भारत का सांस्कृतिक, आध्यत्मिक ऋण है चीन पर

आशीष बाजपेयी

भारत और चीन के संबंध दुनिया के किन्हीं दो देशों व सभ्यताओं के बीच  सबसे पुराने हैं। चीन की अधिसंख्य आबादी के बीच प्रचलित बौद्ध धर्म भारत से ही वहां पहुंचा। चीन अपनी सांस्कृतिक व आध्यत्मिक विरासत भारत की ही देन मानता रहा है।

बाणभट्ट की लिखी हर्षचरित से जानकारी मिलती है कि चीन से रेशम के अतिरिक्त सिंदूर, कपूर, नाशपाती, आडू और उच्च कोटि के चमड़े का आयात भारत करता था। जाहिर है कि भारत और चीन के व्यापारिक संबंधों का सिलसिला भी बहुत पुराना है। आगे चलकर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के कारण ये संबंध और प्रगाढ़ हुए।

नेहरू की विश्व प्रसिद्ध किताब भारत  एक खोज में कहा गया है कि जहां तक इतिहास की बात है, अशोक के धर्म-प्रचारकों ने रास्ता खोला और ज्यों-ज्यों चीन में बौद्ध धर्म फैला, त्यों-त्यों वहां से यात्रियों और विद्वानों का लगातार आना शुरू हुआ और ये हिन्दुस्तान एवं चीन के बीच एक हजार बरस तक आते-जाते रहे।

भारत और चीन के बीच करीब तीन हजार साल पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं। इन संबंधों की शुरुआत व्यापार के माध्यम से होती है, लेकिन इन्हें स्थायित्व बौद्ध धर्म ने प्रदान किया। पहली शताब्दी में चीन के हान वंशीय शासक मित्रंदी के आमंत्रण पर धर्मरक्ष और कश्यप मातंग बौद्ध संन्यासी चीन पहुंचे। इसके बाद बुद्धिभद्र, जिनभद्र, कुमारजीव, परमार्य, जिनगुप्त और बोधिधर्म चीन पहुंचे। प्रत्येक विद्वान अपने साथ अनेक भिक्षुओं को लेकर गया।

कहा जाता है कि चीन के सिर्फ एक लोयंग प्रांत में तीन हजार से अधिक बौद्ध भिक्षु और दस हजार भारतीय परिवार रहते थे। भारत के विद्वानों व संतों का चीन जाने का क्रम 11 वीं शती तक जारी रहा। वे अपने साथ अनेक धार्मिक ग्रंथ ले गए, जिनका चीनी भाषा में अनुवाद भी हुआ। भारत से छठी सदी में चीन पहुंचे जिनगुप्त के ज्ञान से प्रभावित हो तंग वंश के शासक तक उनके शिष्य तक बन गए थे।

भारत चीन के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में चीनी यात्रियों की प्रमुख भूमिका रही है। चीनी यात्रियों ने न केवल भारत का दौरा किया बल्कि वे राजदरबारों से लेकर बौद्ध विहारों तक में रहे। चीन से आए यात्रियों ने भारतीय विश्वविद्यालयों से दर्शन, गणित, विज्ञान व साहित्य की शिक्षा भी ली। फाहियान दस साल भारत में घूमा और बौद्ध धर्म के साथ चिकित्सा व्यवस्था की जानकारी हासिल की। फाहियान के गुरु चीन के कुमारजीव भारत से ही वहां गए थे।

फाहियान के बाद ह्वेनसांग 16 साल भारत में रहा और नालंदा में पढ़ा, जहां उसे आचार्य की उपधि भी मिली। वह उपकुलपति के पद पर भी रहे। इन दोनों के अलावा इत्सिंग नाम के चीनी यात्री ने भी भारत में नालंदा में शिक्षा प्राप्त की। चीन भारत के ज्ञान-विज्ञान का हमेशा से कायल रहा और 8 वीं शताब्दी में तो भारतीय गौतम सिद्धार्थ चीन में ज्योतिर्विज्ञान केंद्र के मुखिया तक रहे।

जाहिर है कि भारत और चीन के संबंधों का सुनहरा अतीत रहा है, जिसमें धर्म, ज्ञान की विशेष भूमिका रही है। यह सही है कि हमने भौतिक वस्तुओं को चीन से हमेशा आयात किया पर धर्म व ज्ञान की संपदा बड़े पैमाने पर चीन को हमारे ही देश से गयी है। आज जब हमारी सेनाएं एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं तो जरूरी है कि जैसे अतीत में आपसी मतभेद को संवाद और सौहार्द से सुलझाया गया है, वही कोशिश दोबारा की जानी चाहिए। बुद्ध के देश को युद्ध से समस्या का हल खोजने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना होगा। चीन को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का उस पर सदियों से सांस्कृतिक व आध्यात्मिक ऋण है। संबंधों का बहता जल तलवार के प्रहार से अलग नहीं होता।

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