खरी-खरी : लखनऊ की शाम

अहा, क्या लखनऊ की शाम यारो
सभी दिखते उमर खय्याम यारो।
वो पूरा देश खाकर सो रहे हैं
हमारी भूख भी बदनाम यारो।

मजा अब आ रहा है दल बदल में
मचा लतियाव पूरे अस्तबल में।
ये राजा है या है सर्कस का जोकर
है मुंह में राम पर कट्टा बगल में।

उर्मिल कुमार थपलियाल

पड़ोसी मिल के यूं समझा रहे हैं
ये सुन के हमको चक्कर आ रहे हैं
हुआ क्या घर में गर बिजली नहीं
बराबर बिल तो आते जा रहे हैं।

न तुम गंगा न जमुना सुरसती हो
बहुत कमजोर, प्यासी हो थकी हो।
हमीं से मांगती दो बूंद पानी
अमां, तुम नदी हो या गोमती हो।

 

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