अवाम का हाल लेने अंधेरे में निकलते थे हुक्काम

बृजेश शुक्ल

नानी कहानियां सुनाया करती थीं, राजा और रानी अपनी प्रजा का हाल-चाल लेने के लिए भेष बदलकर रात के अंधेरे में निकला करते थे। सम्राट अशोक ने अपने राज दरबार के बाहर बाकायदा यह आदेश लिखवा रखा था चाहे दिन हो या रात आम लोगों के लिए वह हमेशा उपलब्ध हैं। महाभारत में वर्णन है कि धर्मराज युधिष्ठिर प्रजा का हाल-चाल देने के लिए लोगों से मिलते थे। आजादी के बाद बहुत से नेता आम लोगों की हालचाल लेने और शासन प्रशासन को परखने के लिए रात में निकलते थे । भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे  रात के अंधेरे में वेश बदलकर थानों में पहुंच जाया करते थे। वह पुलिस थाने में गरीब का वेश बना कर जाते हैं और कहते की रिपोर्ट दर्ज कर लीजिए।

इससे इस बात का अंदाज हो जाता था की शासन की कार्यपालिका पर कितना पकड़ है और  पुलिस आम लोगों से कैसे पेश आती है। लेकिन धीरे-धीरे नेतागण आराम तलब हो गए और प्रचार प्रसार के लोभी भी। मंत्री बाकायदा फोटोग्राफरों और पत्रकारों को सूचना देकर आकस्मिक निरीक्षण के लिए निकलने लगे। जब इतने फौज फाटा और डंके की  चोट पर निरीक्षण के लिए मंत्री निकलेंगे तो किस बात का आकस्मिक निरीक्षण।

उत्तर प्रदेश में करोना महामारी के बीच अधिकारियों  ने मनमानी और बेईमानी की उससे तो यही लगता है की अब सियासतदा और आवाम के बीच दूरियां बहुत बढ़ गई हैं। आखिर जनप्रतिनिधियों को भी यह पता करने में इतने दिन कैसे लग गए की कुछ अधिकारियों ने इस महामारी के नाम पर  बेईमानी की है। सबसे आश्चर्य की बात है की इस लूट की जानकारी सबसे पहले भाजपा विधायकों को लगी और उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को अवगत कराया। लेकिन सवाल यह है क्या विपक्ष सो रहा था। साफ है कि विपक्ष का जन सरोकार से कोई मतलब नहीं बचा। जब घर बैठकर राजनीति होगी और अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं होगा तो ना अधिकारियों की मनमानी का पता चलेगा ना ही आम जनता के दुख दर्द का। क्या विधायकों और मंत्रियों का इतना बड़ा अमला दिन के उजाले और रात के अंधेरे में जनता के बीच जाकर दुख दर्द को नहीं देख सकता। क्या सारी व्यवस्था अधिकारियों के भरोसे ही चलेगी। आखिर उस दिशा और दशा की ओर क्यों बढ़ गए हैं की हमें पता ही नहीं चलता की आवाम के सुख क्या है उनके दुख क्या है और उनका निवारण कैसे हो सकता है।

आखिर सियासतदां और आवाम के बीच कैसे व क्यों दूरियां बढ़ती चली गई। पहले मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक जनता दरबार दर्शन जनता दर्शन का कार्यक्रम लगाते थे । इस कार्यक्रम में आने वाली शिकायतों से यह पता चल जाता था की आखिर जनता की सबसे बड़ी समस्या क्या है और कौन से विभाग उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। जनता दरबार के लिए बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रम के समय में बदलाव कर दिया जाता था। फिर वह दौर भी आया की जनता दर्शन व जनता दरबार दोयम दर्जे में आ गया। कभी मुख्यमंत्री लोगों के दुख दर्द सुनते और कभी अपनी जगह मंत्रियों को भेज देते।  मायावती ने तो जनता दर्शन भी बंद कर दिया। एक दलित लड़की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती से मिलने के लिए कई बार मेरठ से लखनऊ आई लेकिन वह उनसे नहीं मिल सकी।  अधिकारियों ने मायावती के सामने उनकी सुरक्षा का ऐसा खाका खींचा कि उन्होंने किसी से मिलना ही बंद कर दिया। वह जब दौरा करने जाती थी तो कार के शीशे बंद रहते थे। वह दौर  भी याद आ रहा है जब विधानसभा सत्र के पहले विधान मंडल दल की बैठक होती थी और इसमें दलों के नेता शामिल होते थे।  यह बैठके हंगामी होती थी और विधायक अपने दल विशेष के लिए नहीं बल्कि जनहित के  मुद्दे उठाते थे और लड़ते थे। मुख्यमंत्री तक से बहस होती थी। मुख्यमंत्री और मंत्रियों को भी यह जानकारी मिल जाती थी कि आखिर समस्याएं हैं क्या। यही स्थिति हर दल के नेताओं के सामने आती थी। जनप्रतिनिधि बताते थे कि उनके किस मुद्दे से जनता खुश है और किस से नाखुश।

फिर वह दौर भी आया जब विधान मंडल दल की बैठक चाटुकारिता का अड्डा बन गई। एक बार बीएसपी के एक विधायक ने विधानमंडल दल की बैठक में एक मुद्दा उठा दिया। बैठक के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपने विधायक को बुलाया और कहां की तू आजकल बहुत बोलने लगा है। विधायकों ने भी समझ लिया की चाटुकारिता करने में ही भलाई है। राजनीति चाटुकारिता का अड्डा बन गई। विधानसभा का कोई महत्व नहीं बचा वहां पर जनहित के मुद्दे के बजाय वह सारे नाटक खेले जाने लगे जिससे अखबार में जगह मिल जाए। कई सांसद और विधायकों की दिलचस्पी संसद और विधानसभा की कार्रवाई में घटी है। विधानसभा, संसद में जो सवाल पूछे जाते हैं उनके अधिकारियों द्वारा  बनाए उत्तर मिल जाते हैं। अधिकारी जो उत्तर  भेज देते हैं उन पर ही मंत्री आंख बंद कर भरोसा कर लेते हैं। इसका परिणाम यह हुआ है की तमाम गड़बड़ियां दब जाती हैं।

इसका एकमात्र उपाय यही है राजनीतिक दलों के नेता कार्यकर्ता और विधायक सांसद सभी मैदान में उतरें और जनता के सरोकार से जुड़ें। बात 1988 की है। अखबार के दफ्तर से रात लगभग डेढ़ बजे काम करके लौट रहा था। रास्ते में सड़क के बीच में ही अधिकारियों की फौज दिखी। पता चला कि रात को निर्मित हो रही सड़क का मुआयना करने व उसकी गुणवत्ता परखने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी मौके पर पहुंच गए थे। उन्होंने निर्माण में घपला पकड़ा। यदि भ्रष्टाचार और मनमानी को रोकना है तो रात में भी जनप्रतिनिधियों को बाहर निकलना होगा। लेकिन पिछले दो दशक से जनप्रतिनिधियों की ज्यादा दखलंदाज़ी पर भी तमाम सवाल उठे हैं।

यह आरोप लगे कि तमाम  जनप्रतिनिधि  भ्रष्टाचार रोकने की अपनी कार्रवाई में अपने लिए ही कुछ पाने की चाहत रखने लगते हैं। इसके लिए जरूरी है की जिन मामलों का निरीक्षण करें उन मामलों को विशेषज्ञ से जांच कराई जाए। वास्तव में नेताओं और आवाम के बीच जब तक दूरी खत्म नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र के असली स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती। इसके लिए जरूरी है लोगों लोगों के बीच जाना होगा उनके दुख-दर्द सुनने होंगे विकास योजनाओं पर गहरी नजर रखनी होगी और दोषियों पर कार्रवाई भी करनी होगी।

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