राम मंदिर को चुनावी मुद्दा किसने बनाया ?

Brajesh Shukla

बृजेश शुक्ल

वर्ष 1949 के दिसंबर माह का तीसरा सप्ताह। अयोध्या फैजाबाद के कांग्रेस विधायक बाबा राघव दास उन दिनों कुछ ज्यादा ही सक्रिय थे। बाबा राघव दास ने संकल्प लिया था कि वह राम जन्मभूमि मंदिर मुक्त कराएंगे। उनका कहना था कि मंदिर को तोडक़र मस्जिद बनाई गई थी। वे इसी मुद्दे पर चुनाव जीते थे। बात 1948 की है। कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के 11 समाजवादियों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा देने वालों में समाजवादी चिंतक आचार्य नरेंद्र देव भी थे। नरेंद्र देव के इस्तीफा देने के बाद खाली सीट पर उपचुनाव हुए।

कांग्रेस ने इस सीट पर पूर्वांचल के गांधी कहे जाने वाले बाबा राघव दास को चुनाव मैदान में उतारा। चुनाव में कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाया और आचार्य नरेंद्र देव को रावण घोषित कर दिया। कांग्रेस के मंचों से कहा गया कि यह लड़ाई राम और रावण के बीच है। आचार्य नरेंद्र देव नास्तिक हैं और रावण की तरह हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रचार की शैली अच्छी नहीं लगी, लेकिन कांग्रेसी इससे पीछे हटने को तैयार नहीं थे। बाबा राघव दास ने आचार्य नरेंद्र देव को चुनाव हरा दिया। इसके बाद बाबा राघव दास अपना चुनावी वादा पूरा करने में जुट गए। 1949 की 22-23 दिसंबर की रात। अयोध्या अंधेरे में डूबी हुई थी। गली में कुछ कुत्ते भौंक रहे थे, क्योंकि कुछ लोग रात के अंधेरे में ही सरयू तट से राम जन्मभूमि की तरफ बढ़ रहे थे।

Ayodhya

ये लोग थे बाबा राघव दास, गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिगविजय नाथ, दिगंबर अखाड़ा के महंत रामचंद्र परमहंस, निर्वाणी अखाड़ा के प्रमुख बाबा अभिराम दास और गीता प्रेस गोरखपुर के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार। सभी लोग राम जन्मस्थान पहुंचे। वहां पर बगल में सुरक्षा बलों की एक टुकड़ी पड़ी हुई थी। सभी निद्रा में थे। कांस्टेबल शेर सिंह पहरेदारी कर रहे थे।

शायद  बाबा अभिराम दास का शेर सिंह से पुराना परिचय था। बाबा अभिराम दास ने शेर सिंह से इशारा किया और उन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया। पांचों लोग मस्जिद में प्रवेश कर गए और वहां पर लेटे मस्जिद के पहरेदार को बाहर जाने को कहा। इसके बाद मुख्य गुंबद के नीचे फर्श को सरयू के जल से धोया गया। इस जल का मस्जिद के हर क्षेत्र में छिडक़ाव किया गया और फिर रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गई। रात में ही रामलला की आरती हुई। सुबह पूरी अयोध्या (फैजाबाद) में यह खबर आग की तरह फैल गई कि आज रात बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे एक अद्भुत प्रकाश फैला और रामलला प्रकट हुए और वहीं विराजमान हो गए। शेर सिंह ने भी यही कथा सुनाई।

पूरी अयोध्या में घंटे-घडिय़ाल बजने लगे। 1949 में यह मुद्दा उभरा और इस मुद्दे को लेकर काफी खेमेबंदी हुई। वास्तव में उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले पर नरम थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत पर उनकी पार्टी की ओर से आरोप लगे थे कि वह कड़े कदम नहीं उठा रहे हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि मस्जिद से मूर्तियों को हटा दिया जाए। नेहरू को कई मुस्लिम नेताओं ने पत्र लिखकर कहा था कि बाबरी मस्जिद में पुरानी स्थिति बहाल की जाए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से एक रिपोर्ट मंगाई और तत्कालीन गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल से कहा कि वह इस मामले पर राज्य के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को चिट्ठी लिख कर व वार्ता कर उचित कारवाई के लिए कहें। उनकी नाराजगी इस कदर थी कि उन्होंने अपने पार्टी के अंदर नेताओं से कहा कि मूर्तियां रखवाने में उनकी पार्टी के विधायक और नेता शामिल हैं। उधर अयोध्या व आसपास का क्षेत्र जश्न में डूबा हुआ था और हर तरफ यही खबर थी कि रामलला प्रकट हो गए हैं। इस संबंध में विस्तार से लोग कहानियां सुना रहे थे। सरकार के दबाव के बाद इस संबंध में मुकदमा लिखा गया, लेकिन कोई भी बाबरी मस्जिद परिसर से मूर्तियां हटाने को तैयार नहीं हुआ। तत्कालीन मुख्य सचिव ने फैजाबाद के जिलाधिकारी केके नैयर को पत्र लिखकर मूर्तियों को हटाने के लिए  कहा। नैयर ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया कि मूर्तियां हटाना उचित नहीं है। यदि हटाई गईं तो वहां पर हिंसा फैल जाएगी। उन्होंने अपने इस्तीफे की धमकी भी दी।

केरल में जन्मे केके नैयर ने 1952 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और वह हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बनकर उभरे। बाद में वह जनसंघ के टिकट पर बहराइच से चुनाव लड़े और सांसद हो गए। उनकी पत्नी शकुंतला नैयर बगल की कैसरगंज से तीन बार सांसद रहीं। उनका ड्राइवर उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य चुना गया। तमाम कानूनी दांवपेच के बाद बाबरी मस्जिद में ताला जड़ दिया गया। यह ताला सिर्फ दो बार खोला जाता था, जब पुजारी को सुबह और रात को पूजा करना होता था।

श्रद्धालु बाहर से ही रामलला के दर्शन करते थे। लेकिन इस घटना से कांग्रेस के अंदर तूफान आता रहा। पंडित गोविंद बल्लभ पंत को यह समझाने के लिए तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को लखनऊ आना पड़ा कि मूर्तियां हटा दी जाएं। यह अलग बात है कि कांग्रेस के अंदर ही यह कहने वाले भी थे कि सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वयं नहीं चाहते थे कि वहां स्थापित मूर्तियों को हटाया जाए। बात बनी नहीं और पंडित जवाहरलाल नेहरू उत्तर प्रदेश कांग्रेस एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ से काफी नाराज रहे। यह घटना पहला तूफान था जो आजादी के तत्काल बाद आया था। और दूसरा  तूफान 1984 में आया और इस देश की राजनीति को हिला कर रख दिया।

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