भारतीय संविधान अदालतों के मूकदर्शक होने की कल्पना नहीं करता है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की इस दलील को खारिज कर दिया है कि कोविड-19 के प्रबंधन में अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए। बुधवार को अपलोड हुए 31 मई के आदेश में सर्वोच्च अदालत ने कहा, ‘जब कार्यपालिका की नीतियों से जनता के अधिकारों का हनन हो रहा हो, तब भारतीय संविधान अदालतों के मूक दर्शक बने रहने की कल्पना नहीं करता है।’

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल एन राव और जस्टिस एस रवींद्र भट की स्पेशल बेंच ने कहा कि यह बहुत घिसी-पिटी सी बात है कि शक्तियों का बंटवारा संविधान के बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा है और नीति-निर्माण कार्यपालिका का एकमात्र अधिकार क्षेत्र बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘कार्यपालिका (यानी सरकार) की बनाई नीतियों की न्यायिक समीक्षा करना और संवैधानिक औचित्य को जांचना बेहद अनिवार्य कार्य है, जिसके लिए अदालतों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरी दुनिया में, कार्यपालिका को अपने उपायों को लागू करने के लिए काफी जगह दी गई है, जो सामान्य समय में व्यक्तियों की आजादी के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन अभी महामारी रोकने के लिए जरूरी हैं। 1905 में एक मामले में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से, न्यायपालिका यह भी मानती है कि जन स्वास्थ्य की ऐसी आपात स्थितियों में संवैधानिक जांच में बदलाव आ जाता है, जहां कार्यपालिका वैज्ञानिकों और अन्य विशेषज्ञों के साथ त्वरित परामर्श के साथ काम करती है।’बेंच ने आगे कहा कि इसी तरह, पूरी दुनिया में अदालतों ने कार्यकारी नीतियों से जुड़ी संवैधानिक चुनौतियों पर भी प्रतिक्रिया दी है, जिन्होंने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता का उल्लंघन किया है।

अदालत ने आगे कहा, ‘अदालतों ने अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के प्रबंधन में कार्यपालिका की विशेषज्ञता का बार-बार उल्लेख किया है, लेकिन एक महामारी से लड़ने के लिए कार्यपालिका को दी गई छूट की आड़ में मनमानी और तर्कहीन नीतियों के खिलाफ चेतावनी भी दी है।’

सुप्रीम कोर्ट में 9 मई को दाखिल हलफनामे में, केंद्र ने अपनी कोविड-19 टीकाकरण नीति को सही ठहराया था। इसके लिए तर्क दिया गया था कि इसकी प्रतिक्रिया और रणनीति पूरी तरह से चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों की सलाह से प्रेरित है, जो न्यायिक हस्तक्षेप के लिए बहुत कम जगह छोड़ती है और इस बात पर जोर देती है कि देश भर में सभी आयु वर्गों के नागरिकों को मुफ्त में टीकाकरण होगा।

केंद्र ने कहा था कि अभूतपूर्व और अजीबोगरीब परिस्थितियों के मद्देनजर, जिसके तहत टीकाकरण अभियान को एक कार्यकारी नीति के रूप में तैयार किया गया है, कार्यपालिका की विवेक पर भरोसा किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि एक वैश्विक महामारी में, जहां राष्ट्र की प्रतिक्रिया और रणनीति पूरी तरह से चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की राय से संचालित होती है, ‘किसी भी अति उत्साही, भले ही बहुत सार्थक न्यायिक हस्तक्षेप के अप्रत्याशित और अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं।’

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट कोविड-19 प्रबंधन के मामले में स्वयं संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है। इसी मामले में केंद्र ने 218 पेज का हलफनामा दाखिल किया है और अपनी कोविड-19 प्रबंधन की नीति को संविधान के अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 के अनुरूप बताया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने एक वैक्सीन के लिए तीन दाम तय करने की नीति पर सवाल उठाए हैं।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार खुद कोविशील्ड वैक्सीन 150 रुपये प्रति डोज के हिसाब से खरीद रही है, जबकि यह राज्यों को तीन सौ और निजी क्षेत्र को 600 रुपये में मिल रही है. वहीं, स्पूतनिक वी वैक्सीन की कीमत 1195 रुपये प्रति डोज है। इस पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से वैक्सीन के घरेलू और विदेश में दाम की तुलनात्मक रिपोर्ट, दिसंबर 2021 तक वैक्सीन उपलब्धता का रोडमैप और शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद डिजिटल डिवाइड से निपटने के बारे में जवाब मांगा है। इस मामले की सुनवाई अब 30 जून को होगी।

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