्य किसी जिले को अपनी जद में न ले पाए।

यह प्रसंग अभी समाप्त नहीं हुआ, मगर इसी बीच देश की राजधानी दिल्ली से नई सूचना आ गई। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के एक प्रवक्ता ने जन्मदिवस पर शुभकामनाएं देने की परंपरा की एलएसी तोड़ दी है। उस ‘शब्दसंघानी’ ने प्रधानमंत्री को ‘बंदर’ जैसे विशेषण से विभूषित कर दिया। जबकि उन्हीं की पार्टी के एक पूर्व अध्यक्ष और ताकतवर नेता ने उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं प्रेषित कर एक मिसाल कायम की। रहीमदास जी के लिए कहा गया है- ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक की तीर, देखन के छोटे लगें घाव करें गंभीर।’

मगर रहीम दास जी ने शब्दों की लक्ष्मण रेखा को कभी नहीं लांघां। घाव गंभीर करने के चक्कर में गाली का खंजर चुभोना उचित नहीं कहा जाएगा। बहुत पहले एक फिल्मी गीत आया था- नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा मेरी आवाज ही पहचान है। वाकई किसी व्यक्ति, किसी राजनीतिक दल के जीवन काल में उसके द्वारा बोले गए शब्द ही उसका मूल्यांकन करते हैं। जनता भी जानती है, कौन से शब्द अनायास निकल आए हैं और कौन से जानबृझ कर बोले गए हैं। किस शब्द को हवा में उछाल कर कौन क्या पाना चाहता है।

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