चीन के जितने पड़ोसी, उससे ज्यादा विवाद

प्रमोद जोशी- वरिष्ट पत्रकार

क्षेत्रफल के मामले में रूस और कनाडा के बाद चीन का ही स्थान है, लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा पड़ोसी देश चीन के ही हैं। भूमि से जुड़े 14 देश और समुद्री सीमा के किनारे छह। ज्यादातर देशों के साथ उसका किसी न किसी किस्म का सीमा विवाद है। चीन की महत्वाकांक्षाएं उसे हजारों साल पीछे तक ले जाती हैं। यानी कि उसके तमाम दावे सैकड़ों-हजारों साल पुराने हैं। दूसरी तरफ चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के दौरान हुई हिंसा के कारण तमाम पुराने दस्तावेज नष्ट हो चुके हैं। अब दावे पेश करने के लिए उल्टे-सीधे तरीके अपनाए जाते हैं।

माओ जे दुंग के निधन के बाद जब देंग श्याओ पिंग ने पदभार संभाला तो उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक उथल-पुथल के दौर के बाद केंद्रीय सत्ता बहुत कमजोर हो गई है। उन्होंने अपनी क्षमताओं को छिपाओ और सही समय का इंतजार करो की नीति को बढ़ावा दिया। यानी कि पहले हालात को अपने पक्ष में बनाओ। सन 2003 में हू जिनताओ देश के राष्ट्रपति बने। उन्होंने पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते बनाने की नीति पर चलने की इच्छा व्यक्त की। वह चीन के आर्थिक विकास का समय था और उन्हें लगता था कि विकास के लिए शांति स्थापना एक महत्वपूर्ण शर्त है।

तीन बड़े युद्ध

इसके पहले चीन सन 1962 में भारत के साथ, 1969 में सोवियत संघ के साथ और 1979 में वियतनाम के साथ युद्ध लड़ चुका था। ये सभी युद्ध सीमा विवादों के कारण हुए थे। हू जिनताओ की नीति का फायदा यह हुआ कि सन 2004 में चीन ने रूस के साथ सीमा विवाद को सुलझाने का समझौता किया। सन 2005 में चीन ने भारत के साथ सीमा विवादों को सुलझाने का समझौता किया। इसके बाद तिब्बत के रास्ते भारत के साथ व्यापार की संभावनाएं खुलीं। साथ ही चीन ने सिक्किम में भारत की संप्रभुता को स्वीकार किया। सन 2005 में ही हू जिनताओ ने वियतनाम की यात्रा की और दोनों देशों के बीच आर्थिक-राजनीतिक रिश्तों के द्वार खुले। उसी दौरान चीन ने उत्तरी कोरिया को नाभिकीय-परिसीमन के लिए छह-देशों की वार्ता के लिए मनाया।

उसी दौरान चीन ने आसियान देशों के साथ रिश्तों को बेहतर बनाया और क्षेत्रीय विकास के द्वार खुले। दूसरी तरफ चीन ने शंघाई सहयोग संगठन के मार्फत मध्य एशिया के देशों के साथ रिश्ते सुधारे। यह संगठन सन 1996 में ‘शंघाई फाइव’ के रूप में शुरू हुआ था। तब उद्देश्य था सोवियत संघ के विघटन के बाद नए आजाद देशों से लगी रूस और चीन की सीमाओं पर तनाव रोकना और इन सीमाओं का पुनर्निर्धारण। अब इसके आठ सदस्य हैं चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान।

इसके अलावा चार पर्यवेक्षक देश अफगानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया हैं। इसके सम्मेलनों में तुर्कमेनिस्तान को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया जाता है। छह डायलॉग पार्टनर आर्मेनिया, अजरबैजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्की हैं। इसके शिखर सम्मेलनों में इनके अलावा आसियान, संयुक्त राष्ट्र और सीआईएस के प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाता है। इस प्रकार यह एक महत्वपूर्ण सहयोग संगठन के रूप में विकसित हो रहा है।

जापान में बदलाव

हू जिनताओ के कार्यकाल में इतनी सकारात्मक गतिविधियों के विपरीत एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश जापान के साथ रिश्ते बिगड़े। इसकी शुरुआत जापान में प्रकाशित एक पाठ्य पुस्तक से हुई, जिसमें अतीत में जापान ने चीन में जो अत्याचार किए थे, उनके विवरणों को दबा दिया गया था। जापान ने भी अपने प्राचीन वैभव को याद करना शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत सन 2002 में हुई जब जापानी प्रधानमंत्री जुनिचीरो कोइजुमी ने शहीदों की याद में बने विवादास्पद स्मारक यासुकुनी का दौरा किया।

इस दौरे का चीन और दक्षिण कोरिया दोनों देशों ने विरोध किया। यह स्मारक युद्ध में मरे 25 लाख जापानियों की यादगार है, जिनमें बहुत से दोष सिद्ध युद्ध अपराधी भी शामिल थे। कोइजुमी 1978 के बाद दौरा करने वाले तीसरे प्रधानमंत्री थे। कोइजुमी अपनी विदेश और रक्षा नीतियों के कारण कट्टरपंथियों के बीच लोकप्रिय थे।

उसी दौरान जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट प्राप्त करने के प्रयास भी शुरू कर दिए। ऐसा ही प्रयास पहले से भारत भी करता रहा है। भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करने के लिए जी-4 नाम से एक अनौपचारिक समूह भी बनाया है, जिसका कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से आज दुनिया में गुणात्मक बदलाव आ चुका है। इन देशों की पहल के विरोध में इटली की पहल पर पाकिस्तान, मैक्सिको और मिस्र का एक और ग्रुप खड़ा हो गया, जिसे चीन का परोक्ष समर्थन प्राप्त हुआ। हाल के वर्षों में अपनी सांविधानिक व्यवस्थाओं के आत्मारोपित ‘युद्ध-विरोध’ की नई व्याख्या करते हुए जापान सरकार ने अपनी रक्षा नीति को आक्रामक बना लिया है।

मोटे तौर पर इन देशों के साथ चीन के अनसुलझे विवाद हैं:

भारत

चीन ने जम्मू-कश्मीर के अक्साईचिन क्षेत्र की 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है। इसके अलावा पाकिस्तान ने 1963 में एक समझौते के तहत अपने कब्जे वाले कश्मीर की 5,180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन को दान में दे रखी है। इसके अलावा भारत के अरुणाचल प्रदेश (90,000 वर्ग किलोमीटर) पर चीन का दावा है। वह उसे दक्षिण तिब्बत कहता है। समझौता वार्ताओं में चीन ने कहा है कि कम से कम तवांग का क्षेत्र उसे मिलना चाहिए। उसने लद्दाख की जमीन पर भी अपना दावा किया है।

भूटान

चीन के हिसाब से भूटान के चेरकिपगोम्पा, धो, डुंगमार, गेसुर, गेजोन, इत्सेगोम्पा, खोचर, न्यानरी, रिंगुंग, सन्मार, तारचेन और जुथुल्फुक क्षेत्र तिब्बत में आते हैं। इसके अलावा कुलाकांगड़ी और इस चोटी के पश्चिम का पहाड़ी क्षेत्र और भूटान का पश्चिमी हा जिला भी उसका है।

नेपाल

सन 1782-1792 के बीच हुए चीन-नेपाल युद्ध के आधार पर चीन का नेपाल के कुछ क्षेत्रों पर दावा है। चीन का कहना है कि यह क्षेत्र तिब्बत का है, इसलिए चीन का है। पिछले दिनों मीडिया में नेपाल सरकार के कृषि मंत्रालय के सर्वे डिपार्टमेंट की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया था कि चीन ने 10 जगहों पर नेपाल की जमीन पर कब्जा कर रखा है। यही नहीं, 33 हेक्टेयर नेपाली जमीन पर नदियों की धारा बदलकर प्राकृतिक सीमा बना दी गई और उसे हथिया लिया गया। नेपाल के रुई गांव पर चीन ने कब्जा कर लिया है और अतिक्रमण को वैध बनाने के लिए गांव के सीमा स्तंभों को हटा दिया है। इस पर नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि जिन खंभों के गायब होने की बात कही जा रही है, वे दरअसल वहां थे ही नहीं। मंत्रालय ने कहा है कि खबरें कृषि मंत्रालय की उस कथित रिपोर्ट पर आधारित हैं जिसका मंत्रालय पहले ही खंडन कर चुका है। सरकार ने नदियों का रास्ता मोडक़र जमीन हथियाने को लेकर कुछ नहीं कहा।

मंगोलिया

युआन वंश (1271-1368) के ऐतिहासिक आधार पर चीन का मंगोलिया की जमीन पर दावा है। सच यह है कि चंगेज खान के दौर में पूरा चीन मंगोलिया के अधीन था।

रूस

रूस के साथ सीमा विवाद हल करने का समझौता होने के बावजूद करीब 1,60,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर चीन का दावा अभी बरकरार है।

कजाकिस्तान

कुछ साल पहले ही चीन के पक्ष में समझौता होने के बावजूद चीन अभी कजाकिस्तान को लेकर संतुष्ट नहीं है।

ताजिकिस्तान

चिंग वंश (1644-1912) के ऐतिहासिक आधार पर ताजिक क्षेत्र पर भी चीनी दावा है।

अफगानिस्तान

सन 1963 में हुई एक द्विपक्षीय संधि के बावजूद अफगानिस्तान के बदकशां प्रांत पर चीन का दावा है। अफगानिस्तान की जमीन आज भी चीन के कब्जे में है।

जापान

पूर्वी चीन सागर के कुछ हिस्सों को लेकर चीन का जापान के साथ विवाद है। खासतौर से सेंकाकू और रयूक्यू द्वीप समूहों को लेकर विवाद हैं। चीन का कहना है कि रयूक्यू का राज्य एक जमाने में चीन के अधीन था। अलबत्ता रयूक्यू के राजा ने 1874 में चीन की अधीनता को नामंजूर कर दिया था। सेंकाकू और रयूक्यू दोनों पर जापान का भी दावा है।  

वियतनाम

चीन मानता है कि मिंग वंश (1368-1644) के साम्राज्य में वियतनाम हमारे अधीन था। दक्षिण चीन सागर में एक बड़ा क्षेत्र मूंगे की चट्टानों का है, जो कहीं उथले पानी के नीचे हैं और कहीं पानी के ऊपर रेतीली चट्टानें हैं। इसी क्षेत्र में मैकल्सफील्ड बैंक (चीनी झोंगशा), पारासेल द्वीप और स्प्राटली द्वीप हैं, जिन्हें लेकर विवाद है। पारासेल द्वीप को वियतनामी भाषा में शीशा कहते हैं। इसके स्वामित्व को लेकर चीन, ताइवान और वियतनाम के दावे हैं।

ताइवान

यों तो पूरे ताइवान पर ही चीन का दावा है, क्योंकि वह चीन ही है, पर मैकल्सफील्ड बैंक, पारासेल द्वीप, स्कारबोरो शोल, दक्षिण चीन सागर के कुछ क्षेत्र और स्प्राटली द्वीप के स्वामित्व को लेकर विवाद है।

उत्तरी कोरिया

चीन और उत्तरी कोरिया की जमीनी सीमाएं मिलती हैं। चीन का बेकदू पर्वत और जियानदाओ पर दावा है। यह दावा युआन वंश (1271-1368) के काल पर आधारित है।

दक्षिण कोरिया

पूर्वी चीन सागर के कुछ हिस्सों पर विवाद है। चीन ने कई बार दावा किया है कि ऐतिहासिक आधार पर समूचा दक्षिण कोरिया उसका है, क्योंकि युआन वंश के काल (1271-1368) में वह उसके अधीन था।

फिलीपींस

दक्षिण चीन सागर के कुछ क्षेत्र, स्कारबोरो शोल (छिछले जल-क्षेत्र) और स्प्राटली द्वीप पर फिलीपींस का दावा भी है।

ब्रूनेई

स्प्राटली द्वीप समूह के करीब 750 छोटे-छोटे उप द्वीपों, चट्टानों, पहाडिय़ों वगैरह को लेकर विवाद हैं। इनमें से कुछ पर ब्रूनेई का दावा है। इनमें से कुछ पर चीनी, ताइवानी, वियतनामी, फिलीपीनी, मलेशियाई सेनाओं का कब्जा है।

सिंगापुर

दक्षिण चीन सागर के जल-क्षेत्र पर सिंगापुर का दावा भी है।

लाओस

चीन का ऐतिहासिक (युआन वंश) आधार पर लाओस के काफी बड़े इलाके पर दावा है।

कम्बोडिया

मिंग वंश (1368-1644) के ऐतिहासिक आधार पर कम्बोडिया के कुछ क्षेत्रों पर भी चीन का दावा है। कम्बोडिया और लाओस चीन के समर्थक देश हैं।

इंडोनेशिया

दक्षिण चीन सागर के जल-क्षेत्र को लेकर विवाद में इंडोनेशिया भी शामिल है।

मलेशिया

दक्षिण चीन सागर और स्प्राटली द्वीप पर मलेशिया का भी दावा है।

शी जिनपिग का उदय

सन 2012 में चीन में नेतृत्व का बदलाव हुआ। युवा शी जिनपिंग राष्ट्रपति बने। वे अब चीनी महत्वाकांक्षाओं को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं। उनके आगमन के बाद चीन ने अपनी रक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण का काम शुरू किया है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दक्षिण चीन सागर क्षेत्र पर पड़ा है। इस सागर की जल सीमा को लेकर चीन के साथ ब्रूनेई, ताइवान, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और वियतनाम का विवाद है। सन 2013 से चीन ने स्प्राटली और पारासेल द्वीपों के आसपास कृत्रिम द्वीपों का निर्माण करना शुरू किया है, जिनका इस्तेमाल सामरिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।

चीन इस सागर के करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र पर दावा करता है, जबकि अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने सागर पर मुक्त विचरण के अधिकार का दावा करते हुए यहां अपनी नौसेनाओं को तैनात किया है। जुलाई 2016 में संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून न्यायाधिकरण ने फिलीपींस और चीन के एक विवाद के मामले में चीन के दावों को अस्वीकार किया, पर द्वीपों के स्वामित्व और जल सीमा को लेकर कोई फैसला नहीं किया। चीन और ताइवान ने न्यायाधिकरण के फैसले को स्वीकार नहीं किया है और वे चाहते हैं कि इस विवाद का हल आपसी बातचीत से हो।

इस क्षेत्र में एक नहीं, अनेक विवाद हैं। एक ‘इलेवन डैश लाइन’ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समुद्री सीमा को लेकर चीन ने खींची थी, जो अब ‘नाइन  डैश लाइन’ है। चीन ने नौ डैश की लाइन से अपने क्षेत्र को नक्शे में बताया है। विवाद की सबसे बड़ी वजह है सागर तल में मौजूद तेल और गैस के भंडार। वियतनाम ने अपने सागर तट पर तेल और गैस की खोज का काम भारत की कंपनी गेल को सौंपा है। इसके कारण भारत की दिलचस्पी इस क्षेत्र में है। यों भी भारत का 50 से 55 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है, क्योंकि हमारे सबसे बड़े व्यापार साझीदार आसियान के देश है। तेल और गैस के अलावा यह क्षेत्र मछली व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण है।

चायना स्टडी ग्रुप

चीन के साथ बातचीत के तमाम पहलुओं पर दिल्ली में भारत सरकार का हाई-पावर चायना स्टडी ग्रुप लगातार स्थिति की समीक्षा करता है। इस समूह में उच्च पदस्थ प्रशासनिक, सैनिक और इंटेलिजेंस एजेंसियों के अधिकारी शामिल हैं। यह समूह चीन से सम्बद्ध नीतियों पर सलाह देने का काम करता है। समूह की नवीनतम बैठकों में सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे, और 14 कोर के कमांडर ले. जनरल हरिंदर सिंह भी शामिल हुए, जो चीन के साथ कोर कमांडर स्तर की वार्ताओं में शामिल होते रहे हैं।

चायना स्टडी ग्रुप का गठन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर नवंबर 1975 में हुआ था। शुरू में इसमें विदेश, रक्षा और गृह सचिव शामिल होते थे। इसके पहले प्रमुख केआर नारायणन थे, जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने। उस समय इसका काम भारत-चीन सीमा की गतिविधियों पर नजर रखने का था। सन 1976 में नारायणन चीन में राजदूत बनकर गए, तब विदेश सचिव इस समूह के अध्यक्ष बनाए गए और सह सेना प्रमुख को इसमें सदस्य के रूप में शामिल किया गया।

सन 2003 में चीन के साथ सीमा से जुड़े सवालों पर बातचीत के लिए विशेष प्रतिनिधियों की व्यवस्था होने के बाद इस समूह का दर्जा और बढ़ाया गया। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र के अधीन कर दिया गया। इसमें कुछ और प्रशासनिक अधिकारी शामिल किए गए। इसके बाद के वर्षों में इसमें इंटेलिजेंस एजेंसियों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया। अब इसमें तीनों सेनाओं के सह प्रमुख और इंटेलिजेंस ब्यूरो तथा रॉ के प्रमुख भी शामिल होते हैं। यों तो समूह की बैठकें होती रहती हैं, पर जरूरत होने पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इसकी बैठक बुलाते हैं। इसमें विशेष आमंत्रित सदस्य भी बुलाए जा सकते हैं। चायना स्टडी ग्रुप ने सीमा पर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण 73 सडक़ों को रेखांकित किया है। इस ग्रुप के विमर्श गोपनीयता के दायरे में आते हैं, इसलिए उनका प्रचार ज्यादा नहीं होता। अलबत्ता माना जा रहा है कि चीनी मोबाइल एप्स पर इसी ग्रुप की सलाह से पाबंदी लगाई गई है। इस पाबंदी के पीछे सबसे बड़ा कारण है चीन सरकार की खुफिया हरकतें।

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