बिहार विधानसभा चुनाव : क्या टूटेगा राजनीति-अपराध का गठजोड़

Mukund Mishra

मुकुंद मिश्र

बिहार में विधानसभा चुनाव पूरे शबाब पर है। सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं। न सिर्फ इसलिए कि उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव में देश की राजनीति का अक्स झलकता है बल्कि इसलिए भी कि यह पहला मौका है जब चुनाव में अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर नकेल कस संसद व विधानसभा में अपराधियों की बढ़ती संख्या को रोकने की पहल की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत बिहार विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव प्रक्रिया से दूर करने संबंधी उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिए संशोधित हलफनामे का प्रारूप जारी किया है।

संशोधित प्रारूप में सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के साथ दो नये फॉर्म भरकर देने होंगे। इसमें उम्मीदवार को बताना होगा कि उसके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की विभिन्न मीडिया माध्यमों से उसने सार्वजनिक जानकारी दे दी है। मतदाताओं को उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी देने की अनिवार्य बाध्यता के दायरे में सबंधित राजनीतिक दल को भी शामिल किया गया है।

आयोग द्वारा जारी संशोधित प्रारूप के माध्यम से उम्मीदवार को इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी होगी कि उसके खिलाफ कितने आपराधिक मामले लंबित हैं और किन मामलों में उसे दोषी ठहराया गया है। हालांकि बिहार की राजनीति में धन और बाहुबल के पांच दशक पुराने गठजोड़ को तोड़ने की यह कोशिश कितनी असर डालती है यह कहना मुश्किल है।

बिहार और उत्तर प्रदेश के सियासी नतीजों से ही देश की सरकार और प्रधानमंत्री पद तक का फैसला होता आया है। कभी जेपी, लोहिया, जगजीवन राम जैसे नेताओं के इन राज्यों में राजनीतिक शुचिता को तार—तार करने में सियासी दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बिहार में धन के साथ बल का इस कदर घालमेल हुआ कि यहां का सियासी परिदृश्य हमेशा रक्तरंजित नजर आया। बिहार की राजनीति में धन और बाहुबल का दबदबा भी 80 के दशक के बाद से बढ़ा। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिज्ञों ने पहले अपराधियों का भरपूर उपयोग किया।

दरअसल, धनबलियों की सियासी सौंध में पहुंचने से उनके लिए काम करने वाले बाहुबलियों का भी हौसला बढ़ा और उनके मन में भी माननीय बनने की इच्छा ने जोर मारा तो फिर लोकसभा व विधानसभा में बड़ी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की उपस्थिति दर्ज होने लगी। 80 के दशक में बिहार की राजनीति में वीरेंद्र सिंह महोबिया व काली पांडेय जैसे बाहुबलियों का प्रवेश हुआ जो 90 के दशक के अंत तक चरम पर था। इनमें प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, पप्पू यादव, मोहम्मद शहाबुद्दीन, रामा सिंह व आनंद मोहन तो लोकसभा भी पहुंचे।

बिहार की राजनीति में लालू युग का अंत होते ही बिहार की राजनीति में बदलाव जरूर आया। लेकिन, राज्य की सियासत के हालात पूरी तरह से नहीं बदले हैं। राज्य का शायद ही कोई विधानसभा क्षेत्र ऐसा होगा जहां एक न एक दबंग चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होगा। राजनीतिक दल भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के इन स्थानीय दबंगों या उनके रिश्तेदारों को अपना उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं करते हैं।

Bihar Elections

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में 3058 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, जिनमें 986 दागी थे। वहीं 2015 के चुनाव में 3450 प्रत्याशियों में से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की संख्या 1038 यानी 30 प्रतिशत थी। इनमें से 796 यानी 23 प्रतिशत के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने, अपहरण व महिला उत्पीड़न जैसे गंभीर मामले दर्ज थे। 2015 के चुनाव में जदयू ने 41, राजद ने 29, भाजपा ने 39 और कांग्रेस ने 41 प्रतिशत दागियों को टिकट दिया।

यही वजह है कि 243 सदस्यीय विधानसभा के 138 अर्थात 57 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। अगर दलगत स्थिति पर गौर करें तो राजद के 81 विधायकों में 46, जदयू के 71 में 37, भाजपा के 53 में 34, कांग्रेस के 27 में 16 व सीपीआई (एम) के तीनों तथा रालोसपा और लोजपा के एक-एक विधायक के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। नतीजतन 2010 में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे 57 प्रतिशत तो 2015 में विजयी 58 फीसदी माननीय नेताओं पर केस चल रहा था। 2010 में 33 प्रतिशत तो 2015 में 40 फीसद विधायक गंभीर आपराधिक मामले में आरोपित थे।

1993 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट तथा 2002 में बने राष्ट्रीय आयोग एनसीआरडब्ल्यूएल ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश की राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की संख्या बढ़ रही है, जिसे नियंत्रित करना नितांत आवश्यक है। चुनाव सुधार के लिए किए गए प्रयासों की कड़ी में 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि संसद, राज्य की विधानसभाओं या नगर निगमों के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी शैक्षणिक, वित्तीय और आपराधिक पृष्ठभूमि, यदि कुछ हो तो उसकी घोषणा करनी होगी।

जबकि 2005 के एक फैसले में सुप्रीम अदालत ने कहा कि सांसद या विधायक को अदालत द्वारा दोषी पाए जाने पर चुनाव लड़ने के अयोग्य माना जाएगा और उसे दो साल से कम की सजा नहीं दी जाएगी। वहीं 2017 के एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिज्ञों पर चल रहे आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना का आदेश दिया था।

फरवरी, 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी दलों को यह बताना होगा कि आखिर किस वजह से पार्टी ने दागी नेता को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहीं उम्मीदवारों को अपने संपूर्ण आपराधिक इतिहास की जानकारी पार्टी प्रत्याशी घोषित होने के 48 घंटे के भीतर स्थानीय व राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करवानी होगी तथा 72 घंटे के अंदर सभी जानकारी चुनाव आयोग में जमा करनी होगी। इन निर्देशों के तहत पहली बार बिहार में ही विधानसभा चुनाव होने जा रहा है।

लेकिन, इन निर्देशों का भी कोई असर दिखेगा, इसकी उम्मीद कम ही है। क्योंकि इस बार भी बिहार विधानसभा चुनावी मैदान में धन और बाहुबल का बोलबाला दिख रहा है। वैसे देखा जाए तो किसी भी लोकतंत्र की तरह भारतीय लोकतंत्र की भी असली ताकत तो जनता है। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और स्वच्छ बनाने के कोशिश की है। लेकिन, अब असल बदलाव की जिम्मेदारी जिनके कंधे पर है तो वे हैं राजनीतिक दल। उन्हें अब टिकट वितरण में पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होगी। उन्हें भी कुछ मानक तय करने होंगे ताकि जिस परिकल्पना के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस देश में अपनाया गया, वह साकार हो सके।

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