नवआयामों और भावों को अभिव्यक्ति देते नवगीत

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ओम प्रकाश तिवारी

गीत मानव जीवन की अभिव्यक्ति है। गीत का आधार सृष्टि है। मनुष्य का जीवन भी स्वयं में एक श्रृष्टि है जो तमाम स्थितियों-परिस्थितियों, सुख-दुःख, वेदना-संवेदना और अन्य अनेक स्थितियों को जन्म देती रहती है। मनुष्य को विपदा के समय भी ख़ुशी के क्षण खोजना पड़ता है, जिसके लिए साधन की आवश्यकता पड़ती है। गीत वही साधन है। भारतीय परिवेश में गीत की उपस्थिति उसके रीतियों–रिवाजों से जुडी हैं। समाज में पर्वों से साधारण व्यवहारों तक गीतगंगा प्रवाहमान रही है।  

हिंदी कविता की ही तरह गीत विधा को भी वादों और विवादों में कसने का प्रयत्न बराबर हुआ है। कभी इसे गीत तो कभी नवगीत के नाम से परिभाषित किया गया। शम्भूनाथ सिंह ने लिखा है, ‘नवगीत एक आपेक्षिक शब्द है। नवगीत की नवीनता युग सापेक्ष होती है। किसी भी युग में नवगीत की रचना हो सकती है। गीत-रचना की परम्परा-पद्धति और भावबोध से इतर नवीन पद्धति और विचारों के नवआयामों व भाव-सारणियों को अभिव्यक्त करने वाले गीत जब भी और जिस युग में भी लिखे जायेंगे, नवगीत कहलायेंगे। ‘  

काव्यशास्त्रियों के अनुसार नवगीत में एक मुखड़ा और दो या तीन अंतरे होने चाहिये। अंतरे की अंतिम पंक्ति मुखड़े की पंक्ति के समान (तुकांत) हो, जिससे अंतरे के बाद मुखड़े की पंक्ति को दोहराया जा सके। नवगीत में छंद से संबंधित कोई विशेष नियम नहीं है, मगर पंक्तियों में मात्राएँ संतुलित रहे, जिससे गेयता और लय में अवरोध न उत्पन्न हो।
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नवगीत हिन्दी काव्य-धारा की एक नवीन विधा है। इसकी प्रेरणा लोकगीतों की समृद्ध भारतीय परम्परा से है। हिन्दी काव्य के इतिहास में ‘नयी कविता’ के समानांतर रचे जा रहे नए गीतों की वैधानिक एवं भाषिक संरचना के साथ ही उनके नए तेवर को पारंपरिक गीतों से अलग हुए, उन्हें हिन्दी नवगीत का नाम दिया गया। नवगीत में नयी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होता है।
हिंदी में नवगीत रचना का प्रारंभ छायावाद के दौर से होता है। निराला, पंत, महादेवी और प्रसाद इस नवीन परम्परा के उद्घाटक माने जाते हैं। सबसे पहले महाप्राण निराला ने गीतों के शिल्पिक विधान का पुनःसंस्करण किया, जिन्हे नवगीत कहा गया। यह वही समय था, जब रचनाकारों का छायावादी प्रवृत्तियों से मोहभंग हो रहा था और प्रगतिशील विचारधारा गति पकड़ रही थी। जन-संवेदनाओं से जुड़ने की भूख और ललक ने उस समय के गीतों एवं नवगीतों को नया रूप दिया।

नवगीतकारों ने अपनी स्मृतियों में खोये हुए गांव को तलाशने की कोशिश की है। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि अधिकांश नवगीतकार ग्रामवासी रहे हैं। ग्रामीण प्रकृति और जन – जीवन से उसका सम्बन्ध भोक्ता का रहा है।

यहां पर प्रस्तुत है महाप्राण निराला का एक नवगीत –

मानव जहां बैल घोड़ा है,  कैसा तन-मन का जोड़ा है।
किस साधन का स्वांग रचा यह,  किस बाधा की बनी त्वचा यह।
देख रहा है विज्ञ आधुनिक, वन्य भाव का यह कोड़ा है।    
इस पर से विश्वास उठ गया, विद्या से जब मैल छुट गया।
पक–पक कर ऐसा फूटा है, जैसे सावन का फोड़ा है।।

नवगीतकार शंभुनाथ सिंह अपने गांव, बाग – बगीचे और प्रकृति को को भूल नहीं पाए। यहां पर उनका एक नवगीत प्रस्तुत है –

‘भली लगें यह छानी-छपरी, यह पीपल की छांव।
गंधवती धरती मां जैसी, पिता सरीखा गांव  
ये पुरखो के बाग – बगीचे, मंदिर वापी – कूप,
कभी नहीं अंट पाया मेरे मन में इनका रूप।

इसी तरह अकेलेपन के अहसास का चित्रण नवगीतकारों की अनेक रचनाओं में पाया गया है। माहेश्वर तिवारी ने अपने नवगीत में अकेलेपन का चित्रण इस प्रकार किया है –

तना जले- सा अकेलापन
कहा तक झेले अकेला मन।
किसी ठहरी झील – सा हिलता नहीं तिनका
साथ हम कब तक निभायें अधमरे दिन का।

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शहर में बसने के बाद भी नवगीतकारों का मन गाँव में रमता है। गांव कि अपनाईयत आत्मीयता खोने लगी है। पारिवारिक विघटन होने लगा है। इससे दुखी नवगीतकार उमाकान्त मालवीय का नवगीत देखिये –

निगल गये पनघट को सड़कों के नल
बेबस बेपर्द देह दृष्टि उठी जल।
आगन दालनों को तरस गये घर
खोली दरखोली से घर गये उधर।    

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