जीवन की तरह जो प्रवाहमान, वही तो है गद्य

डॉ अरविंद तिवारी

भाषा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। लिपिबद्ध भाषा का स्वरूप मुख्यत: दो रूपों में अभिव्यक्त होता है। पद्य और गद्य। अभिव्यक्ति में जब लय होता है तब वह पद्य का स्वरूप लेता है। अन्यथा गद्य के रूप में ही हम उसे पढ़ते और सुनते हैं। गद्य लिखना भी अपने आप में एक अलग तरह की विशिष्ट कला है। कई रूपों में गद्य को कागज पर उतारा जाता है। या यूं कह लीजिये, जब कविता नहीं होती तब कहानी, निबंध, लेख, नाटक, गद्यगीत या अन्य कई रूपों में साहित्य उतरता है। आज साहित्य वार्ता में हम गद्य की इन विधाओं पर ही विस्तार से चर्चा करेंगे।

आमतौर पर बोलने या लिखने-पढ़ने की छंदरहित सामान्य व्यवहार की भाषा को गद्य कहा जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। सामान्य व्यवहार की भाषा तभी गद्य कही जा सकती है, जब वह व्यवस्थित और स्पष्ट हो। रचनात्मक तौर पर गद्य को मनुष्य की व्यवस्थित भाषा या उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति कहा जाता है।

हिंदी साहित्य में गद्य लेखन की दृष्टि से भारतेंदु युग का विशेष महत्व है। भारतेंदु युग में गद्य लेखन की एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ। तभी से हिंदी गद्य साहित्य में पारंपरिक विधाओं से लेकर पाश्चात्य विधाओं में विपुल मात्रा में लिखा जा रहा है। गद्य की विधाएं विषय योजना, उद्देश्य और भाषाई परिपक्वता के साथ हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही है।

पद्य और गद्य में बहुत सी बातें समान हैं। दोनों के उपकरण शब्द हैं, जो अर्थ परिवर्तन के बिना एक ही भंडार से लिए जाते है। दोनों के व्याकरण और वाक्यरचना के नियम भी एक ही हैं, दोनों ही लय और चित्रमय उक्ति का सहारा लेते हैं। इन सारी समानताओं के बावजूद पद्य और गद्य अभिव्यक्ति के दो भिन्न रूप हैं। दोनों में गुणात्मक भेद है। पद्य और गद्य मनुष्य की मानसिक प्रक्रिया के दो भिन्न रूपों की अभिव्यक्ति हैं।

गद्य लेखन की प्रमुख विधाएं : कहानी, लघु कथा, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, जीवनी, आत्मकथा, डायरी, यात्रा वृतांत, रिपोर्ताज, फैंटेसी, फीचर, स्तंभ लेख, संपादकीय और ललित निबंध। गद्य लेखन की प्रत्येक विधा अपने में पूर्ण और रुचिकर है।

लघु कथा

लघु कथा साहित्य की लघु विधा और सबसे तीक्ष्ण कला मानी जाती है। इसमें कम से कम शब्दों में एक गहरी बात कही जाती है, जिसको पढ़ते ही पाठक का मन चिंतन के लिये व्याकुल हो जाता है। राजनैतिक,सामाजिक व पारिवारिक परिवेश में छोटे से छोटे विसंगतिपूर्ण मानसिकता को रेखांकित करते हुए वास्तविकता के धरातल पर तर्कसंगत, तथ्यों के सहारे कथन को उभारना ही लघुकथा का उद्देश्य माना जाता है। अर्थात विसंगतियों को सूक्ष्मता से पकड़ना ही लघुकथा कहा जाता है। लघुकथा में गम्भीर विषयों का वर्णन किया जाता है।विसंगतियों को देखकर जब रचनाकर के मन में व्याकुलता बढती है तब वह कलम उठाता है, कुछ कहने के लिये। मन की उथल-पुथल जब पीड़ा की सीमा तक पहुँचती है, तभी रचना साकार मानी जाती है। लघु कथा यथार्थ का वोध कराने वाली विधा मानी जाती है।

कहानी 

कहानी गद्य का ऐसा रूप है जिसमें जीवन या मनोस्थिति का वर्णन होता है। अतः हम कह सकते है कि कहानी एक ऐसा आख्यान है, जो यथार्थ का उद्घाटन करता है। यह आकार में छोटी होती है, जिसे एक बार में पढा जा सकता है। यह पाठक पर एक समन्वित प्रभाव डालती है। आज कल लम्बी कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। कथानक, पात्र और चरित्रचित्रण, संवाद, वातावरण,भाषाशैली और उद्देश्य कहानी के मूलतत्व मानें जाते हैं। विषय की दृष्टि से -मनोंवैज्ञानिक, ऐतिहासिक,पारिवारिक सामाजिक,वैज्ञानिक आदि प्रकार की कथानक की दृष्टि से घटना प्रधान, चरित्र प्रधान,वातावरण प्रधान होती है।

कहानी लेखन एक कला है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग, मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा विन्यास सब उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। कहानी एक उद्यान नही, जिसमें अनेंक प्रकार के फूलों को सजाया जाये। यह एक गमले के समान है, जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य पूर्णतयः दिखाई देता है।

उपन्यास 

कथा प्रधान विधाओं में उपन्यास एक प्रमुख विधा है । साहित्य में महाकाव्य का स्थान उपन्यास ने ले लिया है। उपन्यास शब्द ”उप“ उपसर्ग तथा न्यास पद के योग से बना है उप का अर्थ है समीप और न्यास का अर्थ है रखना अर्थात वह रचना जिसे पढ़कर पाठक को ऐसा महसूस हो कि यह उसी के जीवन की कथा उसी के भाषा में कही गयी है। यह मानव जीवन की काल्पनिक विधा कही जाती है। मुंशी प्रेमचंद के अनुसार ‘मै उपन्यास को मानव जीवन का चित्र समझता हॅू। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल उद्देश्य है। किसी युक्ति युक्त रूप से उपस्थित करना उपन्यास कहलाता है। इसमें घटनाओं की बहुलता रहती है। इसमें प्रत्येक घटना अन्य घटनाओं से कार्य करण सम्बन्ध से जुड़ी रहती है। इसमें जीवन की समग्र तथा यथार्थ रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

संस्मरण

संस्मरण दो शब्दों से मिलकर बना है – सम् + स्मरण। इसका अर्थ सम्यक् स्मरण अर्थात् किसी घटना, किसी व्यक्ति अथवा वस्तु का स्मृति के आधार पर कलात्मक वर्णन करना संस्मरण कहलाता है। इसमें स्वयं की अपेक्षा उस वस्तु की घटना का अधिक महत्व होता है, जिसके विषय मे लेखक संस्मरण लिख रहा होता हैं। संस्मरण की घटनाएं सत्यता पर ही आधारित होती हैं। इसमें लेखक कल्पना का अधिक प्रयोग नही करता है। इसका विवरण सर्वथा प्रामाणिक होता है। संस्मरण लेखक जब अपने विषय मे लिखता है तो उसकी रचना आत्मकथा के निकट होती है और जब दूसरे के विषय मे लिखता है तो जीवनी के।

रेखाचित्र 

रेखाचित्र दो शब्दों रेखा और चित्र के योग से बना है। जिस विधा में क्रमबद्धता का ध्यान न रखकर किसी व्यक्ति की आकृति उसकी चाल-ढाल या स्वभाव का आदि विशेषताएंओं का शब्दों द्वारा सजीव चित्रण जाता है उसे रेखाचित्र कहा जाता है। रेखाचित्र शब्द चित्रकला का है जिसका अर्थ ऐसा खाका जिसमें क्रमबद्ध ब्यौरे न दिए गए हों। इसी प्रकार थोड़े से शब्दों मे किसी व्यक्ति, घटना, स्थान या वस्तु को चित्रित कर देना कुशल रेखाचित्रकार का काम है। रेखाचित्र मे लेखक कम से कम शब्दों मे सजीवता भरता है। उसके छोटे-छोटे पैने वाक्य तीव्र एवं मर्मस्पर्शी होते हैं। रेखाचित्र गद्य साहित्य की आधुनिक विधा है। रेखाचित्रकारों मे महादेवी वर्मा, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपूरी एवं डाॅ. नगेन्द्र विशेप रूप से उल्लेखनीय है।

नाटक 

नाटक काव्य और गध्य का एक रूप है। जो रचना श्रवण व दृष्टि द्वारादर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहते हैं। नाटक में काव्य से अधिक रमणीयता होती है। श्रव्य काव्य होने के कारण यह लोक चेतना से अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इस विषय का सबसे प्राचीन ग्रंथ मिलता है। अग्निपुराण में भी नाटक के लक्षण आदि का निरूपण है। अग्निपुराण में नाटक के २७ भेद कहे गए हैं।

एकांकी 

एक अंक वाले नाटकों को एकांकी कहते हैं। पश्चिम में एकांकी २०वीं शताब्दी में लोकप्रिय हुआ। हिंदी में इसका व्यापक प्रचलन पिछली शताब्दी के चौथे दशक में हुआ। एकांकी साहित्य की सर्वथा आभिजात्यहीन विधा महीन है। सस्कृंत नाट्यशास्त्र में नायक के चरित, इतिवृत्त, रस आदि के आधार पर रूपकों और उपरूपकों के जो भेद किए गए उनमें से अनेक को डॉ॰ कीथ ने एकांकी नाटक कहा है।

निबंध

निबन्ध गद्य लेखन की एक प्रमुख विधा है। इसका प्रयोग किसी विषय की तार्किक और बौद्धिक विवेचना करने वाले लेखों के लिए भी किया जाता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार संस्कृत में भी निबंध का साहित्य है। प्राचीन संस्कृत साहित्य के उन निबंधों में धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों की तार्किक व्याख्या की जाती थी। उनमें व्यक्तित्व की विशेषता नहीं होती थी। वर्तमान काल के निबंध संस्कृत के निबंधों से ठीक उलटे हैं। उनमें व्यक्तित्व या वैयक्तिकता का गुण सर्वप्रधान है। सामान्य शब्दों में निबंध, लेखक के व्यक्तित्व को प्रकाशित करने वाली ललित गद्य-रचना है।

जीवनी

किसी व्यक्ति के जीवन वृत्तांतों को सचेत और कलात्मक ढंग से लिखना जीवनी कहा जा सकता है। जीवनी में किसी एक व्यक्ति के यथार्थ जीवन के इतिहास का आलेखन होता है। जीवनी लेखक एक तरफ व्यक्ति के जीवन की घटनाओं की यथार्थता इतिहासकार की भाँति स्थापित करता है तो दूसरी तरफ वह साहित्यकार की प्रतिभा और रागात्मकता का तथ्यनिरूपण में उपयोग करता है। यदि जीवनी का विस्तार किया जाय तो उसके अंतर्गत (आत्मकथा) भी आ जायगी।

आत्मकथा

किसी लेखक द्वारा अपने जीवन का वर्णन करने वाली कथा को साहित्य में आत्मकथा कहते हैं। यह संस्मरण से मिलती-जुलती, लेकिन भिन्न विधा है। संस्मरण में जहाँ लेखक अपने समाज, परिस्थितियों व अन्य घटनाओं के बारे में लिखता हैं वहीं आत्मकथा के केंद्र में लेखक स्वयं होता है। आत्मकथा हमेशा व्यक्तिपरक होती हैं। आत्मकथा से व्यक्ति के जीवन और परिस्थितियों के बारे पढ़कर पाठकों को जानकारी मिलती है। हालांकि इतिहासकार आत्मकथाओं की जानकारी को मान्य नहीं ठहराते।

डायरी 

डायरी लेखन व्यक्ति के द्वारा लिखा गया व्यक्तिगत अभुभवों और भावनाओं को लेखित रूप में अंकित करके बनाया गया एक संग्रह है। विश्व में हुए महान व्यक्ति डायरी लेखन करते थे। डायरी लेखकों के अनुभवों से उनके निधन के बाद भी कई लोगों को प्रेरणा मिलती है। डायरी गध साहित्य की एक प्रमुख विधा है। इसमें लेखक आत्म साक्षात्कार करता है। वह अपने आपसे सम्प्रेषण की स्थिति में होता है।
प्राचीन काल में राजा महाराजाओं के समय भी एक रोजनामचा तैयार किया जाता था। व्यापारियों द्वारा भी हिसाब किताब और लेन-देन का ही विवरण सुरक्षित रखने हेतु बही खाते का प्रयोग किया जाता है। यह भी डायरी लेखन माना जाता है। अतः डायरी लेखन जीवन की घटनाओं को याद करने का एक माध्यम है।

यात्रा वृतांत

यात्रा वृतांत मनोवृति का घुमक्कड़ रूप है। लेखक जब सौंदर्यबोध की दृष्टि से उल्लास भावना से प्रेरित होकर यात्रा करता है और उसकी मुक्त भाव से अभिव्यक्ति करता है तो उसे यात्रा वृतांत कहते हैं। मानव प्रकृति सौंदर्य का प्रेमी है। वह घुमक्कड़ स्वभाव का है। मनुष्य जहां भी जाता है वहां से कुछ-न-कुछ ग्रहण करता है। उसके द्वारा ग्रहण किये गये प्रेम, सौंदर्य, भाषा, स्मृति आदि को अपने शुद्ध मनोभावों से प्रकट करता है, जो साहित्य में समाहित होकर एक नई विधा का रूप ले लेता है। हिंदी साहित्य में यह एक नवीन विधा है।

रिपोर्ताज

रिपोर्ताज फ्रांसीसी भाषा का शब्द है। यह अंग्रेजी भाषा के रिपोर्ट शब्द से बना है। रिपोर्ट किसी घटना के यथातथ्य वर्णन को कहते हैं। रिपोर्ट के कलात्मक तथा साहित्यिक रूप को रिपोर्ताज कहते हैं। आँखों देखी और कानों सुनी घटनाओं पर रिपोर्ताज लिखा जाता है। कल्पना के आधार पर रिपोर्ताज नहीं लिखा जा सकता है। रिपोर्ताज को कथातत्त्व से भी युक्त होना चाहिये। रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार तथा कलाकार दोनों की भूमिका निभानी पडती है।

फीचर 

फीचर को रूपक भी कहा जाता है। यह लोगों को रुचिकर लगने वाला ऐसा कथात्मक लेख है, जो विशेष लोगों, स्थान, या घटना पर केन्द्रित होता है। विस्तार की दृष्टि से फीचर में बहुत गहराई होती है। आधुनिक युग की पत्रकारिता में फीचर लेखन का अत्यधिक महत्व है। फीचर में ग्राफिक्स, चित्रों, रेखाचित्रों और संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण के जरिए बहुत छोटे स्थान में बहुत कुछ कहा, लिखा या प्रस्तुत किया जा सकता है।
फीचर में समाचार के विस्तार को ही एक विशेष तकनीक के साथ प्रस्तुत किया जाता है। मानवीय भावनाओं के स्पर्श के साथ-साथ मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत फीचर अधिक लोकप्रिय होते हैं। फीचर विषय की गहराई में जाकर पाठकों की जिज्ञासा को शांत करने का काम करता है।

स्तंभ लेख

वास्तु तथा संरचना में स्तंभ लेख वह विधा है जो किसी घटना विशेष का वर्णन करता है। अशोक के स्तंभ इसी प्रकार के हैं।

संपादन
किसी लेख, पुस्तक, दैनिक, साप्ताहिक मासिक पत्रिका में किसी सामयिक घटना या विषय पर अग्रलेख लिखना संपादकीय कहलाता है।

ललित निबंध
ललित निबंध एक प्रकार का निबंध ही है। ललित निबंध को आत्मपरक, विषयप्रधान और व्यक्तिनिष्ठ निबंध भी कहते हैं । यह हिंदी साहित्य की आधुनिकविधा है । यह निबंध के साथ ‘ललित’ विशेषण से बना है । ललित से तात्पर्य विदग्धता और रसप्रवणता है।

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