खरी-खरी : बाजार वाले घर में

उर्मिल कुमार थपलियाल

पहली झांकी

रोशनी से बच गए अंधियार में हूं।

जेब में पैसा नहीं, बाजार में हूं।

हैे समय विज्ञापनों का क्या शिकायत

डरी कविता की तरह, अखबार में हूं।

समय से नाराज हूं, मजबूर हूं, बेचैन हूं।

हूं तो लोहीा मगर मैं, तलवार में हूं।

बाबुओं की नींद में हूं, छुिट्टयों के ख्वाब सा

बंदिशें ही बन्िदशें हैं, लड़कियों के भाग में

बंद खिड़की की तरह दीवार में हूं।

भागते इक दूसरे से बंद कमरों में विभाजित

मैं किसी अति आधुिनक परिवार में हूं।

दूसरी झांकी

न अब पुरनम लिखेगी

न अब शबनम लिखेगी

कलम में दम है तो

अब बम लिखेगी।।

लिखेगी रात-दिन

हर पल लिखेगी

लिखेगी आग बस

हम दम लिखेगी।।

लिखेगी वो दबाओं

में दबी रहकर

मत समझना कलम

अब कुछ कम लिखेगी।।

न कुछ कम लिखेगी

न कुछ अब व्यक्ितगत

होगा हमारा

वो मैं की जगह

अब से हम लिखेगी।।

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