खाकी तेरी हालत हो गई कैसी

बागीश धर द्विवेदी- विशेष संवाददाता

खाकी। यह शब्द सुनाई देते ही पुलिस का ध्यान आता है। वैसे तो देश के अधिकांश राज्यों में पुलिस की वर्दी खाकी ही होती है। लेकिन हम यहां बात यूपी पुलिस की कर रहे हैं। उस पुलिस की जिस पर २३६२८६ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के तकरीबन २३ करोड़ की जनसंख्या में न्याय व कानून व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी है। यह न केवल भारत बल्कि विश्व की सबसे बड़ा पुलिस बल है। चाहे साम्प्रदायिक दंगे हो या कोई प्राकृतिक आपदा। किसी की जान बचानी हो या कुख्यात अपराधियों से भिडक़र अपनी जान को दांव पर लगाना हो।

फ्रंट पर अगर कोई नजर आता है तो खाकी वर्दी ही। हर मोर्चे पर पुलिस आम जनता के लिए सुरक्षा कवच बनकर सामने आई। चिलचिलाती धूप या रात का अंधेरा, भूख लगी हो या प्यास, पुलिस वीरान व सुनसान पड़े शहर-देहात की सडक़ों पर बार्डर के किसी आर्मी जवान की तरह दिन-रात मोर्चा ले रही है। ऐसे भी दृष्टांत है जिसमें खाकी रक्षक बनकर सामने आई तो रहनुमा व मददगार बनकर भी। ठंड से ठिठुरते लोगों को कपड़ा दिया तो भूख से बिलबिला रहे लोगों को रोटी दी। फिर भी कानून व्यवस्था के मोर्चे पर हो या भ्रष्टाचार पर सिर्फ पुलिस ही आलोचना का शिकार होती है। आम जनता हो, मीडिया, न्यायपालिका या सत्ता के शिखर पर बैठे लोग हर कोई पुलिस को ही कटघरे में खड़ा करता है।

योगी सरकार में हुई कार्रवाइयों पर नजर डाले तो आईपीएस और पीपीएस ही निशाने पर रहे। तकरीबन साढ़े तीन वर्षों में १५ आईपीएस अफसरों पर निलम्बन की कार्यवाही हो चुकी है। इसमें अभी भी आठ अफसर निलम्बित चल रहे हैं। हालत यह है कि पहली बार दो आईपीएस अफसर अपनी ही पुलिस से भागे-भागे फिर रहे हैं। महोबा के तत्कालीन पुलिस कप्तान मणिलाल पाटीदार और डीआईजी स्तर के अफसर अरविंद सिंह पर भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज है।

प्रान्तीय पुलिस सेवा के सात अफसरों को सेवा से जबरन रिटायर कर दिया गया है। इन सभी पर कनून व्यवस्था के मोर्चे पर विफल रहने और भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप रहे। भ्रष्टाचार के आरोप को कई आईएएस अफसरों पर भी हैं। लेकिन उन पर हाथ डालने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इससे एक धारणा बनती जा रही है कि यूपी में आईएएस का मतलब आई एम सेफ होता है।

ताजा मामला प्रदेश का चर्चित हाथरस कांड का है। यहां एसपी विक्रांत वीर समेत आधा दर्जन पुलिसवाले निलम्बित कर दिए गए लेकिन मीडिया, विपक्षी दलों के शोर मचाने तथा अदालत की ओर से भी सवाल खड़ा करने के बाद वहां के डीएम प्रवीण कुमार के खिलाफ कोई कार्रवाई तो दूर उनका तबादता तक नहीं किया गया। सूबे के सबसे वरिष्ठ आईएएस अफसर राजीव कुमार (द्वितीय) नोएडा प्लाट आवंटन घोटाले में जेल की सजा काट चुके तीन साल बाद बाहर आए तो अखबारों में खबर छपने के बाद उन्हें निलम्बित किया गया।

बर्खास्तगी के लिए अभी तक केंद्र सरकार कोई पत्र नहीं लिखा गया। इसी तरह सीबीआई ने खनन घोटाले में तकरीबन दस आईएएस अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज किया है। उनमें अधिकांश के यहां छापेमारी में लाखों रूपए बरामद भी हुए हैं। लेकिन अभी तक किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। निलम्बित हुए तो सिर्फ प्रमोटी आईएएस देवेन्द्र पाण्डेय। उन पर उन्नाव में तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

पुलिस का एक चेहरा यह भी

२/३ जुलाई की रात कानपुर का बिकरू कांड खाकी के उपर से नीचे तक बिक जाने की एक ऐसी सनसनीखेज कहानी है जिसके कारण उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिलों में कोई न कोई विकास दूबे फल फूल रहा है। इस वारदात में आठ पुलिस वालों के शहीद होने व कुछ के जख्मी होने की वजह से पुलिस ने भले ही विकास दूबे समेत उसके छह साथियों को मार गिराया और कई को सलाखों के पीछे भेज दिया है। लेकिन उसके बाद आई खबरें गवाह हैं कि प्रदेश के जिलों में ऐसे अपराधियों की फाइलें धूल फांकती रही हैं। निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने इस घटना को गम्भीरता से लिया। उसका परिणाम रहा कि माफिया-गुंडों की फाइलों पर जमी धूल साफ कर दी गई है। उनके गुर्गे सलाखों के पीछे भेजे जा रहे हैं। अपराधिक कारोबार से बनाई गई सम्पत्तियां जब्त की जा रही हैं तो वहीं उनके आलीशान भवनों पर बुल्डोजर चल रहा है।

उपर से नीचे तक बिकती है ट्रॉंसफर-पोस्टिंग

पुलिस विभाग में कई दशकों से अधिकांश ट्रांसफर-पोस्टिंग किसी न किसी स्तर से बिकती रही है। प्रदेश के मुखिया के कुर्सी पर चाहे योगी आदित्यनाथ जैसे साफ-सुथरी छवि वाला हो या पूर्ववर्ती सरकारों के मुखिया। पुलिस विभाग में यह खेल हमेशा चलता रहा है। योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद प्रदेश के तमाम जिलों में दागदार अधिकारियों की तैनाती इस बात की पुष्टि करती है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल किसी न किसी स्तर से चल रहा है। हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के आरोप में कई अफसरों के खिलाफ कार्रवाई इस खेल को मजूबत आधार देती है। उपर से शुरू होने वाली खरीद-फरोख्त की यह चेन थाने व चौकियों तक बनी हुई हैं लिहाजा बहुत सारे नाकाबिल लोग चार्ज पा जाते हैं। किसी तरह ईमानदार को चार्ज मिल भी जाता है तो उसका ज्यादा समय लोगों से निपटने में गुजर जाता है।

राजनीतिक दखल की बात कितनी सच

निश्चित तौर पर हर सरकार में पुलिस को अपने ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। यह कड़वा सच है कि पुलिस से में राजनीति-राजनेताओं का दखल जरूरत से ज्यादा होता है। लेकिन इसके लिए काफी हद तक पुलिस का लालच ही जिम्मेदार है। पुलिस अगर डयूटी को प्राथमिकता दे और मलाईदार तैनाती का लालच छोड़ दे तो तय है कि राजनेताओं की पुलिस को उंगलियों पर नचाने की मंशा जरूर प्रभावित होगी।

तो क्या सिर्फ पुलिस ही दोषी

आमतौर पर हमारे समाज के लिए मीडिया और न्यायपालिका के लिए भी पुलिस ही बलि का बकरा बनती है। मतलब यदि अपराध बढ़ रहे हैं अपराध की विवेचना नहीं हो रही है। बाहुबली धनवान आदि के हाथ लम्बे हो चले हों, तो इसके लिए पुलिस को भ्रष्ट निकम्मी और असंवेदनशील कहना एक चलन सा बन गया है। यह सच है कि पुलिस बल में चारित्रक पतन खूब हुआ है। यह भी सच है कि अधिकांश मामलों में जहां कथित अपराधी या रसूख वाला, पैसा वाला तथा राजनीतिक रूप से ताकतवर होता है, हमारी पुलिस अधिकांश मामलों में उसी के साथ खड़ी दिखाई देती है। एक नहीं सैकड़ों उदाहरण मिल जाते हैं जिसमें पुलिस की तहकीकात सवालों में कैद रही। इसमें कोई शक-सुबहा नहीं है कि पुलिस बल का चेहरा मानवीय कम क्रूर ज्यादा है। थाने पर जाने के नाम पर आम नागरिक सिहर उठता है। अपराध की जांच करने की पहली प्राथमिकता एफआईआर को दर्ज कराना जंग जीतने जैसा है।

इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि इन सबके लिए पुलिस ही दोषी है? दरअसल इस समस्या के मूल में हमारे समाज का मतलबी होना है। सिर्फ पुलिस को ही टारगेट करना इसी का नतीजा है। क्यों नहीं हमारा समाज राजनीतिक सत्ता को दबाव में लेकर पुलिस सुधारों की बात करता है। पुलिस एक्ट १९६१ का बना है। अंग्रेजी हुकूमत में गुलामों पर राज करने की नियत से जिस एक्ट को बनाया, हम आजादी के बाद भी उसी एक्ट को ढो रहे हैं। एक नहीं अनेक बार पुलिस के इस सिस्टम में बदलाव की बात उठ चुकी है। कई सरकारों ने कई आयोग, कई कमेटियां बनायी। इन सभी ने पूरी व्यवस्था में अमूल-चूल परिवर्तन में सिफारिश की। लेकिन सभी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने भी पुलिस स्टेबलिसमेंट बोर्ड हर राज्य में बनाने तथा बोर्ड के माध्यम से अफसरों की पोस्टिंग करने जैसे कई सुझाव दिए थे। लेकिन सारे आदेश-सुझाव धूल फांक रहें हैं।

1150 लोग पर एक वर्दी वाला

कानून व्यवस्था पर खड़े हो सवालों के बीच एक बड़ा सच पुलिस बल की कमी भी है। प्रदेश में पुलिसकर्मियों के स्वीकृत पद (नियतन) 277900 हैं। इसके सापेक्ष 205000 पुलिसकर्मियों (सिपाही, दीवान, दरोगा व इंस्पेक्टर) की तैनाती है। इस हिसाब से तकरीबन 72900 पुलिसकर्मियों की फिलहाल कमी है। पूरे आंकड़े पर नजर डाले तो सिपाही के 174000 स्वीकृत पद के सापेक्ष 139000 की तैनाती है, जबकि हेड कांस्टेबल के 60000 स्वीकृत पद के सापेक्ष 39000 की तैनाती है। इसी तरह दरोगा के 39000 पद के सापेक्ष 23000 की तैनाती है। जबकि इंस्पेक्टर के 4900 स्वीकृत पद के सापेक्ष 4000 की तैनाती है। पुलिसकर्मियों की कमी का अंदाजा इस हिसाब से भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश में 1150 नागरिकों की आबादी पर सुरक्षा व कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी एक वर्दी वाले पर है। यह संख्या गृह मंत्रालय के मानक से आधी है। गृह मंत्रालाय द्वारा 596 की आबादी पर एक पुलिसकर्मी के नियुक्त करने की बात कही जाती है। अपराधों पर पूरी तरह लगाम न कस पाने के बीच थानों की स्थिति भी बहुत ठीक नहीं है।

प्रदेश में शहरी इलाकों के थानों की संख्या ग्रामीण इलाकों के थाने की संख्या से तकरीबन आधी है। वर्तमान में प्रदेश 1535 थाने हैं इसमें 997 थाने ग्रामीण इलाकों में हैं। जबकि शहरी इलाकों में थानों की संख्या 524 है। एक वरिष्ठ पुलिस अफसर के मुताबिक 14 थानों का अभी शहर व ग्रामीण थाने के रूप में निर्धारण नहीं हो पाया है। पुलिस के दूसरे अन्य इकाइयों में भी स्वीकृत पदों से कम ही पुलिसकर्मी हैं। पीएएसी में 70000 पद स्वीकृत हैं इसके सापेक्ष 49000 की तैनाती है। वहीं रेडियो, अग्निशमन व परिवहन में 20000 स्वीकृत पद के सापेक्ष 14000 की तैनाती है।

कार्य प्रणाली में सुधार को अवकाश का फार्मूला

यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए सरकार छुट्टी का फार्मूला लेकर सामने आई। पिछले साल १६ अगस्त से पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश की शुरूआत अयोध्या से हुई। पायलट प्रोजेक्ट के तहत तय हुआ कि पहले चरण में अयोध्या के कोतवाली नगर थाने के सिपाहियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाएगा। तय हुआ कि यह अवकाश सोमवार से रविवार तक होगा। अलग-अलग कर्मचारियों को अलग-अलग दिन साप्ताहिक अवकाश दिया जाएगा। अवकाश सुबह आठ बजे से दूसरे सुबह आठ बजे तक चलेगा।

२४ घंटे ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों के लिए यह फैसला काफी राहत देने वाला रहा। माना गया कि इससे उनकी मानसिक थकान दूर होगी। साथ ही पुलिसकर्मी अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन ठीक ढंग से कर सकेंगे। तय हुआ कि साप्ताहिक अवकाश की प्रक्रिया पहले सिपाही पर लागू होगी। तकनीकी तौर पर कोई दिक्कत नहीं होने पर सिपाही से उपर के अफसरों को भी अवकाश दिया जाएगा। लेकिन यह फैसला कोई ठोस आकार नहीं ले पाया है। अयोध्या के एक पुलिस अफसर के मुताबिक सप्ताहिक अवकाश का फैसला सैद्धांतिक रूप से तो लागू है लेकिन गति नहीं पकड़ पाया है।

उनका कहना है कि तैनाती जिले के आस-पास रहने वाले पुलिसकर्मी तो सप्ताहिक अवकाश ले रहे हैं। लेकिन दूर के जिलों में रहने वाले तीन चार अवकाश एक साथ लेना चाह रहे हैं जो सम्भव नहीं है। साप्ताहिक अवकाश का फार्मूला तो २०१३ में तत्कालीन सरकार भी लेकर आयी थी। माना गया था कि बगैर अवकाश लगातार काम करने से पुलिसकर्मी चिड़चिड़े और सुस्त होते जा रहे हैं जिसका असर उनके काम पर पड़ रहा है। इससे निपटने के लिए मॉडल प्रोजेक्ट लखनऊ के गोमतीनगर थाने में एक जून २०१३ से लागू किए जाने का फैसला किया गया था। लेकिन वह प्रोजेक्ट भी कोई आकार नहीं ले सका।

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