बाल दिवस पर कविता – देश का भविष्य

अनिल सिंह ‘शलभ’

कल भी देखा था,
आज भी देख रहा हूँ।
सुबह का समय,
मई का महीना।
कबाड़ी का वही बच्चा,
कूड़े की छाती फाड़कर ढ़ूढ़ रहा है
कबाड़।
चारों ओर की परिस्थितियों से अनजान,
भागते शहर से बेखबर
कलाकार की कला साधना वाली तन्मयता से,
पेट में भूख की आग,
आँखों में आशा की किरण,
पूरी तरह निश्चिन्त।
सुना है ,पढ़ा है
बच्चे देश का भविष्य हैं।
देश का भविष्य——-
कूड़े के ढ़ेर में—–।
मन मानने को तैयार नहीं।
काश यह झूठ होता।
बढ़ता समय,आग उगलता सूरज
लेकिन,
बच्चा अपने काम में तल्लीन।
शायद उसने सुन रखा है
खोजने पर मिलता है
भगवान।

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