अपराधियों की घुसपैठ लोकतंत्र के लिए खतरा

ज्ञानेन्द्र शर्मा- वरिष्ठ पत्रकार

चुनावों का शुद्धीकरण कैसे किया जाय, इस मुद्दे पर चार दशक से भी ज्यादा समय से बहस छिड़ी हुई है, लेकिन यह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, क्योंकि इसके किरदार उसे किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचने ही नहीं देते। तमाम राजनीतिक दल जब अलग-अलग बैठकर अपनी नीतियों और उसके आदर्शों का बखान करते हैं तो राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताते हैं, लेकिन जब उनका समूह गान होता है तो सारे सुर बदल जाते हैं और एक-दूसरे से मिल जाते हैं।

बात-बात पर और हर किसी मोड़ पर एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें खींच लेने वाले ये दल कुछ मुकामों पर एक-दूसरे को सफेद झंडा दिखाकर शांति समझौता कर लेते हैं और एक दूसरे के सुर में सुर मिला देते हैं। इनमें से एक खास मुकाम है चुनाव सुधार और खासकर अपरधियों को चुनाव से दूर रखने का अहम मसला, अपराधी जिनकी राजनीति में धूम है। इसीलिए जब 2 मई 2002 को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव सुधारों की दिशा में एक मजबूत कदम आगे बढ़ाया तो राजनीतिक हलकों में कोहराम मच गया। हुआ यह था कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद चुनाव आयोग ने इस पर अमल करने के लिए 28 जून, 2002 को निर्देश जारी किए कि राज्यसभा, लोकसभा, विधानपरिषदों और विधानसभाओं के लिए होने वाले चुनावों में खड़े होने वाले प्रत्येक उम्मीदवार के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह 5 बिन्दुओं पर सम्पूर्ण सूचनाएं अपने नामांकन पत्रों के साथ संलग्न करे।

ये बिन्दु हैं- 1. किसी आपराधिक मामलों में दर्ज मुकदमों का विवरण, 2. किसी मामले में उसे दो साल से अधिक की सजा हुई तो उसका और गंभीर किस्म के अपराधों का विवरण, 3. अपनी-अपनी पत्नी और अपने आश्रितों की चल और अचल सम्पत्ति का विवरण, 4. देनदारियों की जानकारी, जिसमें सरकारी बकायों व सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय संस्थाओं के बकाए का विवरण शामिल हो और 5. शैक्षिक योग्यता। इस घोषणा के बाद विभिन्न दलों ने बाहें चढ़ा लीं और ये दिशा-निर्देश जारी होने के 10 दिन के अंदर 8 जुलाई, 2002 को सर्वदलीय बैठक में चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश अस्वीकार कर दिए।

यह सवाल उठाया गया कि कानून बनाने की संसद की शक्ति क्या सर्वोच्च न्यायालय या चुनाव आयोग छीन सकते हैं, लेकिन उस समय चुनाव आयोग ने टस से मस होने से जब इनकार कर दिया तो राजनीतिक तंत्र को झुक जाना पड़ा। यह बात अलग है कि बाद में पिछले साल 26 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय नेे स्पष्ट कर दिया कि अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकने के लिए वह ‘लक्ष्मण रेखाÓ पार नहीं कर सकता। साथ ही यह भी कहा कि संसद को ऐसे कानून लाना चाहिए कि जिससे गंभीर अपराध वाले लोगों को विधायिका में प्रवेश से रोका जा सके।

कई और अवसरों पर इस बारे में तरह-तरह के सुझाव दिए गए हैं। लेकिन इस सबके बाद भी  चुनावी प्रक्रिया ने पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बेहाल कर रखा है। ग्रामीण व नगरीय निकायों के लिए होने वाले चुनाव ने रही-सही कसर पूरी कर दी। इन निकायों को मिलने वाली भारी वित्तीय सहायता ने गांव-गांव में और घर-घर में दुश्मनियां पैदा कर दी हैं और यहां भी धनबल और बाहुबल ने राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र पर कब्जा कर लिया है। जिस भारी संख्या में इन चुनावों में उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं।

जीत गए तो लक्ष्मी जी उनके लिए अपने दरवाजे खोल देंगी क्योंकि ग्रामीण निकायों को मिलने वाला धन उनके विवेकाधीन हो जाएगा। हार भी गए तो राजनीतिक शहीद कहलाने लगेंगे और जिन पर उनके किसी कृत्य के लिए प्रशासन या पुलिस ने हाथ डाला तो इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताना उनके लिए आसान हो जाएगा और इस तरह उनके सभी गलत कामों पर धुंध का पर्दा डालना भी आसान हो जाएगा, पुलिस, प्रशासन और बड़े लोग उन्हें जानने लगेंगे, थाने में उन्हें चाय-पानी मिलने लगेगा और अफसरों से काम सुलभ हो जाएंगे। असल बात यह है कि अब राजनीति का मतलब है चुनाव की राजनीति और इस राजनीति का अर्थ है चुनावी जीत और इस जीत को हासिल करने के लिए सब कुछ जायज होता है।

इस सुनहरी नदी के पार जो विजय पताकाएं लहरा रही होती हैं, उनका वरण करना होता है। उसके लिए इस्तेमाल की जाने वाली नावें कैसी भी हों, नाविक कैसे भी हों, पतवारें कैसी भी हों, इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। तमाम प्रयासों के बावजूद चुनाव की गंगा न तो पवित्र हुई और न ही पूरी प्रक्रिया के प्रति आम वितृष्णा खत्म हुई। चुनाव में लडऩे वाले अपना आपराधिक इतिहास बताने लगे, अपनी सम्पत्ति भी बताने लगे, यह भी बताने लगे कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं, लेकिन वोट डालने से पहले इन सारी घोषणाओं को चुनावी तराजू पर तोलने की क्षमता मतदाता में विकसित नहीं हो पाई क्योंकि कर्ता-धर्ताओं ने ऐसा होने ही नहीं दिया। कई मामलों में उल्टा ही असर हुआ। अपराधों की घोषणा उम्मीदवारों का दबदबा बढ़ाने में कारगर सिद्ध हुई, तो सम्पत्ति वालों को समाज में मिला उच्च दर्जा पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। दबंगई चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बन गई।

नरेन्द्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 11 जून, 2014 को राज्यसभा में कहा था कि अपराधीकरण के कलंक को दोनों सदनों से मुक्त करने के लिए सब मिलकर काम करें और जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो उस पर एक साल में फैसला हो। मोदी ने कहा था कि कम से कम 2015 के अंदर ऐसा हो जाय कि लोकसभा या राज्यसभा में कोई भी व्यक्ति ऐसा न हो, जिस उस पर दाग लगा हो।  जरा गौर करिए। 2014 से 2019 की तुलना करिए। एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स (एडीआर) ने अपनी एक रिपार्ट में कहा कि 2014 की तुलना में 2019 के लोकसभा चुनाव में आपराधिक रिकार्ड वाले निर्चाचित सदस्यों की संख्या 26 प्रतिशत बढ़ गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में 43 प्रतिशत यानी लगभग आधे ऐसे सांसद चुने गए, जिन पर आपराधिक केस दर्ज थे।

29 प्रतिशत ऐसे थे जिन पर गंभीर अपराधों के मुकदमे दर्ज थे।  इस विश्लेषण में बताया गया कि 2009 के चुनाव के बाद से अब तक ऐसे सांसदों की संख्या में  दोगुने से भी अधिक की वृद्धि हुई है।  अपराधिक मामलों वाले जो सांसद चुने गए उनमें से भाजपा के 39 प्रतिशत, कांग्रेस के 57 प्रतिशत, जदयू के 81 प्रतिशत, द्रमुक के 43 प्रतिशत और तृणमूल कांग्रेस के 41 प्रतिशत थे। जिन 11 पर हत्या के मुकदमे थे, उनमें भाजपा के 5, बसपा के 2, कांग्रेस, एनसीपी और वाईएसआर कांग्रेस के एक एक सांसद शामिल थे। l

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