अपनी बोली को बनाएं भाषा

कोस-कोस में बदले पानी, चार कोस पर वानी

 

आवश्यकताओं, भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बोली रही है। कहा जाता है, कोस-कोस में बदले पानी, चार कोस पर वानी। यानी कि हर चार कोस में बोली का अंदाज बदल जाता है। कभी यह सभी बोलियां संकेतों में हुआ करती थी। फिर इसके दस्तावेजीकरण की आवश्यकता महसूस हुई तो लिपियां विकसित होने लगीं। बोलियां विश्व में पुरातन सभ्यताओं की प्रेरक बनीं। धीरे-धीरे जो बोलियां विस्तृत रूप से बोली जाने लगीं, वह भाषा की कतार में जा खड़ी हो गईं। इन बोलियों का साहित्य भी उपलब्ध होने लगा। रोजमर्रा के जीवन का आधार बनीं। सर्जित ज्ञान का वाहन बनीं। रोजगार का कारण बनीं। मनोरंजन का साधन बनीं। यानी कि यह कहा जाए- जिसमें दम रहा, वह जीवित रही। जो बेदम वह विलुप्ति के कगार पर। जिस बोली के उत्तराधिकारियों ने उसे अपनाए रखा, उसको और समृद्ध करने का प्रयास किया वह बोली न केवल भाषा बनी, बल्कि जिंदा भाषा बन गई। विलुप्ति के कगार पर खड़ी बोलियों के उत्तराधिकारियों और सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि उन बोलियों को विस्तार दें, बोली फिर से जीवित हो जाएगी।

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जगदीश जोशी 

केंद्र सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए पांचवीं तक की पढ़ाई मातृभाषा में ही कराने की व्यवस्था की गई है। जबकि दो अन्य भाषाओं का ज्ञान इस दौरान दिया जाएगा। फिलहाल प्रबुद्ध वर्ग और सरकार में बैठे विशेषज्ञ यह महसूस करने लगे हैं कि भारतीय भाषाओं विशेषकर बोलियों को संरक्षित करना बहुत आवश्यक है। अब इसके नतीजे आने में कम से कम एक दशक का समय लगना चाहिए। देर से यह कदम उठाया गया मगर दुरुस्त कदम है। इससे मातृभाषा को बोलने या लिखने में हीन भावना नहीं आएगी। इनका संरक्षण और संवर्द्धन संभव हो सकेगा।

अगर भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो शायद विदेशी मानसिकता यहां अधिक हावी है। शहर में रह रहे परिवार अपने गांव को बोली घर पर बोलना नहीं चाहते। यहां तक देखा जा रहा है कि कांवेंट में पढ़ रहे बच्चों की अंग्रेजी का उच्चारण मिलावटी न हो जाए इस डर से लोग बच्चों से हिंदी तक में बात करना गंवारा नहीं करते। अपने गांव की बोली तो बहुत बड़ी बात है। हालांकि अभी कुछ प्रदेशों के निवासियों में यह बात देखने को मिलती है कि वह आपस में उसी प्रदेश की भाषा/बोली में वार्तालाप करना पसंद करते हैं। पता नहीं अधिसंख्य शहरियों को अपनी गांव की बोली पर गर्व क्यों नहीं होता। अपनी बोली बच्चों तक भी संप्रेक्षित नहीं करना चाहते। विज्ञान उनके भीतर घर कर गई हीन भावना को जिम्मेदार मानता है। उन्हें इस बात का अहसास कतई नहीं कि उनकी बोली बोल कर ही उनके पुरखे अपना पूरा जीवन गुजार गए। उन पुरखों के कारण ही आज वह शहर में आ पाए हैं। वह पुरखे नहीं होते, खुद को जीवित न रखते तो उनका शहरी जीवन कैसे अस्तित्व में आता। उन्हीं पुरखों की अभिव्यक्ति के शब्द-समूहों, जिसे हम बोली कह देते हैं, का सम्मान किया जाना चाहिए।

शब्द-समूह प्रत्येक चार कोस में अपना स्वभाव बदल देते हैं। इन शब्द-समूहों की आत्मा में वहां का परिवेश होता है, जलवायु का असर होता है। काम करने का अंदाज छुपा होता है। सबसे बड़ी बात, जिन परिस्थितियों में सदियों से वह लोग निवास कर रहे होते हैं, उसका प्रभाव पड़ा होता है। वहां की फसलों का स्वाद छुपा होता है, वहां की हवा का प्रवाह होता है। वहां के आकाश की तपिश होती है। वहां की माटी की गंध होती है। इन्हीं शब्द-समूहों में उनकी संस्कृति विकसित होती है, उनका लोक साहित्य जड़ जमाता है। उनके लोक संगीत की धुन गूंजती है। कुल मिला कर देखें तो लोक भाषा के शब्द-समूह उस इलाके का पूरा पता विस्तार से बता देते हैं। बिना विरासत के कोई ही नहीं सकता। अगर किसी के पास विरासत नहीं समझिए उसकी जड़ रही ही नहीं। ऐसे में अपने बच्चों को अपनी मातृ बोली सिखाना ही अपनी परंपरा को आगे बढ़ाने के समान है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही सरकारों, इतिहासकारों, संस्कृतिकर्मियों और भाषाविदों के स्तर से इस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए थे। तब हम भाखाड़ा नागल बांध, इस्पता कारखानों जैसे भारी-भरकम विकास को स्थापित करने तक ही सिमट कर रह गए। संस्कृति की ओर देखने का समय नहीं मिला। भौतिक विकास को ही सांस्कृतिक विकास मान बैठे। मगर ऐसा था नहीं।

अब भी समय है, भौतिक विकास, आध्यात्मिक विकास और सांस्कृतिक विकास सभी को समावेशी बनाकर चलें। विकास वह होना चाहिए जो अभी सामने दिखाई देता है और वह भी जिसे दिखने में बरसों लगते हैं। यही संतुलन भारत के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है, इसी में हमारी भाषाएं और बोलियां भी समाहित हैं। यही हमें समृद्ध बनाए रखेगी।

 

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