फारूख शेख को एक बार फिर मिला सई परांजपे की फिल्म ‘कथा’ में काम करने का अवसर

वर्ष 1983 में फारूख शेख को एक बार फिर सई परांजपे की फिल्म ‘कथा’ में काम करने का अवसर मिला। फिल्म की कहानी में आधुनिक कछुये और खरगोश के बीच रेस की लड़ाई को दिखाया गया था। इसमें फारूख शेख ने खरगोश की भूमिका में दिखाई दिये जबकि नसरूद्दीन शाह कछुये की भूमिका में थे। इस फिल्म में फारूख शेख ने कुछ हद तक नकारात्मक किरदार निभाया। इसके बावजूद वह दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।

वर्ष 1987 में प्रदर्शित फिल्म ‘बीबी हो तो ऐसी’ नायक के रूप में फारूख शेख के सिने करियर की अंतिम फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेत्री रेखा के साथ काम किया। नब्बे के दशक में अच्छी भूमिकाएं नहीं मिलने पर शेख ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया।

90 के दशक में फारूख शेख ने दर्शकों की पसंद को देखते हुए छोटे पर्दे का भी रुख किया और कई धारावाहिकों में हास्य अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया। इन सबके साथ ही ‘जीना इसी का नाम है’ में बतौर होस्ट उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। वर्ष 1997 में प्रदर्शित फिल्म ‘मोहब्बत’ के बाद उन्होंने ने लगभग दस वर्ष तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया। फारूख शेख के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेत्री दीप्ति नवल के साथ काफी पसंद की गयी है। वर्ष 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में सबसे पहले यह जोड़ी रूपहले पर्दे पर एक साथ नजर आई। इसके बाद इस जोड़ी ने साथ-साथ ‘किसी से ना कहना’, ‘कथा’, ‘एक बार चले आओ’, ‘रंग बिरंगी’ और ‘फासले’ में भी दर्शकों का मनोरंजन किया।

हिंदी फिल्म जगत में फारूख शेख उन गिने चुने अभिनेताओं में शामिल हैं जो फिल्म की संख्या के बजाय उसकी गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देते हैं। इसी को देखते हुए उन्होंने अपने चार दशक के सिने करयिर में लगभग 40 फिल्मों मे ही काम किया है। अपने लाजवाब अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले फारूख शेख 27 दिसंबर 2013 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।फारूख शेख की उल्लेखनीय फिल्मों में कुछ अन्य हैं ‘गमन’, ‘साथ-साथ’, ‘किसी से ना कहना’, ‘रंग बिरंगी’, ‘लाखों की बात’, ‘अब आएगा मजा’, ‘सलमा’, ‘फासले पीछा करो’, ‘तूफान’, ‘माया मेम साहब’, ‘मोहब्बत’, ‘सास बहु’ और ‘सेन्सेक्स’, ‘ये जवानी है दीवानी’ आदि।

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