जमूरा मदारी – हैप्पी दीवाली

मुकेश वर्मा

(मस्त मलंग रहने वाले जमूरा मदारी तमाशा दिखाने के लिए लखनऊ के एक चौराहे पर जगह ढूंढ रहे है, लेकिन खेल दिखाने के लिए मुद्दा नही मिल रहा, उसी को लेकर वह जमूरा परेशान है)
जमूरा -(परेशान होकर) उस्ताद! लगता है दिन यह सोचते सोचते निकल जायेगा कि आखिर हम खेल किस मुद्दे पर दिखाए?

मदारी-(कुछ सोंचकर )एक बात कहूँ जमूरे क्यों न खेल कोरोना पर खेला जाए लोगों को सचेत किया जाए दो फिट की दूरी क्योँ है जरूरी इसके सोंचने के लिए मजबूर किया जाए।

जमूरा – उस्ताद!आप जैसा बताओ वैसा मैं करूँगा और अपनी जमूरा मदारी एसोसिएशन को भी जागरूकता फैलाने के लिए मजबूर करूँगा।

मदारी – (गुस्सा होकर) नही किसी को मजबूर नहीं करना है ..वैसे भी लॉकडाउन में सभी भूंख से तिलमिलाए हैं पानी पीकर दिन बिताएं हैं सब को सब कुछ मिला लेकिन जमूरा मदारी एसोसिएशन को ठेंगा मिला ।

जमूरा – तो उस्ताद क्या आंदोलन की तैयारी शुरू की जाए हल्ला बोला जाए।

मदारी -( मुस्कराते हुए ) नही रे शांत रह वक़्त का इंतज़ार कर हर आदमी झगड़ा करेगा तो निपतायेगा कौन ..हमने हमेशा झगड़े निपटाए है हम लोकतंत्र है तांत्रिक नही ।

जमूरा – उस्ताद बोलते अच्छा हो बिहार चले जाते तो बउआ चुनाव जीत जाता और पटाखों का धुंआ न उमड़ता ।

मदारी – बिल्कुल पटाखों का धुआं बड़ा खतरनाक है सांसों को रुंध देता है लाखों का नुकसान होता है ..इस बार मैं पटाखे नही दगाउँग उसका पैसा मैं प्रधानमंत्री राहत कोष में दान करूँगा ताकि जरुरतमंदो की जरूरत पूरी हो सके।

जमूरा – ( कुछ सोंचकर ) उस्ताद …कभी कभी आप बहुत समझदारी वाली बातें करते हो बिल्कुल अपने चोकीदार दीनदयाल पाठक चौक वाले भैया की तरह (कुछ सोंचकर) उस्ताद एक बात कहूँ आप भी 2022 में इलेक्शन लड़ जाओ बहुत उज्वल भविष्य है ।

मदारी – (डांटते हुए) अबे घनचक्कर पहले यह सोँच दीपावली जागरूकता अभियान को लेकर खेल कैसे तैयार करें।

जमूरा – (उत्साहित होकर ) उस्ताद ! हम लोग इलेक्शन इलेक्शन खेलते है आप जो जीतेगा वह पटाखे छुड़ाएगा । फिर पुलिस आएगी उसे पकड़ेगी और जोरदार कंटाप रशीद कर उन्हें समझाएगी यह सब न करे आप सत्ताधारी लोग पटाखा फोड़ेंगे तो जनता क्या करेगी ।

मदारी – (डांटते हुए ) गधे के गधे ही रहोगे भारतीय इतिहास में विजयी नेता ने पुलिस की बात मानी है …नही नही यह सब खेल में नही दिखा सकते ऐसे तो पुलिस हमारा ही पटाखा फोड़ देगी ।

जमूरा – तब क्या किया जाए .?

मदारी – .चलो वही पुराना खेल दिखाते हैं ..भूँखा पेट दीवाली से प्रीत,अंधेरी रात में दिया जलेगा न अब हाँथ में।
जमूरा – ( घबराकर ) नही उस्ताद! वह खेल मैं नही दिखा सकता पांच बार मेरा हाँथ जल चुका है ।

मदारी – (तभी मदारी जमूरे को टोकता है ) अरे रेडियो पर मन की बात सुन ..शायद इसमें कुछ मसाला मिल जाए ..।
(दोनो लोग दीपावली को लेकर रेडियो पर मन की बात का प्रसारण सुनने लगते हैं और उसी में डूब जाते और धीरे धीरे उसी को खेल दिखाने की तैयारी करने लगते है तभी विजय हुई एक राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता सड़क पर पटाखे छोंड़ते चले आ रहे है तभी जमूरा तेजी के साथ चिल्लाता है)

जमूरा – ( चिल्लाते हुए ) उस्ताद भागिए आपकी लुंगी में रॉकेट घुस गया …

(मदारी इससे पहले सम्भलता धड़ाम की आवाज़ आती है और सब शांत हो जाता है वैसे ही सरकारी आदेश होता है कि दीपावली पर कोई पटाखे न दगाये लेकिन लोग धूमधाम को बहादुरी समझते हैं।)

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