फिर काम आई मास्को की मध्यस्थता

Mahesh Pandey

वरिष्ठ पत्रकार – महेश पाण्डेय

नागोर्नो काराबाख, क्षेत्रफल 4400 वर्ग किलोमीटर, यहां के लोग आर्मेनियाई सभ्यता के ज्यादा करीब हैं। वर्षों से मध्य एशिया का यह क्षेत्र अजरबैजान और अर्मेनिया के बीच कब्जे को लेकर युद्ध की विभीषिका को झेल रहा है, यह पूरा क्षेत्र पूर्व सोवियत संघ से अलग हुए देश हैं। 1923 में सोवियत सरकार ने नार्गोनो को स्वायत्शासी क्षेत्र घोषित किया। काराबाख के पहाड़ी क्षेत्र में इससे अलगाववाद की नींव पड़ गई, नब्बे के दशक में सोवियत रूस के विघटन से अजरबैजान और आर्मेनिया के स्वतंत्र राष्ट्र बन गये। 20 प्रतिशत अजरबैजानी जमीन अपर काराबाख या नार्गोनो काराबाख करीब तीन दशक से अर्मेनिया के कब्जे में है।

1987 से 1989 तक अर्मेनिया ने इस क्षेत्र से दो लाख अजरबैजानियों का निकाल दिया था। 200 से अधिक नागरिक बुरी तरह मार दिए गए। कईयों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। सोवियत संघ के कमजोर होने पर 1980 के शुरूआत में सोवियत अर्मेनिया और इसके डायस्पाटा विदेशों में बसे मूल अर्मेनियाई नागरिक ने नार्गोनों काराबाख को अपना क्षेत्र बना लिया। इसके साथ ही 1994 तक अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच लम्बा युद्ध चला, 1994 मे दानों देशो के बीच अंतरर्राष्ट्रीय मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ लेकिन अन्दर ही अन्दर आग सुलगती रही।

उस समय नार्गोनो काराबाख के विदेशी अंत:क्षेत्र में जनमत संग्रह कराया गया लेकिन अजरबैजान ने इसका बहिष्कार किया। जनमत संग्रह के बाद वहां के लोगों ने स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया। नार्गोनो काराबाख को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी। होने को तो नार्गोनो काराबाख भौगोलिक रूप से अजरबैजान के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र का हिस्सा है। 1994 में लम्बे संघर्ष में अजरबैजान और आर्मेनिया के हजारों लोग मारे गए, बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। संघर्ष विराम के बावजूद दोनों देश एक दूसरे पर हमले करने का आरोप लगाते रहते हैं। एक बार फिर मास्को की मध्यस्थता से दानों देश युद्ध विराम के लिए रजामंद हो गए हैं।

आर्मेनिया ईसाई बहुल है जबकि अजरबैजान में मुस्लिम आबादी का बोलबाला है। दो भिन्न-भिन्न धर्मों और सभ्यताओं वाले इन देशों मे युद्ध की प्रमुख वजह विवादित क्षेत्र में अकूत प्राकृतिक भंडारों पर कब्जा करने को लेकर है। तेल और प्राकृतिक गैस का यह बहुत बड़ा उत्पादक है। अजरबैजान के पास भी प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, वह कई यूरोपीय देशों को तेल और प्राकृतिक गैस का निर्यात करता है। वर्तमान युद्ध के बीच ऐसी खबरें आई हैं कि पाकिस्तान से अघोषित रूप से मिली सैन्य सहायता के बदले अजरबैजान सस्ते दामों पर पाकिस्तान को तेल और गैस देगा जिसका भुगतान पाकिस्तान 10 साल में करेगा। समाचारों में लगातार यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने अपने आतंकी दोस्तों को आर्मेनिया के खिलाफ युद्ध में मोर्चे पर भेजा है। न तो पाकिस्तान इसकी पुष्टि करता है और न अजरबैजान ही।

टर्की के राष्ट्रपति आर्दोगान इस साल फरवरी में पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे, रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि तब ही नार्गोनो काराबाख पर हमला करने का ताना-बाना बुना गया। 2016 में भी चार दिन के लिए अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच युद्ध हुआ। रूस की मध्यस्थता से तब शांति स्थापित हो सकी। इस क्षेत्र में शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद चार बार प्रस्ताव पारित कर चुकी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी दोनों देशों में शांति के लिए दो बार प्रस्ताव पारित किए। इसे अलावा अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न संगठन भी शांति के लिए अपील कर चुके हैं जिसका कोई असर इन दोनों देशों पर नहीं हुआ।

अर्मेनिया का अपर काराबाख और उससे जुड़े हुए सात क्षेत्रों पर कब्जा है, सुसा, काहानकेंडी, खोजलेय, असगान, खोजाबन्द, आगधारा और हुर्दत नगर अपर काराबाख के क्षेत्र हैं। इन पर आर्मेनिया का कब्जा है। इन महत्वपूर्ण स्थानों के अलावा लेचिन, कालबागर, आगधम, फजुली, डाबरवैली, क्वाबादसी और जांगलिन भी आर्मेनिया की गिरफ्त में है। चेरेबन आर्मेनिया की राजधानी है। 80 ई.पू. आर्मेनियाई राजशाही के अन्तर्गत वर्तमान का कुछ भू-भाग सरिया, लेबनान, ईरान, ईराक, अजरबैजान और आर्मेनिया का क्षेत्र आता था।

रोमनकाल में आर्मेनिया, फारस और रोम के बीच बंटा। पिछली शताब्दियों में यह रूस के कब्जे में था। आर्मेनिया के वर्तमान प्रधानमंत्री  ने आठ मई 2018 को पदभार संभाला। वह एक प्रतिष्ठत पत्रकार और सम्पादक रह चुके हैं। 1998 में उन्होंने अपना अखबार शुरू किया ’द अदर साइड ऑफ अर्थ’ उनकी प्रमुख चर्चित पुस्तक है। आर्मेनिया की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ है नहीं है। उसके पास न तो आधुनिक हथियार हैं न उन्हें खरीदने के लिए पैसा। आर्मेनिया की जनसंख्या एक करोड़ से कम है। टर्की और ईरान से इसकी सीमाएं लगती हैं। अजरबैजान की सीमाएं ईरान जार्जिया, रूस और कैस्पियन सागर से मिली हैं। नागोर्नो काराबाख स्वायत्त क्षेत्र आर्मेनिया की अंतरर्राष्ट्रीय सीमा से केवल 50 किलोमीटर दूर है। आर्मेनियाई समर्थ कुछ स्थानीय अलगाववादी सैन्य ग्रुपों का कुछ बड़े क्षेत्रों पर कब्जा है।

27 सितम्बर 2020 से दानों देशों के बीच शुरू हुए युद्ध में अभी तक अजरबैजान का पलड़ा भारी है। उसके पास अत्याधुनिक ड्रोन, अमेरिका से मिले जेट फाइटर, इजरायल से मिले ड्रोन और हथियारों की कोई कमी नहीं है। टर्की खुलकर अजरबैजान के समर्थन में मैदान में कूद पड़ा है। अजरबैजान नार्गोनों काराबाख पर फिर से कब्जा कर लेगा। युद्ध की आग में दोनों देश झुलस रहे हैं। युद्ध क्षेत्र पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना हैकि अजरबैजान के पास ज्यादा घातक हथियार, फाइटर प्लेन और तबाही मचाने वाले ड्रोन हैं। ये सब उसे टर्की के माध्यम से मिले हैं। कनाडा ने आर्मेनिया पर हो रहे उसके बनाए ड्रोनों के इस्तेमाल करने पर नाराजगी जताई है।

कनाडा का कहना है कि वह भविष्य में उसे ड्रोन की तकनीक नहीं देगा। टर्की के पास इजरायल के दो हैराथ टीपी., 100 हार्मेस4507, 100 स्ट्राइकर्स और 50 हारोप्स ड्रोन हैं। वह आर्मेनिया के खिलाफ इनका उपयोग कर रहा है। जिस ड्रोन की ज्यादा चर्चा हो रही है वह बायस्कार टीबी- है। यह टर्की में ही बना है। अर्मेनिया के पास सोवियत संघ के जमाने के ओसा और स्ट्रेला मिसाइल सिस्टम है जो आधुनिक तकनीक के सामने कही नहीं टिकते हैं।

हाल के वर्षों में भारत और अर्मेनिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों में काफी तेजी देखी गई। 1991 के बाद से अब तक  आर्मेनिया के राष्ट्रपति तीन बार भारत की यात्रा पर आ चुके हैं। आखिरी बार वे 2017 में भारत आये थे। आर्मेनिया के लिए भारत के साथ घनिष्ठ संबंध इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं कि भारत अजरबैजान, पाकिस्तान-टर्की के गठजोड़ को एक संतुलन प्रदान करता है। यद्यपि कश्मीर मुद्दे पर अजरबैजान टर्की के साथ ही चलता है। भारत अंतरर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) का हिस्सा है जो कि भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल की आवाजाही के रेल, जहाज और सड़क मार्ग का नेटवर्क है। भारतीय दूतावास के अनुसार अजरबैजान में फिलहाल 1300 भारतीय रहते हैं जबकि आर्मेनिया के अप्रवासन विभाग के अनुसार करीब 3000 भारतीय आर्मेनिया में हैं।

karabakh

टर्की-पाकिस्तान के गठजोड़ में शामिल अजरबैजान के साथ भारत के रिश्ते सामान्य हैं। भले ही कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ होने के बावजूद भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण संबंध नहीं हैं। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति के कारण भारत संघर्षरत दोनों पक्षों में से किसी के प्रति झुकाव नहीं रखता है। टर्की और अजरबैजानी एक दूसरे को भाई समझते हैं। नस्लीय और भाषाई तौर पर वे एक ही हैं। अजरबैजान में भारत की छवि एक मेलजोल वाले राष्ट्र की है। अजरबैजान में रहने वाली ज्यादातर भारतीय आबादी राजधानी बाकू में रहती है। ये भारतीय डॉक्टर, शिक्षक या गैस और तेल कम्पनियों में काम करने वाले हैं। विजयवाड़ा-आन्ध्रप्रदेश की रहने वाली डाक्टर रजनीचन्द्र डिगेलो की बाकू में अपनी क्लीनिक है। युद्ध के हालात में भारतीय वहां रक्तदान केन्द्र चला रहे हैं। भारतीय पैसों से भी अजरबैजान की मदद कर रहे हैं।

अजरबैजान के मशहूर गायक रशीद बेहबुदोव अब ”मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा गाते थे तो हर हिन्दुस्तानी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता था। बेहबुदोव की फिल्म निर्माता निर्देशक और कलाकार हैं राजकपूर के साथ बहुत अच्छी दोस्ती थी 1952 में वह भारत आए थे। 1951 में जब राजकपूर की आवारा सोवियत संघ में रिलीज हुई तो उसकी धूम न केवल सोवियत रूस बल्कि पड़ोसी देश आर्मेनिया और अजरबैजान में भी गयी। रशीद 1952 में भारत आए थे। 1956 में राजकपूर उनके निमंत्रण पर बाकू गए, जहां उनका जबरदस्त स्वागत हुआ। इसकी एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई गई। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भी कुछ समय तक बाकू में रहे।

आवारा और राजकपूर आर्मनिया और अजरबैजान में काफी लोकप्रिय थे। बातचीत के लिए दो शब्द ही काफी थे, आवारा और राजकपूर, आर्मेनिया के लोग मुगलकाल से ही व्यापार और रोजगार के लिए भारत आते रहते हैं। बादशाह अकबर ने आर्मेनियाई लोगों को आगरा में बसाया था, बाद में सूरत, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और बंगाल के शहरों में फैले। कोलकाता में आज भी काफी संख्या में आर्मेनियाई लोग बचे हुए हैं।

रूस की मध्यस्थता में मास्को में 10 घंटे तक चली बातचीत के बाद दोनों देश युद्धविराम लागू करने के लिए राजी हो गए हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लैवराय ने कहा कि इसके बाद शांति बहाली करने को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ाई जाएगी।

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