किस दिशा में जा रहा है समाज?

om prakash tiwari
ओम प्रकाश तिवारी

आजकल बड़े-बुजुर्ग पूछते हैं कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? क्या भौतिक विकास ही समाज का अभीष्ट है? इसका उत्तर कठिन है। असलियत में इस भौतिकवादी युग में बिजली, सड़क, पानी और आर्थिक विकास के आकड़ों से किसी देश या समाज के विकास का पैमाना तय किया जाता है, लेकिन यह समाज के विकास का पैमाना नहीं हो सकता।
भौतिक विकास से सुख-सुविधाएं तो प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन इससे व्यक्ति और समाज का नैतिक विकास नहीं हो सकता है, संस्कारों का विकास नहीं हो सकता।

अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति नहीं विकसित हो सकती है। ऐसा समाज दिशाहीन, दृष्टिहीन और दायित्वविहीन ही होगा।
आज हमें छोटी-छोटी बच्चियों, छात्राओं और महिलाओं के साथ अकसर छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, जिंदा जला देने जैसी घटनाएँ देखने, सुनने और पढ़ने को मिल रही हैं। हाल ही में हाथरस में एक लड़की को ज़िंदा जला दिया गया। बलरामपुर में एक बच्ची के साथ घिनौना कृत्य हुआ। हरियाणा में एक छात्र को दिनदहाड़े गोली मार दी गई।

बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी दुराचार की घटनाएं होती रहती हैं। इस तरह की घिनौनी घटनाएं पुरे देश में नित्य हो रही हैं। हमारे समाज में ऐसी वीभत्स घटनाएं क्यों हो रही हैं? इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसी घटनाएं सभ्य समाज को विद्रूप करती है।
गौर कीजिये इस डिजिटल युग में भी हमारे समाज में लड़कियों को अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार नहीं है। अपनी देह पर भी उनका अधिकार नहीं है। समाज के मौजूदा माहौल को देखते हुए लड़कियाँ या महिलायें घर से निकलने से पहले सौ बार सोचती हैं। वहीं पुरुष वर्ग महिलाओं की देह तक पर अपना अधिकार जताता है। अगर कोई लड़की इसका प्रतिरोध करती है तो उसकी ह्त्या तक कर दी जाती है।

आखिर में हम कैसे समाज में जी रहे हैं? इसका प्रतिरोध क्यों नहीं हो रहा है? इसकी मानसिकता से दुर्गंध आ रही है, जिसका ज़हर धीरे-धीरे मानवता को दानवता में बदल कर रहा है।
आज परिवार नाम की महत्वपूर्ण संस्था ख़त्म हो चुकी है। हम एकांगी हो गए हैं। हमारे बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी का दुलार नहीं मिलता। नौनिहालों को किस्से-कहानी सुनाने वाला कोई नहीं है। उन्हें माता-पिता भी पूरा समय नहीं दे पाते। इसलिए बच्चे इंटरनेट पर ही व्यस्त रहते हैं। अपना आदर्श वे खुद ही चुन लेते हैं। उसी के मुताबिक़ वे व्यवहार करते हैं।

उनके व्यवहार में अपनाइयत का अभाव होता है। यही बच्चा बड़ा होकर कहने को तो देश का जिम्मेदार नागरिक बनता है। ऐसे नागरिक केवल अपने स्वार्थ, अपने हित के लिए ही बोलते हैं। दूसरे के साथ हुई घटना का उनके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं होता। दूसरे के दुख को महसूस करना नहीं चाहते हैं। शायद, इसीलिए आज हमारी बेटियां घर से बाहर निकलने के लिए डरती हैं। उन्हें मालूम है कि यदि कोई घटना घटती है तो समाज का कोई व्यक्ति उस पर नहीं बोलेगा।
आखिर एक सभ्य समाज में किसी को यह अधिकार किसने दे दिया कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे पर अत्याचार कर सकता है? कोई पुरुष किसी महिला को अपने अनुरूप जीने पर कैसे विवश कर सकता है?
शायद हमारा समाज असभ्य हो चुका है। आज समाज में जो सर्वाधिक शक्तिशाली है, वही पूज्य है। उसके व्यवहार ही नई पीढ़ी के लिए आदर्श हैं। किसी भी इंसान को किसी दूसरे इंसान की तकलीफ़, दुख दर्द का एहसास नहीं होता। हमारे भौतिक आग्रहों के चलते समाज कमजोर हुआ। समाज के कमजोर होने से हमारी शिक्षा, व्यवहार, कानून, न्याय, सब इतना कमजोर हो गया है कि हम अपने आस-पास की परिस्थितियों को समझ ही नहीं पाते, या उन परिस्थितियों को समझना नहीं चाहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति या समाज के सुधार की बात करना, गंगा को पृथ्वी पर लाने जैसा है। इसके बावजूद हमें निराश होकर बैठ नहीं जाना चाहिए।


हमें अपने देश-समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की शुरुवात समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार से करनी होगी। यदि परिवार आदर्शोन्मुखी होगा तो समाज भी सभ्य होगा। इसके साथ ही वर्तमान शिक्षा प्रणाली को भी व्यवहारिक और प्रकृति पार्क बनाने की आवश्यकता है। हमें अपने बच्चों को समय देना होगा। अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति विकसित करनी होगी। बड़ों को भी व्यवहार और मानसिकता बदलना आवश्यक है। शिक्षा, संस्कार, स्वतंत्रता, समानता, बधुत्व और न्याय को व्यवहार में लाना होगा। इसके बाद ही हम आदर्श समाज की परिकल्पना कर सकते हैं। l

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