दीपोत्सव से झिमिलाता हिन्दी साहित्य

ओम प्रकाश तिवारी

भारतीय समाज उत्सवधर्मी है। उत्सव ही हमारा भाव है, सांस्कृतिक विरासत है। दीपावली इसमें से प्रमुख विरासत है। यह सनातन मतावलंबियों का सबसे सुन्दर पर्व है। दीवाली में साफ़-सफाई की जाती है।

अमावस की रात को दीपों से सजाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व माना जाता हैं। यह घर में लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक पर्व है। हर तरफ खुशियों का आलम होता हैं। अपनों से मिलने का सुखद अनुभव होता हैं। दीवाली खरीफ की फसल कटने के बाद आती है ।

इसलिए उल्लास स्वाभाविक है। वातावरण में भी गजब की मादकता होती है। अब जहां हर्ष, उल्लास एवं उमंग होगा, वहां काव्य की अनुगूंज होगी ही। हिंदी साहित्य में दीपोत्सव बड़े ही मनोरम ढंग से प्रकट हुआ है। कवियों ने दीप और दीपोत्सव की महिमा का खूब बखान किया है।

एक स्थान पर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – ‘कम से कम ढाई-तीन हजार वर्षों के मानव-चित्त के उमंग और उल्लास की कहानी इस पर्व के साथ जुड़ी है’। गद्यकारों ने भी अपनी कहानियों, नाटकों और संस्मरणों में ज्योति पर्व के अप्रतिम सौंदर्य का बड़ी ही ख़ूबसूरती से वर्णन किया है।

महादेवी वर्मा ने दीपक को प्रेम से जोड़ते हुए बड़ी ही मनोरम पंक्तियाँ लिखा है –

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन।
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल।

हिंदी साहित्य के छायावाद के सुकोमल कवि सुमित्रानंदन पंत की यह पंक्ति दीवाली का अनुपम चित्र प्रस्तुत करती है – ‘रंग गयी पग-पग धरा, हुई जग जगमग मनोहरा। पन्तजी ने फूलों के चित्रित दीप जलाकर बसन्त ही में दीवाली मना डाली।

दीपावली हर्ष और उल्लास का पर्व है। उल्लास की भावना को डॉ हरिवंश रॉय बच्चन ‘मधुशाला’ में इस भाव में प्रस्तुत करते हैं –

‘एक बरस में एक बार ही जगती होली की ज्वाला।
एक बार ही लगती बाजी जलती दीपों की माला।
किन्तु किसी दिन आ मदिरालय में देख,
दिन को होली रात दिवाली रोज मनाती मधुशाला’।

कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध रोशनी और अंधेरे पर कहते हैं – पेड़ पर रात की अंधेरी में जुगनुओं ने पड़ाव हैं डाले या दिवाली मना चुड़ैलों ने आज हैं सैकड़ों दिये बाले।

प्रसिद्ध गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ ने दीपावली के बहाने अपनी इस लोकप्रिय कविता में हमें कितनी सूंदर प्रेणना देते हैं –

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना

इसी तरह सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने लिखा है – ‘मेरे छोटे घर कुटीर का दिया, तुम्हारे मन्दिर के विस्तृत आंगन में सहमा-सा रख दिया गया,। अपनी भग्नदूत खंड की कविता दीपावली का एक दीप में लिखते हैं – ‘बुझता दीपक कहता है दीपक हूँ, मस्तक पर मेरे अग्निशिखा है नाच रही यही सोचा-समझा था शायद आदर मेरा करें भी’।

प्रसिद्ध ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय अपने निबंध संग्रह ‘मराल’ में दीवाली को मात्र धन-समृद्वि का पर्व मानने की भ्रांति को दूर करते हुए बड़े पते की बात लिखी है। वो लिखते हैं, ‘सारा उत्तर भारत इसे अर्थ की देवी माधवी या लक्ष्मी के त्योहार के रूप में ही मनाता है। तब क्या प्रकाश के जगमगाते असंख्य दीपकों की पांत अर्थ गरिमा की द्योतक है।

भारत का गरीब से गरीब आदमी भी जिसका एकमात्र गौरव उसका धर्म बोध ही है, माटी का एक जोड़ा दीया अपने दरवाजे के सामने इस दिन जरूर रखता है। उन दीपकों से उसका अंहकार नहीं, उसकी श्रद्वा प्रकाशित हो रही है। यह श्रद्वा उसके अन्तर्निहित मनुष्यता की गरिमा है और श्रद्वा धर्मबोध और पवित्रताबोध से जुड़ी है, अतः यह हमारे अवचेतन को धर्म-मोक्ष के मार्ग पर ठेलती है’।

यह भी रोचक है कि प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने अपनी पहली कहानी ‘दिवाली के दिन’ शीर्षक से ही लिखी थी। विष्णु प्रभाकर के शब्दों में – ‘मैंने लिखना शुरू किया। पहले कविता लिखी फिर गद्य काव्य। लेकिन उनमें मन इतना रमा नहीं, इसलिए कहानी लिखनी शुरू कर दी। इन सबका परिणाम अंततः दिवाली के दिन कहानी के रूप में हुआ।

इस तरह हिंदी साहित्य दीपोत्सव के सूंदर वर्णनों के भरा है। आज भी गद्य और पद्य के वीभिन्न विधाओं में साहित्यकार उमंग और उल्लास के पर्व की लोक महिमा का बखान कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आम लोग भी ज्योति पर्व पर अपनी रचनाएं पोस्ट कर रहे हैं। कहा जाता है कि जिसने अमावस के उजाले को अपनी कविता में नहीं उतारा वह कवि नहीं हो सकता।

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