वन-टू-वन : विश्‍ववार्ता से सीधी बातचीत में बोले पश्चिम बंगाल के राज्‍यपाल, कहा- मैं चुप नहीं रहूंगा

राज्य की कई समस्याओं को लेकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच जबरदस्त तनातनी की स्थिति बनी हुई है। पिछले एक साल से राज्य सरकार के कामकाज पर लगातार नजर रखने और उसकी गलतियों के लिए टोकते रहने के कारण राज्यपाल इनदिनों तृणमूल कांग्रेस की नजरों में विलेन बने हुए हैं, लेकिन दूसरी तरफ यही राज्यपाल, राज्य के विपक्षी दलों के लिए संकटमोचक बनकर उभरे हैं और जब कभी भी संकट की स्थिति आती है विपक्षी दलों के नेता राजभवन का ही रुख करते नजर आते हैं।

पिछले कुछ महीनों से पश्चिम बंगाल की कानून और व्यवस्था की स्थिति को लेकर राज्यपाल काफी चिंतित हैं। वह राज्य सरकार पर हालात ठीक करने के लिए लगातार दबाव बनाते नजर आ रहे हैं। विश्ववार्ता के बंगाल ब्यूरो प्रमुख तारकेश्वर मिश्र ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ से राज्य की वर्तमान स्थिति को लेकर बातचीत की। इस बातचीत के दौरान राज्यपाल ने स्पष्ट कर दिया कि अगर अगले कुछ महीनों में राज्य की कानून और व्यवस्था की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो वह संविधान द्वारा प्रदत अपने अधिकारों का उपयोग करने से भी नहीं हिचकेंगे। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

प्रश्न- सुना है पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति को लेकर आपने मुख्यमंत्री को तलब किया है?

उत्तर- आपने सही सुना है। मैंने राज्य के मुख्य सचिव से राज्य की कानून और व्यवस्था की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन उनके जवाब से संतुष्ट नहीं होने के कारण मैंने मुख्यमंत्री को इसी विषय पर बात करने के लिए बुलाया है।

प्रश्न- मुख्यमंत्री को तलब करने का मतलब तो यही होता है कि काफी गंभीर मामला है?

उत्तर- विषय राज्य की कानून और व्यवस्था की दयनीय हालत से ही जुड़ा है। इस गंभीर समस्या पर राज्य सरकार का टालमटोल करने का प्रयास और भी गंभीर है। ऐसे में संवैधानिक पद पर रहते हुए मेरा चुप हो जाना, राज्य की नौ करोड़ जनता के प्रति अन्याय होगा। इस अन्याय का अपयश मैं नहीं ले सकता। राज्य की जनता के हित में जो भी होगा, वो मुझे करना ही पड़ेगा।

प्रश्न- आपको क्यों ऐसा लग रहा है कि राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति गंभीर हालात में पहुंच चुकी है?

उत्तर- इसका उत्तर हाल की कुछ घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है। राज्य में प्राय: हर रोज राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। हिंसा की घटनाओं में अवैध हथियार और गोली-बारूद का प्रयोग हो रहा है। लग रहा है कि राज्य के हर जिले में और हर पंचायत में अवैध हथियारों के भंडार बने हुए हैं। पुलिस क्या कर रही है? ये हथियार कहां से आ रहे हैं?

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने कई आतंकियों को गिरफ्तार किया है। ये आतंकी अब तक कहां और कितने लोगों को नियुक्त कर चुके हैं? कितने हथियारों को कहां पहुंचा चुके हैं? क्या राज्य की अपनी ख़ुफिया पुलिस केवल विरोधी दलों के खिलाफ उपयोग के लिए रखी गयी है? ये मैं नहीं कह रहा हूं। मुझे कांग्रेस, वामदलों और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो लिखित तौर पर ज्ञापन दिया है और विभिन्न समाचार माध्यमों से जो कुछ आ रहा है, उनके आधार पर ही मैं ये आपको बता रहा हूं।

प्रश्न- तो क्या आप मानते हैं कि ममता बनर्जी की सरकार अपनी पुलिस का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है?

उत्तर- यह सिर्फ मेरे मानने की बात नहीं है। राज्य सरकार के कार्यों से ये बार-बार प्रमाणित हो रहा है। पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये से केवल विरोधी दल के लोग ही नहीं, राज्य की आम जनता भी बुरी तरह से त्रस्त हो चुकी है। राज्य में पिछले कई महीने से तृणमूल कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भीड़ भरे आयोजन कर रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री हजारों की भीड़ लेकर सडक़ों पर रैली करती हैं, लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को न केवल राहत सामग्री बांटने से रोका गया है, बल्कि कोविड का हवाला देते हुए उनके खिलाफ मामले भी दर्ज किये गये हैं। मेरे पास ऐसी हजारों शिकायतें आ चुकी हैं, जिनमें बताया गया है कि पुलिस राजनीतिक रंग देखकर काम कर रही है। सबसे दुखद बात यह है कि पुलिस और प्रशासन के केवल कुछ अधिकारियों के कारण आम लोगों का प्रशासन की निष्पक्षता पर से भरोसा उठ रहा है। प्रशासन को संविधान और कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए, न कि सत्ता में बैठे लोगों के प्रति। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि जनता के सेवक राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह काम नहीं करें। यह मेरा संवैधानिक कर्तव्य है।

प्रश्न- भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है। अकेले भाजपा के लोगों के खिलाफ 30 हजार झूठे मामले दर्ज किये जाने का आरोप है। आप क्या कहेंगे?

उत्तर- मैंने पहले ही कहा कि राज्य सरकार के कुछ गिने-चुने अधिकारियों के कारण इस तरह की गलत चीजें हो रही हैं, लेकिन साथ ही मुझे इस बात की ख़ुशी है कि ऐसे झूठे मामले न्यायालयों में जाते ही बेनकाब हो जाते हैं। आपने हाल ही में कुछ पत्रकारों के खिलाफ दर्ज झूठे मामलों के बारे में ये देखा होगा। इसके लिए राज्य की न्याय व्यवस्था और प्रणाली की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।

प्रश्न- मुख्यमंत्री का कहना है वो जनता की निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और आप मनोनीत हैं। ऐसे में आपको सरकार के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए।

उत्तर- मुझे किसी और से अपने अधिकार और कर्तव्य सीखने की जरूरत नहीं है। मैंने राज्य की भलाई के लिए ही बार-बार सवाल उठाये हैं और ये कहां लिखा है कि राज्यपाल को राज्य सरकार की गलत बातों का भी चुपचाप समर्थन करना जरूरी है? मैंने जो सवाल उठाये वो राज्य की जनता की भलाई के लिए ही हैं, जैसे सरकारी अनाज के मुफ्त वितरण में घोटाला, कोरोना पीडि़तों के आंकड़े में हेराफेरी, कोरोना से मरे लोगों का अंतिम संस्कार गुपचुप तरीके से किया जाना, विरोधी दलों के सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं को कोरोना प्रभावित या फिर आम्फान तूफान से प्रभावित इलाकों में राहत कार्य करने से पुलिस द्वारा रोके जाना, 14 लावारिस शवों को अमानवीय तरीके से (हुक से घसीट कर) गाडिय़ों में लाद कर चोरी-छिपे अंतिम क्रिया करना, आम्फान तूफान से प्रभावित लोगों की सहायता के लिए केन्द्र सरकार ने 1000 करोड़ रुपये की तत्काल सहायता दी, लेकिन 20 हजार रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ये रुपये केवल तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बैंक खातों में पहुंचने पर सवाल करना, केन्द्र सरकार की किसान कल्याण योजना के पैसे से बंगाल के किसानों को वंचित रखना, राज्य में उद्योग आमंत्रित करने के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग आदि। आपने देखा होगा कि अधिकांश मामलों में राज्य सरकार ने अपनी गलती मान कर उसे सुधारने का प्रयास भी किया है, लेकिन जो गंभीर मामले हैं, उन पर अब भी राज्य सरकार का अडिय़ल रुख बना हुआ है।

प्रश्न- आपने गंभीर मामले या विषय की बात की, क्या उनके बारे में जरा विस्तार से बतायेंगे?

उत्तर- किसी भी राज्य या देश की जनता की खुशहाली की पहली शर्त है, उनकी जानमाल की सुरक्षा और जीवनोपार्जन के लिए बेहतर माहौल। इस समय राजनीतिक हिंसा के कारण कानून और व्यवस्था की लचर स्थिति, इस राज्य के लिए सबसे सबसे गंभीर विषय है। दूसरा विषय है कोरोना के संकट से जूझ रही राज्य की जनता को केन्द्र सरकार की ओर से देश की जनता की भलाई के लिए चलाई जा रही योजनाओं से दूर रखा जाना। यह भी एक अत्यंत गंभीर विषय है। राज्य के लाखों किसानों के बैंक खातों में इस संकट की घड़ी में जो रुपये पहुंचने चाहिए थे, वो नहीं मिले, क्योंकि राज्य सरकार वो पैसे अपने खाते में लेना चाहती है। राज्य के लाखों लोगों को केन्द्र सरकार की मुफ्त चिकित्सा योजना का लाभ भी नहीं लेने दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, एक तरफ राज्य सरकार कर्ज के बोझ से दबी जा रही है तो दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के समानांतर योजनाओं को लागू करके पता नहीं वह क्या साबित करना चाहती है? मेरा सवाल है कि राजनीतिक लड़ाई में राज्य की जनता को क्यों प्रताडि़त किया जा रहा है? क्या बंगाल के लोगों को केन्द्र की योजनाओं से लाभ लेने के हक से वंचित रखना सही है?

प्रश्न- बताया जाता है कि राज्य सरकार के अधिकारियों से मांगने पर भी आपको सूचनाएं नहीं मिलती हैं, ये कहां तक सही है?

उत्तर- ये बिल्कुल सत्य है और ये सूचनाएं मैं अपने किसी व्यक्तिगत काम के लिए तो नहीं मांगता हूं। भारत की संघीय व्यवस्था में सभी राज्य समान हैं, लेकिन भौगोलिक स्थिति और संसाधन में सभी समान नहीं हैं। किसी भी राज्य की परेशानी को केन्द्र सरकार के सामने सही तरीके से रखने पर ही समस्या के समाधान में केन्द्रीय मदद जल्दी मिलती है। अगर हम अपनी समस्याओं को छुपाने की जुगत लगाते रहेंगे तो क्या समस्या का समाधान हो जायेगा? उदाहरण के लिए अगर हमारे राज्य में अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठनों का कोई नेटवर्क काम कर रहा था तो क्या इसकी जानकारी राज्य पुलिस के पास नहीं थी? और अगर थी तो इसे समय रहते केन्द्र से साझा करना चाहिए था। मैंने खुद कई बार मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि केन्द्र से बेहतर सहयोग पाने के लिए आप और हम मिलकर जनता के हित में काम करें, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मतलब आप समझ ही सकते हैं।

प्रश्न- तृणमूल कांग्रेस के एक नेता अनुब्रत मंडल ने हाल ही में बयान दिया है कि आगामी चुनाव में बूथों पर कब्जा कर लिया जायेगा, केन्द्रीय बल के लोगों को भी देख लेने की धमकी दी गयी है?

उत्तर- मैं सब कुछ देख और सुन रहा हूं। मेरी जिम्मेदारी है निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना और यह कार्य मैं हर हाल में पूरी जिम्मेदारी के साथ करूंगा। कैसे करूंगा ये समय आने पर सभी को पता चल जायेगा।

प्रश्न- बंगाल में साइंटिफिक रिगिंग होने के बारे में आपने जरूर सुना होगा। इसके बाद भी आप निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने का दावा कर रहे हैं, ये संभव होगा क्या?

उत्तर- लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई एक भी पक्ष कमजोर होने का असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है। चुनाव की निष्पक्षता, लोकतंत्र की मजबूती के लिए सबसे जरूरी है। अगर आम लोग अपने मतदान के अधिकार से वंचित होते हैं तो फिर ये मतदाताओं के अधिकार की सुरक्षा के लिए तैनात होने वाले तंत्र की विफलता मानी जाएगी। हमारे देश में चुनाव आयोग के पास ऐसी किसी भी प्रकार की गडबड़ी की आशंका को खत्म करने की पूरी ताकत और व्यवस्था है। राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह है। हमारी संवैधानिक व्यवस्था में किसी भी स्थिति से निपटने की पूरी व्यवस्था है और मैंने उन ताकतों के आधार पर ही ये कहा है कि पश्चिम बंगाल में अगला चुनाव पूरी तरह से शांतिपूर्ण और निष्पक्ष हो, यह मैं हर हाल में सुनिश्चित करूंगा। साथ ही राज्य की जनता के हितों की अनदेखी होने पर मैं चुप होकर नहीं बैठूंगा।

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