ये है दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसी, दिल्ली विस्फोट की करेगी जांच!

दिल्ली

किसान आंदोलन के बीच दिल्ली में इजरायली दूतावास के पास IED धमाका हुआ। इस धमाके में कोई हताहत तो नही हुआ लेकिन आतंक के खतरे से आगाह कर दिया है। इजरायल ने इन्ही खतरों से निपटने के लिए और इजरायली संसाधनों की रक्षा के लिए दुनिया की सबसे तेज तर्रार और खतरनाक खुफिया एजेंसी का गठन किया है। 

फिलहाल, भारत की एजेंसियां ही दिल्ली धमाके की जांच कर रही है, लेकिन दिल्ली धमाके और इसके जांच के नतीजों पर मोसाद की भी नजर है। रिपोर्टस के मुताबिक दुनिया में कहीं भी इजरायली ठिकानों या व्यक्तियों पर हमला होता है तो मोसाद इसकी समानांतर जांच करती है। अभी ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस मामले की जांच के लिए मोसाद के एजेंट घटनास्थल पर पहुंचेंगे या नहीं। लेकिन इस जांच की अपडेट पर मोसाद की नजर है।

सोशल मीडिया पर इस संगठन ने ली दिल्‍ली में हुए ब्‍लास्‍ट की जिम्‍मेदारी, जांच में जुटीं सुरक्षा एजेसियां

मोसाद का मतलब मौत

मोसाद अपने दुश्मनों को मौत देती है। दुनिया की इस सबसे घातक इस खुफिया एजेंसी ने अपने इस सिद्धांत को कई बार सही साबित किया है। 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में जब आतंकियों ने इजरायल के 11 खिलाड़ियों की हत्या कर दी थी तो मोसाद ने 20 साल लंबा ऑपरेशन चलाकर एक आतंकी को चुन चुनकर मारा था।

बदला लेने में माहिर

दरअसल एक बार जो मोसाद की निगाह में चढ़ गया, उसका बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। मोसाद के खूंखार एजेंट उसे दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढ निकालने का दमखम रखते हैं। यही वजह है कि इजरायल की इस खुफिया एजेंसी को दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसी कहा जाता है। मोसाद की पहुंच हर उस जगह तक है जहां इजरायल या उसके नागरिकों के खिलाफ कोई भी साजिश रची जा रही हो। मोसाद का इतिहास 63 साल पुराना है। इसका मुख्यालय इजरायल के तेल अवीव शहर में है।

मोसाद यानी इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलीजेंस एंड स्पेशल ऑपरेशन। ये इजरायल की नेशनल इंटेलीजेंस एजेंसी है। इजरायल की स्थापना के तुरंत बाद 13 दिसंबर 1949 को ‘सेंट्रल इंस्टीट्यूशन फॉर को-ऑर्डिनेशन’ के बतौर इसका गठन हुआ था। इस एजेंसी को बनाने का प्रस्ताव रियुवैन शिलोह द्वारा प्रधानमंत्री डेविड बैन गुरैना के कार्यकाल में दिया गया था। उन्हें ही मोसाद का डायरेक्टर बनाया गया।

कब हुई थी मोसाद की स्थापना

मोसाद की स्थापना 13 दिसंबर, 1949 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन-गूरियन की सलाह पर की गई थी। वे चाहते थे कि एक केंद्रीय इकाई बनाई जाए जो मौजूदा सुरक्षा सेवाओं- सेना के खुफिया विभाग, आंतरिक सुरक्षा सेवा और विदेश के राजनीति विभाग के साथ समन्वय और सहयोग को बढ़ाने का कार्य करे। 1951 में इसे प्रधानमंत्री के कार्यालय का हिस्सा बनाया गया इसके प्रति प्रधानमंत्री की जवाबदेही तय की गई।

Related Articles

Back to top button
E-Paper