आजादी के दीवानों में जोश जगाने आये थे बापू

Ram lal rahi

पूर्व गृह राज्य मंत्री – राम लाल राही

सीतापुर जंगे आजादी में जनपद का गौरवमयी स्थान रहा है। जहां खैराबाद कस्बावासी लाल हरी प्रसाद और अल्लामा फजहैल खैराबादी जैसे अनेकानेक स्वाधीनता के जीवन में ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने में भी पीछे नहीं रहे। समाजवादी चिन्तक आचार्य नरेन्द्र देव का जन्म स्थान कहे जाने वाले सीतापुर नगर में सत्य अहिंसा और विश्व बन्धुत्व का संदेश देने वाले मोहनदास करमचंद गांधी 17/18 अक्टूबर 1925 को आजादी की अलख जगाने व स्वाधीनता के पक्षधर लोगों में जोश भरने के लए लखनऊ से सड़क मार्ग से अटरिया, सिधौली आदि स्थानों से होते हुए शाम को पहुंचे। यहां सीतापुर नगरपालिका द्वारा लालबाग में अभिनन्दन-पत्र लिया, तत्पश्चात् उसी रात्रि हिन्दू महासभा व वैद्यसभा में भी उन्हें मानपत्र भेंट किये।

तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष शम्भूनाथ टण्डन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अभिनन्दन-पत्र भेंट कर स्वागत किया, तत्पश्चात् पूज्य बापू ने नगरपालिका सदस्यों को सम्बोधित करते हुए, इस बात पर नाराजगी प्रकट की कि उनके स्वागत में नगरपालिका का एक रूपया खर्च क्यों किया गया, यह एक रूपया जनहित के कामों में खर्च किया जाता तो नगरवासी लाभान्वित होते। महात्मा गांधी ने कहा अगर मैं सीतापुर नगरपालिका का सदस्य होता तो इस काम के लिए एक पैसा स्वीकृत न करता।

Mahatma Gandhi

उन्होंने कहा कि मैं कांग्रेसियों के अपने देशभाइयों की सेवा करने के लिए नगरपालिका और जिला बोर्ड में प्रवेश करने के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन अपनी महात्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए और स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से किसी को इस स्थानीय संस्थाओं का सदस्य बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सेवा और आत्मत्याग की सच्ची भावना के बिना नगरपालिका में प्रवेश बेकार है। मुझे नगरपालिका का एक मात्र आदर्श यही मालूम है, कि नगर को साफ-सुथरा और रोगों से मुक्त रक्खा जाय, गरीबों की मदद की जाय और उनके हलकों को गन्दगी से दूर रक्खा जाय तथा ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय जिससे गन्दी बस्तियां पनप ही न सकें।

आर्थिक तंगी की आड़ नहीं लेनी चाहिए। अगर पैसा न हो तो नगरपालिका के सदस्यों को अपने हाथ से काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस प्रकार वे ऐसा उदाहरण पेश करेंगे, जिसका सभी अनुकरण करेंगे और नगरपालिका के कार्यकलापों की प्रगति के मार्ग की सारी कठिनाइयां निश्चित रूप से दूर हो जायेंगी।

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राष्ट्रपिता बापू हिन्दूसभा तथा वैद्यसभा में पहुंचे अभिनन्दन-पत्र दिए गए। महात्मा गांधी ने अभिनन्दन-पत्रों के उत्तर में कहा इन दोनों सभाओं द्वारा अभिनन्दन-पत्र पाने के योग्य नहीं हूं, क्योंकि इनका मैं आलोचक रहा हूं। इनकी टीका-टिप्पणी के सिवाय मैंने कुछ नहीं किया है। लेकिन मैं यह कह सकता हूं, कि मैंने इनकी आलोचना सच्चाई के साथ और सहानुभूतिपूर्वक एक मित्र तथा हितैषी के नाते, उनको मदद पहुंचाने की इच्छा से की है। हिन्दू सभा की सच्ची सेवा करने के लिए सच्चा हिन्दू होना जरूरी है।

हिन्दू धर्म सनातन धर्म है। मैं वेदों तथा धर्म को अनादि मानता हूं। सत्य भी अनादि है, इसलिए मुझे हिन्दू धर्म और सत्य में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता, जो असत्य है, उसका हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं हो सकता, मैं किसी भी दशा में सत्य का त्याग नहीं कर सकता। चाहे कितना भी विरोध हो, चाहे मेरे खिलाफ हजारों लोग तलवारें उठा कर खड़े हो जायें। सत्य और अहिंसा में कोई अंतर नहीं है। एक हिन्दू के रूप में द्वेषभाव को पनपने नहीं दे सकता। यदि मेरा कोई शत्रु भी है, तो मैं प्यार से जीतूंगा। अगर हिन्दू लोग अपने धर्म को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उसकी सेवा करने के इच्छुक हैं तो उसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि वे अहिंसा के मार्ग पर चलें। अपने धर्म का पुनरूद्धार करने के लिए अवश्य कार्य करें, किन्तु अपने मुसलमान भाइयों के प्रति उनके ह्रदय में तनिक भी दुर्भावना नहीं होनी चाहिए।

कुछ लोगों का ऐसा विचार है कि मैं अहिंसा के नाम पर कायरता का प्रचार कर रहा हूं, यह बिल्कुल गलत है। बेंतिया के हिन्दुओं ने मुझे गलत समझा। यदि वे अपनी मां-बहिन की इज्जत के लिए लड़ते हुए मर जाते हैं, तो में इसे अच्छा समझूंगा। और यदि ऐसा मौका आने पर वे भाग खड़े होते हैं तो यह निरी कायरता ही होगी। और इससे अधिक लज्जाजनक बात और कुछ नहीं हो सकती। ‘हिंसा का मुकाबला अहिंसा से करता तो अच्छी चीज है, लेकिन कायरता अच्छी चीज नहीं है’। सच्ची अहिंसा के लिए सच्ची बहादुरी की जरूरत होती है। ”हिन्दू संगठन के लिए चरित्र निर्माण सबसे ज्यादा जरूरी है’। जब तक यह नहीं होता और जब तक हिन्दू सत्य और सच्चरित्रता पर आरूद्र नहीं होता, तब तक सच्चा संगठन असंभव है। उस हालत में हिन्दू धर्म कहीं का न कहीं रह जाएगा।

वैद्य सभा के मान पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि अखबारों में और सभा-मंचों से उन बातों के लिए मेरी तीव्र आलोचना की गई है, जे मैंने वैद्यों के बारे में कही हैं। लेकिन मेरा अब भी वही विचार है। मैं अपनी बात वापस नहीं ले रहा हूं और न यह मानता हूं कि उसका एक भी शब्द अनुचित है। मुझे लगता है कि लोगों ने मुझे गलत समझा है। मैंने जो टीका-टिप्पणी की, वह आज के वैद्यों को लक्ष्य करके की है, न कि उस आयुर्वेदिक प्रणाली को लक्ष्य करके, जिसकी वे लोग सेवा कर रहे हैं। मैं खुद इस प्रणाली के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन उनका आत्म-संतोषी रूख मुझे पसन्द नहीं है और न ये तरीके ही मुझे पसंद हैं जिन पर वैद्यगण चल रहे हैं।

मैंने उनकी आलोचना इसलिए की है कि उन्होंने आयुर्वेद को नहीं समझा है और उसके साथ न्याय नहीं किया है। मैंने आयुर्वेद की प्रगति के लिए अपनी तरफ से भरपूर कोशिश की है और वैद्यों की जितने तरीकों से सहायता हो सकती है, करने का प्रयत्न किया है, लेकिन उनका काम देखकर निराशा होती है। वैद्यों को आगे बढ़ना चाहिए। यह सोचना गलत है कि उन्हें पश्चिम से कुछ भी नहीं सीखना है। यद्यपि मैंने आत्मा की उपेक्षा के लिए पश्चिमी दुनिया की भर्त्सना की है, फिर भी उसने कई क्षेत्रों में जो कर दिखाया है, उसके प्रति मेरी आँख बन्द नहीं है। वैद्यों को पश्चिम से जरूरी बातें सीखकर अपने ज्ञान को पूरा के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्हें ऐसा मानकर निश्चिन्त नहीं बैठना चाहिए कि उनकी चिकित्सा-प्रणाली मे जो कुछ उससे आगे चिकित्सा-शास्त्र में कुछ है ही नहीं। उन्हें जागरूक और क्रियाशील रहना चाहिए। और उनका लक्ष्य प्रगति होना चाहिए।

दूसरे दिन 18 अक्टूबर को संयुक्त राजनीतिक सम्मेलन जो लालबाग में ही हुआ जिसकी अध्यक्षता उस उस समय के ख्यातिनाम विद्वान नेतर समाजसेवी जनाब सौकत अली द्वारा की गई। इस सम्मेलन में जनाब मोहम्मद अली, पं0 मोती लाल नेहरू, डॉ0 सैयद मसूद, जवाहर लाल नेहरू आदि सम्मेलन रहे। यहां तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मुख्य रूप से गरीबों के लिए चर्खा ग्रहण करने को और इसी के माध्यम से गरीबों की गरीबी को दूर करने के उद्देश्य को समझाया। उन्होंने सम्मेलन में ही अटरिया में मिले लोगों और चर्खा अपनाये जाने के संदर्भ को भी इस सम्मेलन में उल्लेख किया। उन्होंने इस सम्मेलन में अपना भाषण समाप्त करते हुए हिन्दुओं से अनुरोध किया कि वे हिन्दू धर्म से अस्पृश्यता के महा कलंक को दूर करें। l

गांधी ने उसी दिन उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन में अभिनन्दन-प्रत्र प्राप्त कर कहा कि हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। मुझे इस बात से बड़ी प्रसन्नता है कि मद्रास से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के लिए काम किया जा रहा है, लेकिन खेद है कि बंगाल और अन्य स्थानों कोई काम नहीं किया जा रहा है। तत्पश्चात् सीतापुर अस्पृश्यता विरोधी सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे।

सम्मेलन में गांधी जी ने कहा कि मैं स्वर्गीय गोखले के कथन से पूरी तरह सहमत हूं कि भारतीय अपने कुछ देशवासियों को अस्पृश्य मानकर स्वयं सारी दुनिया में अस्पृश्य हो गए हैं। मैं स्वामी श्रद्धानन्द के इस सुझाव को भी ठीक मानता हूं कि अस्पृश्यता को दूर करने का व्यावहारिक मार्ग यही है कि हरएक उच्च वर्ण हिन्दू, घर-परिवार में तथाकथित अस्पृश्य व्यक्ति को रक्खें। मेरा निश्चित विश्वास है कि हिन्दू धर्म कें अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है। किसी भी मानव के प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार करना पाप है। अत: तथाकथित उच्च जाति के लोगों को अस्पृश्यों के बजाय स्वयं अपनी ही शुद्धि करनी चाहिए। उन्होंने अछूतों से भी अनुरोध किया कि वे अपने को शारीरिक रूप से और नैतिक दृष्टि से भी स्वच्छ रक्खें एवं चर्खे को अपनाएं खद्दर खरीद-पहनकर उसे बढ़ावा दें।

देश में अनेकों जगह और उत्तर प्रदेश राज्य में भी सांप्रदायिक हिंसाएं और विवद होते रहे हैं। परन्तु हमारे नगर सीतापुर जनपद सीतापुर में गांधी दर्शन के अनुसार उनकी वाणी का आज भी असर है, जिसके कारण हिन्दू-मूस्लिम एकता और सर्व-धर्म सम्भाव विद्यमान है। साम्प्रदायिक दंगों और तनावों से हमारा जनपद लगभग मुक्त रहा है।

करो या मरो का नारा देने वाले अहिंसावादी महात्मा गांधी के विषय में यह भी कहना अतिशयोक्ति न होगी, दुनिया में बहुत से लोग पैदा हुए जिन्होंने ईश्वरत्व का स्थान पाया, वंदनीय और पूज्यनीय है, उनमें महात्मा बुद्ध को छोड़ कर कोई भी भारतीय भू-खण्ड का ईश्वरत्व का दर्जा पाये ऐसा नहीं है, जिसने आने जीवनकाल में हिंसा के रास्ते अपने वर्चस्व को न स्थापित किया हो, ब्यौरे में जाने की जरूरत नहीं। परन्तु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने सत्य और अहिंसा के बल पर न केवल मानव जाति के अधिकांश लोगों को एक सूत्र में बांधा अपितु इतने बड़े सत्ता संघर्ष में अपनी कार्यशैली से हिंसा का कोई कृत्य नहीं होने दिया न किसी को हिंसा करने का संदेश दिया ऐसी महान ईश्वरत्व रूपी इंसानियत और इमानियत को हम शत्-शत् नमन करते हैं।

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