संपादकीय : बारोजगारी के कदम

उत्तर प्रदेश सरकार ने रिक्त पड़े तीन लाख पदों को भरने के लिए जिस तरह सक्रियता दिखाई है निश्चित रूप से यह सराहनीय कदम माना जायेगा। दो लाख पदों पर पहले से ही नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के प्रयास किये जा रहे हैं। इस तरह कुछ पांच लाख बेरोजगार युवकों को रोजगार मिल सकेगा। माना कि बेरोजगारों की बढ़ती फौज के मद्देनजर यह संख्या पर्याप्त नहीं है, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि इससे पांच लाख परिवारों को राहत मिलेगी। न होने से कुछ होना भला है। पांच लाख की संख्या भी कम नहीं होती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर को जिस तरह विपक्षी दलों ने बेरोजगारी दिवस के रूप में मनाया, उनके लिए यह माकूल जवाब है।

मनरेगा एवं अन्य सरकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों को रोजगार देने का प्रयास किया जा रहा है। यह अस्थायी ही सही, लेकिन इससे भी राहत तो मिलती ही है। सरकार किसी की भी हो, उसके पास असीमित नौकरियां नहीं होतीं। वह जिनको भी नौकरी देती है, उनका आर्थिक भार उसे स्वयं ही वहन करना होता है। बजट में इसके लिए जितना प्रावधान होता है, वह उससे आगे नहीं बढ़ सकती। आगे बढ़ने का मतलब होता है बजट घाटा बढ़ना। यूं तो यह घाटा हर बार बढ़ता है लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है। इस सीमा को कोई भी सरकार पार नहीं कर सकती। आय-व्यय में संतुलन रखना भी तो सरकार का ही दायित्व होता है। यहां यह सवाल जरूर उठता है कि ये नौकरियां स्थायी होंगी या संविदा पर अस्थायी। हालांकि यह मुद्दा अलग है लेकिन बात जब नौकरियों की चले तो इस पर भी विचार करना जरूरी हो जाता है।

अभी कुछ समय पहले ही घोषणा की गयी थी कि सरकार पहले पांच साल की संविदा पर कर्मचारियों की नियुक्त करेगी। ऐसे में जो व्यक्ति चार साल बाद सेवा से हटाया जायेगा, वह किस लायक रह जायेगा। फिर न तो वह किसी परीक्षा की तैयारी के लायक रह जायेगा और न उसकी आयु सीमा शेष रह जायेगी। उसके सामने भविष्य का यक्षप्रश्न शेष रह जायेगा। अभी तक साल-डेढ़ साल का एडहाक पीरियड समाप्त होते ही कर्मच्रारी को स्थायी कर दिया जाता है।

शायद सरकार ने भी इस खतरे को भांपा है, यही कारण है प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने स्वयं स्पष्टीकरण जारी किया है कि संविदा की बात प्रदेश सरकार की नौकरियों पर लागू नहीं होगी। ठीक भी है, परिवीक्षा की अवधि इतनी लंबी नहीं होनी चाहिए कि अभ्यर्थी के सामने बाद में कोई विकल्प ही शेष न रह जाये। प्रदेश सरकार का यह कदम निश्चित रूप से युवाओं और उनके परिवारों के लिए बड़ी राहत प्रदान करेगा।

यहां सवाल यह भी उठता है कि हर बेरोजगार नौकरी ही क्यों तलाशता है। क्या रोजगार पाने के कोई अन्य साधन नहीं हैं। हालांकि सरकार स्वयं कह रही है कि ऐसे उद्यम खड़े करें जिनसे आप स्वयं नौकरी प्रदाता बनें, इसके लिए तरह-तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं, लेकिन नौकरी प्रदाता की स्थिति आने में अभी वक्त लगेगा। जरूरत इस बात की है कि लोग इस बात को भी समझें कि सभी के लिए सरकारी नौकरियां दे पाना किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं है। जिसे नौकरी मिल जाती हैं, अच्छी बात है, लेकिन लोगों को अपने उद्यम, कारोबार खड़े कर भी रोजगार की समस्या मिटाने का प्रयास करना चाहिए। जब तक ऐसे कदम नहीं उठाये गये बेरोजगारी का संकट समाप्त होने वाला नहीं।

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