संपादकीय : अदभुत और अकल्पनीय

हल्ला, शोरगुल, माइक तोड़ना, विधेयक की प्रतियां फाड़कर सभापति पर फेंकना और धक्का मुक्की राज्यसभा का यह नजारा देख ऐसा लग रहा था मानों विश्वविद्यालय में छात्रों का हंगामा हो या हमारे नगर निगमों में सभासदों की बैठक। रविवार को देश के उच्च सदन यानि राज्य सभा में सदस्यों द्वारा जो अभूतपूर्व हंगामा मचाया गया वह शर्मनाक कर देने वाला था। यह बात अलग है कि विपक्ष के इस बेहूदे हंगामे के बीच ऐतिहासिक कृषि विधेयक ध्वनिमत से पास हो गए।

कृषि विधेयक को लेकर विपक्ष के तेवर शुरू से ही टेढ़े थे, लेकिन सदन के पटल पर इसे रखने के साथ विपक्ष मानों आग बबूला हो गया और सदस्यों ने सदन में, जो बन पड़ा वह कर डाला और सारा गुस्सा उपसभापति पर उतार दिया। हालांकि उपसभापति हरिवंश ने विधेयकों को पास कराने के लिए कार्यवाही का समय बढ़ाने का फैसला किया लेकिन कांग्रेस की ओर से गुलाम नबी आजाद ने इसका विरोध किया। इस तरह उपसभापति ने विपक्ष की अनदेखी कर विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। विपक्ष इसे प्रवर समिति में भेजने की मांग पर अड़ गया और इस पर मत विभाजन की बात कहने लगा। हद तो तब हो गई जब तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ब्रायन और आप के नेता संजय सिंह रूल बुक हाथ में लेकर वेल में पहुंच गए और इसके पन्ने फाड़ने लगे और उसे आसन की ओर फेंकने लगे तभी किसी ने माइक तोड़ा तो कोई नारेबाजी करता हुआ हुडदंग मचाने लगा। राज्यसभा जिसे पढ़े लिखे और विशेषज्ञों का सदन कहा जाता है, वहां वह सब कुछ हो गया, जो नहीं होना चाहिए था। उच्च सदन में सदस्यों से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

आखिर कृषि से संबंधित इन दोनों विधेयकों का विरोध आखिर किस लिए हो रहा है? क्या यह किसानो की उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेचने की इज्जात देता है इसलिए या यह किसानो को अब विचौलियों और आढ़तियों से कूकती दिलाने वाला बिल है इसलिए? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिल पास होने के बाद ट्वीट में किसानो को बधाई देते हुए कहा है कि कृषि के इतिहास में यह एक बड़ा दिन है। यह न केवल कृषि क्षेत्र में अमूलचूल परिवर्तन लाएगा, बल्कि इससे करोड़ों किसान सशक्त होंगे। उन्होंने ठीक कहा है कि दशकों से हमारे किसान कई प्रकार के बंधनों से जकड़े हुए हैं। उन्हें मंडियों के सहारे विचौलियों का सामना करना पड़ता है। हालात यह हैं कि किसान तो गरीब से बदतर हो गया और विचौलिये करोड़पति हो गए। अब किसानों को इन सबसे मुक्ति मिल जाएगी। अब वह अपनी मनमर्जी के मालिक होंगे।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बिल को लेकर किसान आंदोलित हैं। विपक्ष किसानों को उनके हित समझाने के बजाए उन्हें बरगला रहे हैं। सरकार को भी किसान की आशंकाओं को दूर करना होगा। हालांकि, इन बिलों में सरकारी खरीद बेच करने या न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने की बात नहीं कही गई है। इस बात को प्रधानमंत्री भी दाेहरा चुके हैं। यह बात भी सच है कि 75 फीसदी छोटे किसान हैं, जिसे अपने भविष्य की चिंता ज्यादा है। हमें उम्मीद है सरकार इस बृहद् अभियान को चलाकर आशंकाओं को दूर करेगी।

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