संपादकीय लेख : हमारी हनक बनाम पड़ोसी की सनक

सूर्य कुमार पांडेय-प्रख्यात व्यंग्यकार

हमारे गांव में एक भूतपूर्व जमींदार के पास कई एकड़ खेत हैं, लेकिन उसका विस्तारवादी मन इतनी सारी जमीन से आजीवन असंतुष्ट रहा। यह जमीन तो उनके पुरखों की देन है, जो उनको विरासत में मिल गई है। इसमें भला उनका क्या योगदान है? वह अपने बाद की पीढिय़ों के लिए उस जमीन से अधिक क्षेत्रफल वाला खेत छोड़ जाना चाहता है। हालांकि पूरा गांव इस बात से वाकिफ है कि इस जमींदार के पूर्वज मेड़ काटने में माहिर हुआ करते थे। वह लोग हर फसल के सीजन में अपने खेत के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी करने के लिए मशहूर थे।

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एक समय आया, जब ऊपर वाले ने खुद ही उन सबका पत्ता काट दिया। अब वे सारे लोग तो इस धरती पर रहे नहीं। हां, रह गई वह जमीन, जिसे वे अपनी जिंदगी में शनै-शनै काट कर अपने खेत में मिला चुके थे। अपने पूर्वजों की समृद्ध मेड़काटूपरंपरा की सारी जिम्मेदारी अब इस जमींदार पर आ गई हैं।

आजकल वह ट्रैक्टर से मेड़ काटता है। उसके खेत को छूकर गुजरने वाली चकरोड की शामत है। उसकी लोलुप दृष्टि से और आहिस्ता-आहिस्ता बरसों की कटाई के फलस्वरूप वह चकरोड अब पगडंडी जैसी हो चली है। इस जमींदार को अपने पड़ोसियों से सीमा-विवाद में उलझे रहने में आनंद आता है। वह जब-तब अपने खेत के बगल वाले किसान की जमीन को भी अपनी बताने लग जाते हैं और उसमें आए दिन घुसपैठ की कोशिशें करते हैं। जब पड़ोसी उसको रोकते आता है, तो वह कहता है, आओ, इस मुद्दे पर बातचीत कर लेते हैं। इधर बातचीत चलती रहती है, उधर वह किसी और दिशा में काबिज होने की साजिश करता हुआ पकड़ा जाता है।

हमारे गांव के पुरखे लोग शरीफ रहे होंगे या फिर उन्होंने सोचा होगा कि कौन इस शातिर और धूर्त जमींदार के परिवार से खालीपीली पंगा ले, इसलिए चुप रहते रहे होंगे, लेकिन अब हमारा गांव भी बदल चुका है। लोग जागरूक हो चुके हैं। जमींदारी वाले दिन नहीं रहे। सभी अपनी शर्तों पर जीते हैं। कोई किसी का बंधुआ नहीं है। लोग शिक्षित भी हुए हैं, आर्थिक मोर्चे पर सम्पन्न भी और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी हो चुके हैं।

उन्हें पता है कि उनके पास कितनी जमीन है और उसकी हद कहां तक है? अब वे लोग जमींदार की कुटिल हरकतों से सर्वथा सावधान रहते हैं और उस जमींदार परिवार से आंख में आंख मिलाकर बात करने की हिम्मत रखते हैं, लेकिन जमींदार की हरकतें आज भी कुछ-कुछ वैसी ही हैं, जैसी उसके बाप-दादाओं की हुआ करती थीं। वह हमेशा इस फिराक में रहता है कि अपने पड़ोसी की सीमा में घुसपैठ कर उसकी जमीन कब्जा कर ले। दुनिया बदल गई। मगर इस जमींदार की सोच नहीं बदली है। इधर के कुछेक दशकों में अब यह एक भूमाफिया हो चुका है। इस जमींदार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की अनदेखी कर जिस किसी ने भी इस पर भरोसा किया, उसी ने धोखा खाया है।

जमींदार की नई पीढ़ी ने इधर के कुछेक बरसों से दुकानदारी का धंधा भी शुरू कर रखा है। इसने अपनी सड़क किनारे की उन जमीनों पर दुकानें खोल दी हैं, जो कभी अवैध तरीके से उसके हाथ लग गई थीं। अब यह जमींदार परिवार एक चतुर बनिए की भूमिका में है। बाजार में सबसे सस्ता माल इसकी दुकानों पर ही मिलता है, जो घटिया तो होता ही है, टिकाऊ भी नहीं होता है।

मोबाइल फोन, बिजली के सामान, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोटर गाडिय़ों के पुर्जे ही नहीं, भांति-भांति के चलते पुर्जे सामानों की होलसेल की सप्लाई के मामले में भी इसकी दुकानदारी अव्वल नंबर की है। रस्ते का माल सस्ते में टिका देने से इसका धंधा चोखा है। अगर कोई दूसरा व्यक्ति इस जमींदार की निर्भरता से चुनौती लेने लग जाए, तो यह उससे हाथापाई करने पर उतारू हो लेता है।

चलते-चलते, मैं यही कहना चाहूंगा कि जिसने भी मेरा यह लेख अंत तक पढ़ा होगा, उसको इसे पढ़ते हुए जरूर हमारे उस पड़ोसी देश की याद आ रही होगी, जिसकी करतूतें और हरकतें हू-ब-हू मेरे गांव के जमींदार जैसी ही हैं। मैं पहले उस देश पर ही अपना यह तिर्यक लेख लिखने की सोच रहा था, लेकिन मन की बात बताऊं, तो भीतर से यह आवाज आई कि अमा, जिस देश का नाम आज तक तुम्हारे प्रधानमंत्री के मुंह से नहीं निकला है, फिर तू ही क्यों उस नीच का नाम लेकर अपनी जुबान गंदी करने की सोच रहा है।

इसलिए इस लेख में मैंने उसके नाम से समुचित दूरी बनाए रखी है। वैसे भी कोरोना के इस संक्रमण काल में वैयक्तिक दूरी बनाए रखना ही समझदारी की बात है। उससे तो और भी, जिसकी वजह से हमारे गांव में ही नहीं, सारी दुनिया में यह विस्तारवादी वायरस अपना आतंक मचाए हुए है। टिकटॉक जैसे बन्दरकूद मोबाइल एप पर प्रतिबंध मात्र से जिसकी बौखलाहट सातवें आसमान पर जा पहुंची है, उस पर यह एक छोटी सी चोट ही उसके टिकाऊपन की कलई खोलने के लिए समुचित है।

अंत में, एक किस्सा सुनाना चाहता हूं। मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा, चीनी को शक्कर क्यों कहते हैं? मैंने उनसे कहा, चीनी को शक्कर इस नाते कहा जाता है कि शक्कर बोलने में शक-कर की अंतध्र्वनि छिपी हुई होती है। किसी चीनी से नमकहलाली की आशा करना निरी मूर्खता है। इसलिए हम भी चुप नहीं बैठे हैं। जांबाजी का परचम फहराने वाले योद्धाओं से संयुक्त, एक समझदार, साहसी और बराबर की टक्कर देने वाले महान देश के लोग हैं हम।

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